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ठंडी नहीं हो पा रहीं बोमडिला की लपटें

बोमडिला मामला

बोमडिला में पुलिस एवं सेना के जवानों के बीच फसाद का मामला सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारी, जो आम तौर पर हर तरह की परेशानी का ठीकरा आईएएस लॉबी पर फोड़ने के लिए जाने जाते हैं, इस झगड़े में कूद पड़े और सेना पर इल्जाम लगाने में उनके साथ हो गए। इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर कई प्रकार के किस्से चल रहे हैं और सरकार की हर सेवा अपने अनुकूल और अपने मुताबिक इस घटना की व्याख्या कर रही है। आईएएस और आईपीएस दावा करते हैं कि सेना इसके लिए जिम्मेदार है और वे इस बात पर भी जोर दे रहे हैं कि इस मामले की जांच केवल पुलिस द्वारा कराई जाए और कसूरवार को कानूनी माध्यमों के जरिये सजा दी जाए।





सेना को बखूबी पता है कि यह घटना कैसे घटी क्योंकि वह हर अवसर पर वहां मौजूद थी। पुलिस को बता दिया गया था कि सांस्कृतिक समारोह के अवसर पर जिन व्यक्तियों को उसने गिरफ्तार किया है और उनके साथ दुर्व्यवहार किया है, वे सेना के कार्यरत जवान हैं। सेना की यूनिट के प्रयासों के बाद दोनों को रिहा किया गया। उनका अहंकार इतना अधिक था कि मामले के हल के लिए कमांडिंग ऑफिसर (सीओ) को आना पड़ा। सीओ एसपी से मिलने के लिए दो बार गए, पहली बार बिना किसी हथियार के गए। जब उन्होंने देखा कि एसपी ऑफिस कॉम्प्लेक्स में पुलिस और पैरामिलेटरी की भारी संख्या में तैनाती है तो दूसरी बार वह अपनी क्विक रिएक्शन टीम के साथ गए। अपने एसपी और डीएम की मौजूदगी से इतराये पुलिस बलों ने असंसदीय भाषा और भंगिमाओं का प्रयोग किया और सेना के जवानों को धक्का देने की भी कोशिश की।

थोड़ी सी झड़प हुई थी जिसमें कुछ नुकसान नहीं हुआ या किसी को कोई चोट नहीं पहुंची, संभवत‘ गाडि़यों को एकाध खरोंचें आईं। वहां केवल दो सैन्य जवान घायल हुए जिन्हें पुलिस ने हिरासत में बुरी तरह पीटा था और जो घटना का मूल कारण था। सोशल मीडिया पर हर आईपीएस इसके लिए आईपीसी की किसी धारा का बिना उल्लेख किए इस दुर्व्यवहार को न्यायोचित और उनकी गिरफ्तारी को कानूनी ठहरा रहा है। ऐसे हर मामले में जहां हिरासत में कोई मौत या पिटाई होती है, संबंधित पुलिस को सस्पेंड कर दिया जाता है। आश्चर्य की बात है कि इस मामले में पुलिस अपनी तरफ से की गई शारीरिक हिंसा को उचित ठहरा रही है। सोशल मीडिया पर सीओ का वीडियो पूरी घटना के समापन के बाद पोस्ट किया गया और केवल चुने गए हिस्से लीक किए गए।

एक न्यायसंगत संगठन के रूप में सेना हमेशा ही देश के प्रति जिम्मेदार रही है और किसी भी अन्य सेवा की तुलना में अधिक सम्माननीय रही है। उसने इस घटना की अपनी खुद की जांच का आदेश दे दिया है। सेनाध्यक्ष ने यहां तक कहा कि अगर किसी व्यक्ति को कसूरवार पाया जाता है तो उसे दंड दिया जाएगा। जैसाकि आईपीएस के नजरिये से उम्मीद की ही जा सकती है, उसने अपनी आंतरिक सेवा से यह पूछने तक की जहमत नहीं उठाई कि किसने अपनी सीमा लांघी और जवानों के साथ क्यों दुर्व्यवहार किया, बल्कि उन्होंने उनका बचाव करने की कोशिश की। उनके लिए नागरिकों के उत्पीड़न की ऐसी कार्रवाईयां बेहद सामान्य और स्वीकार्य हैं।

सेना प्रमुख द्वारा की गई घोषणा दर्शाती है कि राष्ट्र क्यों सेना को देश का सबसे विश्वसनीय और भरोसेमंद संगठन मानता है और पुलिस तथा प्रशासनिक सेवाओं का क्यों ज्यादा सम्मान नहीं किया जाता। यह सेना के भीतर के नैतिक साहस के स्तर को भी प्रदर्शित करता है जबकि बोमडिला में स्थानीय पुलिस एवं नौकरशाही नेतृत्व में इसका पूरा अभाव दिखा। एक पक्ष ने जहां पूरी पारदर्शिता प्रदर्शित की, वहीं दूसरे पक्ष ने इस पर परदा डालने का प्रयास किया।

यूनिट के सीओ, जो इस घटना से जुड़े थे, को कदम उठाना ही था क्योंकि उनकी जिम्मेदारी अपने जवानों के प्रति थी जिनके साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा था। उनके लिए, उनके जवान ही सर्वोच्च हैं और उनके लिए कोई भी कुर्बानी मंजूर है। उन्होंने एक अधिनायक के रूप में कार्रवाई की और यह सुनिश्चित किया कि अवैध हिरासत से उन्हें तुरंत रिहा कराया जाए। उनके कदमों की आलोचना कर रही आईपीएस लॉबी कभी भी किसी नेता और उनके जवानो के बीच के जुड़ाव को महसूस नहीं कर सकती क्योंकि ऐसा जुड़ाव उनके संगठनों में कभी भी नहीं पाया जाता।

पूरा देश सोशल मीडिया पर सेना के पक्ष में खड़ा रहा क्योंकि पुलिस की क्रूरता भारतीय समाज में एक सर्वविदित तथ्य है। सेना का किसी हिंसा में संलिप्त होना न केवल दुर्लभ है बल्कि ऐसा तभी होता है जब उसे बहुत अधिक उकसाया जाए। कई लोगों ने सवाल किया है कि सेना को आंतरिक जांच क्यों करनी चाहिए और अपने ही जवानों को क्यों सजा देनी चाहिए जबकि पुलिस ऐसा नहीं कर रही।

सेनाप्रमुख द्वारा दिया गया जवाब सबसे माकूल था। सेना देश में सबसे सम्मानित संस्थान है। वह पुलिस के तौरतरीके नहीं अपना सकती और अगर साबित हो जाए तो उस सूरत में अनुशासनहीनता का बचाव नहीं कर सकती। देश के प्रति उसकी अपनी खुद की जिम्मेदारियां हैं जिसकी वह अनदेखी नहीं कर सकती। देश उस पर भरोसा करता है और एक संस्थान के रूप में वह कभी भी देश का भरोसा टूटने नहीं देगी। यही एक सम्मानित संस्थान की निशानी भी है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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