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बेहद अहम है सेना के भीतर परस्पर जुड़ाव

भारतीय सेना

हाल ही में मैंने सेना के अपने उस रेजिमेंट के 37वें स्थापना दिवस में शिरकत की जिसमें देश भर से आए सभी रैंकों के पूर्व सैनिकों ने भाग लिया। रेजिमेंट को पहली बार उस शहर में स्थानांतरित किया गया था, जहां इसकी काफी ऊंचाई पर एक चुनौतीभरे कार्यकाल के बाद जुलाई, 1981 में इसकी स्थापना की गई थी।





हम सभी जो उस टीम का हिस्सा थे, जिसने उस दिन ज्वॉयन किया था जब रेजिमेंट ने अपना पहला कदम उठाया था, के लिए यह पूरी तरह पुरानी यादों में खो जाने का मौका था। ढेर सारी यादें ताजा होने लगीं, शुरुआती दिनों में सामने आने वाली दिक्कतें, ढेर सारी चीजों की किल्लत, साथ काम करने पर एक दूसरे के प्रति भावनात्मक जुड़ाव, दूसरी यूनिटों से आने वाले जवानों को अपनी टीम में शामिल करने के लिए कंधे से कंधा मिला कर काम करने की यादें कभी भी धुंधली नहीं पड़ेंगी। वे बड़ी कठिनाइयों वाले दिन थे, बेशुमार दुश्वारियां थीं, लेकिन इन सबके बीच एक-दूसरे के साथ घुलने मिलने, हँसी-ठिठोली करने, दुखों को बांटने और मिल-जुल कर समस्याओं का समाधान ढूंढने का समय था।

कार्यक्रम में मौजूद पूर्व सैनिकों में हमारा वह जवान भी था जिसे सैन्य अभियान के दौरान शरीर के निचले हिस्से में लकवा मार गया था। वह पुणे से चल कर इस कार्यक्रम में शामिल होने आया था। उस समय की यादों को साझा करते हुए, जब वह घायल हुआ था और उसके साथी जवानों ने उसकी जान बचाई थी। यह सुनकर सबकी आंखों में आंसू आ गए। खुशकिस्मती से उसके वे साथी भी वहां उपस्थित थे। किसी सैनिक की जीवटता कभी भी खत्म नहीं होती क्योंकि उस बहादुर जवान ने इस प्रकार के दिव्यांगों के लिए आयोजित खेलों में भाग लेना शुरू कर दिया और राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण एवं रजत पदक जीते।

उन साथियों की यादें भी बरबस आने लगीं जो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन जिनकी स्मृति और जिनका योगदान रेजिमेंट के इतिहास में हमेशा के लिए अंकित हो चुका है। श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इस तरह के प्रत्येक अवसर पर हमेशा ही मौन रखने का एक क्षण होता है जिसके बाद खुशियों के उन लम्हों को याद किया जाता है और सबकी आंखें आंसुओं से भर जाती हैं। जो पूर्व सैनिक इस कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके, उन्हें इस कार्यक्रम की तस्वीरों एवं फोन कॉल के माध्यम से अपडेट रखा गया।

भारतीय सेना के प्रत्येक रेजिमेंट या बटालियन का अपना खुद का इतिहास होता है और कई का इतिहास तो सदियों पुराना होता है। सबके अपने नायक और खलनायक भी होते हैं और उनकी मुठभेड़ों और उनसे जुड़े किस्से रेजिमेंट के लोकगीतों का हिस्सा बने रहते हैं। सेना के रेजिमेंट और बटालियन देश के प्रत्येक हिस्से में सेवा करते हैं और हर जगह अपने पीछे खुशियों, उदासी, कामयाबी और नाकामी के लम्हे छोड़ देती हैं। ये ही वे क्षण होते हैं जब पूर्व सैनिकों, जिन्होंने कभी एक साथ मिल कर देश की सेवा की होती है, इनका आनंद उठाते हैं। शाम ढलते ही मुस्कराहटों और कभी-कभार आंसुओं के साथ मुठभेड़ों और अनुभवों को साझा करने का दौर शुरू हो जाता है।

ज्यादातर पूर्व सैनिकों ने वहां उपस्थित होने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से वहां की यात्रा की थी, जिससे कि उन लोगों से उनकी मुलाकात हो सके जिनके साथ उन्होंने नौकरी की थी और फिर वे अपने परिवार की वर्तमान स्थिति को साझा कर सकें। लगभग एक दशक के बाद अपने प्रिय साथियों से मिलने के लिए आए ये पूर्व सैनिक एक जगह आपस में मिले और उन्होंने वही प्यार-मुहब्बत और गर्मजोशी का परिचय दिया जो उनके सेवा काल के दौरान उनमें दिखता था। उनमें से अधिकांश विभिन्न सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से एक दूसरे के संपर्क में बने हुए हैं, लेकिन एक-दूसरे से मिलने का आनंद ही कुछ और है।

यह उन लोगों के लिए भी एक प्रेरणा है जो हाल ही में सेना में भर्ती हुए हैं। यह उन्हें अपने पूर्ववर्तियों द्वारा अपने रेजिमेंट को वर्तमान मजबूत स्तर पर लाने के लिए किए गए प्रयासों एवं बलिदानों की सीख देता है। किसी भी यूनिट के लिए यही वे चंद दिन होते हैं जब पूर्व सैनिक यूनिट के इतिहास एवं विकास को साझा करते हैं तथा और अधिक गौरव अर्जित करने के प्रयासों के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह वर्तमान पीढ़ी में नई जान फूंकता है और उन्हें पूर्ववर्तियों की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उत्साहित करता है कि अब उनके कंधों पर ही भविष्य निर्भर है क्योंकि पूर्व सैनिक अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा चुके हैं। वे सीखते हैं कि सेना की जिन यूनिटों में वे काम करते हैं, वह हमेशा उन लोगों का दिल खोलकर स्वागत करने के लिए तत्पर रहती है जो प्रत्येक विपत्ति के समय में पूरे मन से देश की रक्षा करते हैं।

सेना ऐसी एकमात्र संस्था है जो अपने पूर्व सैनिकों का दिल खोलकर स्वागत करती है, उनकी फिक्र करती है और उनके प्रयासों के लिए उनका सम्मान करती है। ऐसे अवसरों की परंपरा हमेशा बनी रहनी चाहिए क्योंकि यह जवानों की पीढि़यों को आपस में जोड़ता है और वर्तमान पीढ़ी को देश, सेना और यूनिट के प्रति कर्तव्य निभाने के लिए प्रोत्साहित करता है। वे महसूस करते हैं कि जब तक वे प्रतिष्ठान की इज्जत पर कोई बट्टा नहीं लगाते, उनका भावभीना स्वागत किया जाएगा और यूनिट हर सुख दुख में उनके साथ चट्टान की तरह खड़ी रहेगी।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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