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क्या पूर्व सैनिकों को दबाया जा सकता है ?

पूर्व सैनिक

हाल के दिनों में इस बात पर तेज बहस छिड़ी हुई है कि क्या सशस्त्र बल पूर्व सैनिकों के लिए दिशानिर्देश या आचार संहिता जारी कर सकते हैं? विरोध करने यूनियन बनाने या सेना के मामलों पर सार्वजनिक रूप से बोलने जैसे कुछ मूलभूत अधिकार वर्तमान में सेवारत सैनिकों को हासिल नहीं है। उनके पास कुछ औपचारिक रास्ते हैं जिनके माध्यम से वे अपनी शिकायतों को जाहिर कर सकते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद ये औपचारिक रास्ते बंद हो जाते हैं।





वर्तमान में सोशल मीडिया ऐसा खुला माध्यम बन गया है जिसके जरिये पूर्व सैनिक अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं और अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। गुमनाम रह कर अपनी बात व्यक्त करने के अतिरिक्त इच्छा होने पर यह उन्हें ऐसा मंच भी मुहैया कराता है जिसके जरिये उनकी आपत्तियां और उनके विचार फैल जाते हैं। कई पूर्व सैनिकों ने सेवारत जवानों का प्रतिनिधित्व करने और उनकी तरफ से लिखने की भूमिका भी प्राप्त कर ली है। लगभग सभी उदाहरणों में शिकायतकर्ता वैसी सभी बुराइयों के लिए सैन्य पदानुक्रम को दोषी ठहराता है जिनसे पूर्व सैनिक प्रभावित होते हैं। चाहे ईसीएचएस में उनके चिकित्सकीय इलाज का मामला हो, कैंटीन की सुविधाओं पर प्रतिबंध हो, विकलांगता पेंशन हो या फिर ओआरओपी का मामला हो।

पूर्व सैनिकों द्वारा सोशल मीडिया पर की गई आलोचनाएं सेवारत सैनिकों के ध्यान में भी आती हैं क्योंकि यह एक खुला फोरम है और इसलिए यह युवा दिमागों को प्रभावित करता है। यह खुशमिजाजी, भरोसे और विश्वास को तोड़ता है जो किसी संगठन का अनिवार्य हिस्सा होता है। कोई भी जवान आदेशों का पालन या अपने प्राणों की आहुति इसलिए दे देता है क्योंकि उसे भरोसा होता है कि उसे आदेश उसके वरिष्ठों द्वारा दिए गए हैं। सेना के पदानुक्रम की इस आलोचना से जूनियर मानने लगते हैं कि जो लोग सेना में उच्च पदों पर गए हैं वे इस योग्य नहीं हैं। उनका अपने मातहतों की फिक्र करने के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं है, उन्होंने चेतवुड आदर्श वाक्य को नजरअंदाज कर दिया है और वे केवल अपना लाभ ही देखते हैं।

ऐसी छवि बनाई जा रही है कि जो प्रोफेशनल हैं, उनकी पदोन्न्ति में उपेक्षा की जा रही है जबकि जो अनैतिक रास्ते अपनाते हैं, वे आगे बढ़ जाते हैं। यह बात सच्चाई से कोसों दूर है। ऐसे नकारात्मक विचार सिस्टम को लाभ के बजाये हानि अधिक पहुंचा सकते हैं। इस नकारात्मक आलोचना का बेजा लाभ वैसी ताकतें उठाने लगती हैं जो देश के दुश्मन हैं। वे खुले सोशल मीडिया मंचों पर फर्जी संदेश फैलाने लगते हैं और उनकी मंशा सेवारत लोगों को निशाना बनाना और सेना के हौसले को प्रभावित करना है। ऐसी नकारात्मक अफवाहों का मुकाबला करने के लिए सेना को कुछ सख्त कदम उठाने पड़े जिनमें सेवारत जवानों को कहा गया कि वे पूरी तरह खुले सोशल मीडिया समूहों में उनकी भागीदारी को सीमित करें और अपने रैंक और सेना के विवरण को प्रदर्शित न करें।

इसी नकारात्मक आलोचना का मुकाबला करने के लिए सैन्य बलों ने पूर्व सैनिक समुदाय के लिए एक आचार संहिता लागू करने की बात सोची। कानूनी रूप से ऐसी कार्रवाई को न तो क्रियान्वित किया जा सकता है और न ही स्वीकार किया जा सकता है, जबकि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा न हो। सेना के लिए पेंशन विनियमन, 2008 के पैराग्राफ 8 में कहा गया है- भविष्य में अच्छा आचरण पेंशन या भत्तों का प्रत्येक अनुदान और इसे जारी रखने के लिए एक निहित शर्त होगा। इसके आगे ‘गंभीर अपराध’ और ‘गंभीर दुराचरण’ जैसे शब्दों के द्वारा व्याख्या की गई है।

पैराग्राफ में दो नोट हैं जो गंभीर अपराध‘ और ‘गंभीर दुराचरण’ जैसे शब्दों की व्याख्या की गई है। गंभीर अपराध का अर्थ है ऐसा अपराध जो भारतीय दंड संहिता 1860 या आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 या देश में लागू वर्तमान में ऐसा कोई भी अन्य कानून जिसके लिए कानून के तहत निर्धारित अधिकतम सजा आर्थिक दंड के साथ या उसके बगैर तीन वर्ष या अधिक की कैद है।
नोट के अनुसार गंभीर कदाचार का अर्थ है, ‘गंभीर कदाचार में किसी आधिकारिक गोपनीय कोड या पासवर्ड या कोई स्केच, प्लान, वस्तु, नोट, दस्तावेज या सूचना, जैसे कि आधिकारिक गोपनीय अधिनियम के खंड 5 में उल्लेखित है, का प्रेषण या प्रकटीकरण, जोकि आम नागरिकों या देश की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा पेंशन रोकने के लिए अन्य कारण भी दिए गए हैं।

इसलिए पूर्व सैनिकों के लिए कोई अन्य आचार संहिता जारी करने का प्रयास करना सही और स्वीकार्य नहीं हो सकता है। बहरहाल पूर्व सैनिकों को खुद उस प्रभाव को समझने की आवश्यकता है जो वर्तमान में उनकी नकारात्मक आलोचना की वजह से है। यह सेना के भीतर खुशमिजाजी और सीनियर तथा जूनियर लेवल के बीच उस भरोसे और विश्वास को तोड़ता है। यह दीर्घकालिक रूप से संगठन के लिए बाधक साबित होगा।

पूर्व सैनिकों को यह महसूस करने की जरूरत है कि उन्होंने सम्मानपूर्वक देश की सेवा की है या तो स्वैच्छिक रूप से या फिर सेवानिवृत्ति के बाद सेना से अलग हुए हैं। सेना ने उन्हें समाज में एक रुतबा दिया है। पूर्व सैनिकों से संबंधित मसलों पर वर्तमान में सेवारत अधिकारियों के कुछ कदमों और फैसलों को लेकर असहमति हो सकती है और उन्हें अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का अधिकार है।
बहरहाल उनकी आलोचना का उद्देश्य सेना, इसका पदानुक्रम या कोई व्यक्ति विशेष नहीं होना चाहिए। पूर्व सैनिकों को परिपक्व होना चाहिए तथा आरोप लगाने को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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