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नियंत्रण रेखा एवं सीमा पार हमले

भारतीय जवान

भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा (एलओसी) लगभग साढ़े सात सौ किलोमीटर लंबी है। दोनों देशों की सेनाओं के बीच लगातार तनाव बना हुआ है और इसे कम करने के लिए प्रत्येक कार्रवाई नपे-तुले तरीके से करने की आवश्यकता है। इसकी पवित्रता सुनिश्चित करने के लिए तैनात सैन्य टुकडि़यों के लिए गलती करने की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। पूरा क्षेत्र पहाड़ों से घिरा है, दोनों तरफ जंगल भरे पड़े हैं जो सीमा पार कर हमले करने वाले जवानों के लिए कवर मुहैया कराते हैं। सैन्य चौकियों पर ताकत लगाई जाती है और सेनाएं नियमित रूप से चौकियों के बीच गश्त लगाती हैं, जिनमें अधिकतर जाने-पहचाने रास्ते और पगडंडियां होती हैं।





रक्षा व्यवस्था पिछले कुछ समय से लगातार मजबूत बनाई जा रही है, पिछले ऑपरेशनों के दौरान बिछाई गई कुछ बारूदी सुरंगों को अभी तक नहीं हटाया गया है, इसलिए कई जगह इसके ढेर लग गए हैं और दोनों ही सेनाएं उनके सटीक स्थानों से अनजान हैं। इसलिए, बारूदी सुरंगों से जवानों के हताहत होने की नियमित खबरें आती रहती हैं, जो नियंत्रण रेखा को पार करना जोखिमपूर्ण बना देता है। नियंत्रण रेखा के निकट दोनों ही तरफ गांव बसे हुए हैं जो लगातार गोलीबारी के निशाना बनते रहते हैं। मैदानी और कम पहाड़ी क्षेत्रों में किसान नियंत्रण रेखा तक अपनी खेतों की जुताई करते हैं।

दोनों ही देश गोलियों और निगरानी के जरिये एक दूसरे पर दबदबा बनाना चाहते हैं। आरंभिक दिनों में जब पाकिस्तान में कम प्रतिबंध थे, भारत ने नियंत्रण रेखा पर शांति बनाये रखने के लिए भारी हथियारों एवं तोपखानों की तैनाती पर प्रतिबंध लगा रखा था। इसे अब उठा लिया गया है और स्थानीय कमांडर जवाबी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं। भारत नियंत्रण रेखा को लेकर अधिक चिंतित रहता है क्योंकि पाक रात को अचानक हमले कर आतंकियों की घुसपैठ कराने की कोशिश करता है इसलिए अक्सर वह रात को छुप कर हमले करता रहता है। जब कोई विशिष्ट सूचना उपलब्ध होती है तो वहां कई प्रकार के घात लगाए जा सकते हैं। पाक इस बात से वाकिफ है कि भारत में आतंकी शिविर नहीं हैं इसलिए वह चैन से बैठा रहता है।

भारत एक शांतिपूर्ण नियंत्रण रेखा पसंद करेगा, जबकि पाक की चाहत एक सक्रिय नियंत्रण रेखा की होगी क्योंकि शांतिपूर्ण नियंत्रण रेखा घुसपैठ में मुश्किलें पैदा करेगा। ऐसे माहौल में यह तय करना मुश्किल है कौन पक्ष युद्धविराम यानी सीजफायर का उल्लंघन करता है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर सीजफायर का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हैं और नियमित रूप से राजनयिक स्तर पर विरोध दर्ज कराते हैं। पाकिस्तान भारत और पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ के सैन्य पर्यवेक्षक ग्रुप (यूएनएमओजीआईपी) के पास शिकायत भी करता है जो दोनों ही देशों में स्थापित है। भारत में यूएनएमओजीआईपी की आवाजाही पर प्रतिबंध है। भारत इसे निष्क्रिय और महत्वहीन मानता है जबकि पाकिस्तान जब भी इसे अपने अनुकूल पाता है, इसका लाभ उठाने का प्रयास करता है।

इसके अतिरिक्त, कोई भी देश अपने क्षेत्र के प्रत्येक इंच की चौकसी या सुरक्षा नहीं कर सकता क्योंकि हमेशा ऐसे छिद्र होते ही हैं जिनका घुसपैठिये फायदा उठा सकते हैं। सीमा पर बाड़ लगे होने के बावजूद, नाले और दुर्गम घाटियां इन मुश्किलों को बढ़ा देती हैं। इस क्षेत्र में पाक के बेपरवाह होने का मुख्य कारण यह है कि उसे भारत की तरफ से घुसपैठ का कोई खतरा नहीं है। इन हालात के मद्देनजर भारत योजना तैयार करता है और फिर cross border strikes कर देता है। सर्जिकल कहे जाने वाले ऐसे हमले इसलिए कामयाब होते हैं क्योंकि ये बिल्कुल अचानक, अनियमित अंतरालों और अलग-अलग स्थानों पर किए जाते हैं। स्नाइपर्स (छिप कर गोली चलाने वाले) की तैनाती इस क्षेत्र में सक्रिय सैन्य टुकडि़यों के तनाव को और बढ़ा देती है। वे पूरी नियंत्रण रेखा पर भले ही प्रभावी न हों, लेकिन कुछ खास क्षेत्रों में जरूर कामयाब होते हैं और उनमें नियमित रूप से लोग हताहत भी होते हैं।

