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सेना पर सवाल उठाने से पहले बेहतर विकल्प सुझाने की जरूरत

फारुख अहमद डार
फारुख अहमद डार (सौजन्य- गूगल)

एक अंग्रेजी अखबार ने पिछले सप्ताह एक लेख प्रकाशित किया था जिसका शीर्षक था, ‘एक वर्ष बाद, मानव ढाल की टुकड़ों में बंद जिंदगी‘। यह लेख फारुख डार के हालिया इंटरव्यू पर आधारित है, जिसे एक वर्ष पहले मेजर गोगोई ने कश्मीर में एक उपचुनाव के दौरान, एक मतदाता केंद्र में फंसे और धमकी दे रही भीड़, जो उन पर पत्थर फेंक रही थी, से मतदान कर्मचारियों और सुरक्षा टीम को बचाने के लिए मानव ढाल के रूप में जीप से बांध दिया था।





इंटरव्यू में फारुख अहमद डार दावा करता है,‘ मेरी क्या खता थी ? मतदान केंद्र में जाना और वोट डालना? अब तो मेरी नींद भी मुहाल हो गई है। यहां तक कि दवाएं भी कारगर नहीं हो पा रही हैं। मुझे कोई काम तक नहीं दे रहा है। सरकार खामोश है और न्यायपालिका अपनी गति से चल रही है। कई बार मैं सोचता हूं कि क्या बुजदिली की इस कार्रवाई के लिए सम्मानित किया जाना चाहिए? क्या भारत कश्मीर को यही संदेश देना चाहता है?‘

उस वक्त इस क्षेत्र में बेहद कम समय में हुई दो घटनाओं से इस बात का संकेत मिला कि किस प्रकार राज्य सरकार और हमारे तथाकथित मानवाधिकार आलोचक काम करते हैं। जब गोगोई पत्थरों से लैस एक भीड़ से घिरे एक छोटे मतदान केंद्र में फंसे लोगों को बचाने के लिए दौड़े तो उन्होंने महसूस किया कि अगर उन्होंने कोई लीक से हटकर कदम नहीं उठाया तो बड़ी संख्या में लोग हताहत हो सकते हैं।

उन्होंने बिल्कुल वही किया और सबसे नजदीक खड़े पत्थरबाज को पकड़ कर उसे जीप से बांध दिया और लोगों को अचरज में डालते हुए टीम को वहां से सुरक्षित निकाल लाए। न तो वह किसी निर्दोष को पकड़ना चाहते थे और न ही उनके पास इसके लिए समय था और न ही ऐसा जोखिम मोल लेना उचित था। उन्होंने सबसे नजदीक खड़े और भीड़ के सबसे आक्रामक प्रतीत हो रहे व्यक्ति को पकड़ लिया। जिससे भीड़ सकते में आ गई और सन्न रह गई।

एक व्यक्ति को प्रभावित करने वाले उनके इस बहादुरीपूर्ण कदम की वजह से, जिसे बाद में अंतरराष्ट्रीय शोहरत मिली और अनगिनत लोगों की जानें बच गईं। वह चाहते तो सुरक्षा बलों और मतदाता केंद्र के कर्मचारियों की जान बचाने के लिए गोलियां चला सकते थे और वह न्यायसंगत भी होता।

किसी भी पत्रकार या मानवाधिकार संगठनों के कार्यकर्ताओं ने उन मतदान केंद्र कर्मचारियों का साक्षात्कार करने की जहमत नहीं उठाई जिनकी जानें बचाई गई थी। अगर उनका साक्षात्कार लिया जाता तो देश उनके सामने खड़ी मौत और उन मानसिक सदमों के बारे में जान पाता जिसका उन्होंने उस वक्त अनुभव किया और जो उन्हें ताउम्र खौफजदा करता रहेगा। वे अब कभी भी इस प्रकार की ड्यूटी नहीं कर पाएंगे, भले ही उन पर सरकार का कितना ही दबाव क्यों न पड़े। वे कोई बाहरी व्यक्ति नहीं थे, पत्थर फेंकने वालों की ही तरह स्थानीय व्यक्ति थे, जिन्हें संवैधानिक दायित्व को अंजाम देने के लिए भेजा गया था जिससे वे इंकार नहीं कर सकते थे।

दूसरी तरफ, गढ़वाल रेजीमेंट के जवानों की एक टुकड़ी भी पत्थरबाजों की भीड़ में फंस गई थी। भीड़ ने उनमें से कई जवानों को घायल भी कर दिया था। इस टुकड़ी ने पूरी तरह आत्म रक्षा के लिए गोलियां चलाईं और उन्हें इस कार्रवाई के लिए आरोपित कर दिया गया। मुख्यमंत्री ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। एफआईआर टुकड़ी के कमांडर, मेजर आदित्य के खिलाफ दर्ज की गई जो मौका ए वारदात पर मौजूद तक नहीं थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को मजबूर किया कि वह अपनी जांच को अलग रखे।

इसलिए, सवाल यह उठता है कि ऐसे में कौन सा कदम बेहतर है, मार डालने के लिए गोली चलाना या ऐसा नायाब तरीका अपनाना जिससे लोगों की जान बच जाए।

आज अगर इस घटना पर विचार किया जाए तो ऐसा लगता है कि अगर गोगोई ने गोली चलाई होती तो उन्हें इसके लिए आरोपित किया गया होता। उन्होंने जानें बचाईं लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा उनकी आलोचना की गई है। राज्य सरकार और उसके पीडीपी नेतृत्व ने दोनों ही घटनाओं की आलोचना की है लेकिन वे कभी भी कोई विकल्प सुझाने में सक्षम नहीं हो पाएंगे। गोली चलाना अपराध है, नायाब तरीका ढूंढकर लोगों की जान बचाना भी अपराध है। यह विडंबना लगातार बहसों-मुबाहिसों में हावी बनी हुई है।

सेना प्रमुख गोगोई के इस विशिष्ट अनूठे उपाय, जिससे अनमोल जीवन बचाए गए, की सराहना करने के जरिये एक प्रकार का संदेश दे रहे थे। भविष्य में इस प्रकार की दूसरी घटनाएं भी होंगी जिनके लिए ऐसे ही अनूठे उपाय करने की जरूरत हो सकती है जिनसे कि लोगों की जान बच सके। यह बेहद जटिल कार्य होगा, जो सुरक्षा बलों के लिए काफी जोखिम भरा हो सकता है लेकिन अगर इसे अपनाया गया तो लापरवाह और उत्तेजित युवा होने वाले नुकसान से बच सकेंगे।

अगर जान बचाये जाने की जरूरत है तो सुरक्षा बलों को निश्चित रूप से और विशेष रूप से, आपातकालीन स्थितियों और जीवन के खतरे में पड़ने वाली स्थितियों में, ऐसे अनोखे उपाय ढूंढने ही होंगे।

किसी ऐसे व्यक्ति ने जिसने भलाई का काम किया है उसके  फैसलों और कदमों पर सवाल उठाना क्षेत्र में अमन चैन बहाल करने की इच्छुक सेना के मनोबल और कार्यप्रणाली को प्रभावित करेगी, जहां विदेशी प्रभाव महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अंततोगत्वा किसी भी समस्या का अंतिम समाधान ही महत्वपूर्ण होता है और गोगोई घटना में एक व्यक्ति को बांध देने से कई लोगों की जानें बच गईं। बेहतर क्या था? एक व्यक्ति का बांधा जाना या कई जिंदगियों का नुकसान होना? हो सकता है, आलोचक इसका जवाब तलाशने की कोशिश करें?

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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