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सेना को सर्वोपरि समझने की जरूरत

कुपवाड़ा में भारतीय सेना

केंद्र सरकार द्वारा कल लोकसभा में पेश किए गए अंतरिम बजट में सेना और अर्ध सैनिक बलों के प्रति चिंता तो साफ झलकती है लेकिन जरूरतों को देखते हुए बजट में आवंटित धनराशि का प्रावधान कम लगता है। इस बार रक्षा बजट 3 लाख करोड़ के पार जरूर हो गया है लेकिन यह बढ़ोतरी महज पांच हजार करोड़ ज्यादा है। इसी तरह भारत-पाक और भारत-चीन सीमा पर तनाव के बीच सरहद पर बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 2 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। साथ ही जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में आतंकरोधी अभियानों में लगी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को 2019-20 के लिए 23,742,04 करोड़ रुपये के आवंटन का प्रस्ताव किया गया है। यह ठीक है कि इस साल सरकार ने अंतरिम बजट ही पेश किया है लेकिन रक्षा के लिए और धनराशि आवंटित की गई होती तो देश के भीतर और बाहरी सुरक्षा की बात अलग ही होती।





आज सेना के तीनों अंगों और सरहद पर तैनात अर्ध सैनिक बलों को हर तरीके से और मजबूत करने की जरूरत है। चाहे वह बुनियादी ढांचा हो या फिर साजो सामान। हमें नहीं भूलना चाहिए कि दोहरी चुनौतियों-चीन व पाकिस्तान, का सामना कर रही भारतीय सेना के पास दो-तिहाई से अधिक यानी 68 प्रतिशत हथियार औऱ उपकरण पुराने हैं। कुछ महीने पहले सेना की टिप्पणी तो यहां तक थी कि उसका 68 फीसदी साजो सामान विंटेज श्रेणी यानी संग्रहालय में विरासत के रूप में रखने लायक है। सेना ने रक्षा मंत्रालय से सबंद्ध संसद की स्थायी समिति के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए यह भी कहा था कि 2018-19 के बजट ने हमारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। आज फिर 2019-20 के नए रक्षा बजट के बाद सेनाएं निराश लग रही हैं। यह चिंताजनक है। और सरकार को इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि फौज है तो देश है।

यह सही है कि दुश्मन से मुकाबला करने के लिए पहली जरूरत जोश, जुनून व जज्बा होता है, पर साथ-साथ यह भी ध्यान रखने की बात होती है कि आधुनिक तथा उच्चस्तरीय हथियार जंग में खुद के जान-माल के नुकसान में कमी लाते हैं। इसलिए देश-दुनिया के बदले हुए सामरिक हालात में आज इसी बात की जरूरत है कि भारतीय सेना के हर अंग में अत्याधुनिक हथियार, उपकरण और वाहन हों ताकि हमारे जवान और अफसर काम को बखूबी अंजाम दे सकें। चीन, पाकिस्तान सरहद की रक्षा से जुड़ी चुनौतियों के साथ-साथ नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की बढ़ती फायरिंग, पठानकोट, कश्मीर आदि में सैन्य ठिकानों पर हमले, खासतौर पर ग्रेनेड हमले और चीन के आक्रामक रुख को देखते हुए सेना को उच्चकोटि के अस्त्र-शस्त्र की जरूरत है। इसलिए बेहतर होता कि रक्षा बजट में और ज्यादा धनराशि के आवंटन का प्रस्ताव होता।

हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि चीन और पाकिस्तान अपनी सैन्य जरूरतों के मुताबिक अपनी-अपनी सेनाओं को आधुनिक बनाने के लिए तेजी से काम कर रहे हैं। आज चीन तेजी से आधुनिक तथा आगे बढ़ती हुई सेना के रूप में अपनी छाप दर्ज करवा रहा है। पाकिस्तान भी ले-देकर आधुनिक किस्म के हथियार भरपूर मात्रा में आयातित करता ही है। ऐसे में भारत को भी हर स्थिति का बारीकी से आकलन करते हुए सेना के तीनों अंगों-आर्मी, नेवी, एयरफोर्स को समान रूप से ताकतवर और आधुनिक बनाने का काम और तेजी से करना होगा। चाहे वह हथियार खरीद प्रक्रिया का कार्य हो अथवा रक्षा इकाइयों में विशाल पैमाने पर तेजी से उत्पादन का। हम लगातार सरहद और आंतरिक सुरक्षा में जवानों को खो रहे हैं, यह चिंता का विषय है। यह वक्त है निर्णायक फैसले लेने का और उस पर अमल करने का। चाहे वह रक्षा बजट में धन की बढ़ोतरी का ही क्यों ना हो ?

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