इस क्षेत्र में तैनात भारतीय सेना के बहुत सारे दायित्व होते हैं। उन्हें नियंत्रण रेखा की गरिमा सुनिश्चित करने, पाक चौकियों पर आधिपत्य करने, घुसपैठ की आशंकाओं का पता लगाने के लिए चौकियों के बीच मौजूद छिद्रों की निगरानी करने एवं रात में घुसपैठियों को टार्गेट करने के लिए घात लगाना होता है। यह सारा कछ सुनिश्चित करने के लिए उनमें भरपूर मनोबल, बेशुमार हौंसला तथा राष्ट्र और नागरिकों के प्रति समर्पण की अटूट भावना होनी चाहिए। उन्हें अपने आसपास के आसन्न खतरों की पूरी जानकारी होती है और वे पूरी तरह सावधानी बरतते हैं, फिर भी ऐसे कई अवसर आते हैं जब वे पूरी तरह भौंचक्क रह जाते हैं और देश को जानमाल का नुकसान हो जाता है, जैसा अभी हाल में हुआ, जब भारतीय सेना को एक अधिकारी समेत अपने चार जवानों से हाथ धोना पड़ा।

एक ईमानदार सेना के रूप में, इसने कभी भी हताहतों की संख्या नहीं छुपाई है। भारतीय सेना इन्हें अपने उत्तरादायित्वों का एक हिस्सा मानती है, अपने ऑपरेशन के तरीकों में सुधार लाती है तथा अपने दायित्वों और मिशनों को पूरा करने का काम जारी रखती है। बहरहाल, किसी भी सेना के लिए कोई भी प्रतिकूल घटना हमेशा ही उसके मनोबल को तोड़ने वाली साबित होती है, इसलिए वह सदा अपने दुश्मनों से इसका प्रतिशोध लेने को बेताब रहेगी। इसके अतिरिक्त, उनके हमले का जवाब देने और उन्हें ज्यादा नुकसान पहुंचाने से दुश्मन भविष्य में ऐसे हमलों को लेकर सावधान भी हो जाते हैं। यह किसी सेना को दुश्मनों पर एक प्रकार की नैतिक जीत भी प्रदान करती है। किसी बटालियन के भीतर, जबतक अपने साथियों की मौत का बदला नहीं लिया जाता, बटालियन चैन से नहीं बैठती क्योंकि उसे लगता है कि यह उसके अपने परिवार पर किया गया हमला है।

सीमा पार हमले करना प्रतिशोध लेने के कई विकल्पों में से केवल एक विकल्प है क्योंकि इसके लिए कई और रास्ते भी हैं। सीमा चौकियों का विनाश और रक्षा का काम तोपखाने के उपयोग के माध्यम से किया जा सकता है या प्रत्यक्ष रूप से गोली चलाने वाले हथियारों की तैनाती के द्वारा भी ऐसा किया जा सकता है। बदले की कार्रवाई के रूप में, तोप का उपयोग करने से समीपवर्ती गांवों के निवासियों के लिए ज्यादा खतरा पैदा हो सकता है इसलिए यह बदले की कार्रवाई केवल एक रूप है। प्रत्यक्ष गोलीबारी नियमित अंतरालों पर की जाती है। ऐसे कदम भी शत्रुओं को सावधान होने को मजबूर कर देते हैं।

सीमावर्ती तनावों के अतिरिक्त, ऊंची पहाड़ियों पर स्थित सीमा चौकियों पर जाड़े में भारी हिमपात एवं हिमस्खलनों का असर पड़ता है। कुछ सीमा चौकियों में जाड़े के लिए आवश्यक सामग्रियों का भंडारण करने की भी आवश्यकता होती है क्योंकि जाड़े के दौरान लंबी अवधि तक वहां पहुंचना नामुमकिन सा हो जाता है। इसी प्रकार, सैन्य बल का रखरखाव भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।

सीमा पार हमलों की योजना बनाना और हमले करना हमेशा से ही जोखिमपूर्ण कार्रवाई रही है। इसमें विफलता बेहद खतरनाक साबित हो सकती है, इसलिए आश्चर्य और पर्याप्त सैन्य बल बनाये रखना अनिवार्य है। इसकी टाइमिंग और टार्गेट को चुनने का कार्य पूरी तरह सटीक तरीके से होना चाहिए। सीमा पार हमला किए जाने की सूरत में, हमलावर पक्ष प्रत्येक सैनिक के इस मिशन से सुरक्षित वापस लौटने का शिद्दत से इंतजार करता है। हमलावर टीम अपने लक्ष्य पर निशाना लगाती है, वहां जान माल को नुकसान पहुंचाती है और बिना दुश्मन के सावधान हुए और किए गए नुकसान का जायजा लिए बगैर वापस लौट आती है। सिगनल संचारों की निगरानी तथा एंबुलेंसों की आवाजाही से नुकसान की जानकारी तो मिल ही जाती है, पर उसके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण उसके जवानों का सुरक्षित वापस लौट आना है।

नियंत्रण रेखा एक ऐसा क्षेत्र है जहां प्रत्येक नया दिन हर सैनिक के लिए एक नई चुनौती लेकर आता है। कई ऐसे अवसर आते हैं जब वह पाक को प्रतिक्रिया करने पर मजबूर करता है जबकि कई बार उसे खुद ही इसका सामना करना होता है। यह ऐसा क्षेत्र है जहां कोई भी जवान एक क्षण के लिए भी लापरवाह नहीं हो सकता। कोई राष्ट्र अपने सैनिकों के प्रति जो सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करता है, वह सैनिक को अपने कर्तव्य के निर्वाह के लिए पर्याप्त ताकत प्रदान करता है। हमें इस नए वर्ष को नियंत्रण रेखा की सुरक्षा में पूरी तरह मुस्तैद सैनिकों को समर्पित करने की आवश्यकता है।

लेखक का blog: harshakakararticles.com है और उन्हें @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

 

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