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सेना को जरूरत है अत्याधुनिक गोला-बारूद की

अभ्यास गगन शक्ति
अभ्यास गगन शक्ति (सौजन्य- गूगल)

मीडिया में पिछले सप्ताह छपी एक रिपोर्ट में कहा गया कि वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के अभी हाल में आयोजित एक सम्मेलन में देश में उपलब्ध गोला बारूद की गुणवत्ता एवं मात्रा दोनों के स्टॉक (भंडार) पर विचार-विमर्श किया गया। सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार, भारतीय सेना से दो मोर्चों के लिए तैयार रहने की उम्मीद की जाती है जिसमें एक ही समय चीन एवं पाकिस्तान से युद्ध की आशंका शामिल है। कश्मीर में जारी अराजकता को भी इसमें जोड़ लिया जाए तो कुल मिला कर यह ढाई मोर्चों का संघर्ष बन जाता है।





हाल ही में वायु सेना अभ्यास ‘गगन शक्ति’ का संचालन किया गया जिसमें देश के समस्त वायु शक्ति संसाधनों का उपयोग किया गया। प्रारंभ में इसने एक मोर्चे पर अभ्यास किया तथा बाद में इसने दूसरे मोर्चे की ओर रुख किया। यह सेना की इस बाबत तैयारी का एक स्पष्ट उदाहरण था। चीन भले ही अभी सैन्य आपरेशन न करे, लेकिन चीनी मोर्चे पर तैनात सैन्य बलों का उपयोग पाक से निपटने के लिए नहीं किया जा सकता।

सशस्त्र बलों का उद्देश्य आरंभ में चालीस दिनों तक चलने वाले युद्ध के लिए गोला बारूद की पूर्ति करना था, इसलिए गोला बारूद का स्टॉक इसी के अनुरूप रखा गया था। इस क्षेत्र के सभी देशों के पास परमाणु हथियार हैं और वर्तमान में व्याप्त अंतरराष्ट्रीय माहौल में पारंपरिक युद्ध कब परमाणु युद्ध में तबदील हो जाए, इसके बारे में अनुमान लगाना मुश्किल है। इसे ध्यान में रखते हुए किसी संभावित युद्ध की अवधि 40 दिन से घटा कर 10 दिन मान ली गई जिसका तात्पर्य 10 दिनों तक चलने वाले भीषण युद्ध से था। इसका तात्पर्य यह हुआ कि हर प्रकार की शस्त्र प्रणाली के लिए दोनों मोर्चों पर तैनात सभी सैन्य बलों के लिए गोला बारूद का स्टॉक कम से कम 10 दिनों के भीषण युद्ध के लिए अवश्य उपलब्ध रहना चाहिए।

यह गोला बारूद देश भर में सीमा के पास तैनात टुकड़ियों से लेकर हथियारों के बड़े डिपो तक फैला हुआ है और सैन्य ऑपरेशन के आगे बढ़ने तथा उसके उपयोग होने के अनुरूप यह आगे बढ़ता रहता है। वास्तव में सभी सैन्य बलों का युद्ध एक ही स्तर पर नहीं होगा, इसलिए गोला-बारूद का प्रबंधन डिपो में रखे गए आयुध भंडार से सेना की जरूरत की पूर्ति के लिए संभव होगा।

भंडारित गोला बारूद का अस्तित्व उसके उपयोगिता में बने रहने की मियाद पर निर्भर करता है। इसलिए, इसे लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया तथा रखा जाता है। नियमित रूप से इसका स्थान बदला जाता है, क्योंकि नया गोला-बारूद स्टॉक में चला जाता है जबकि पुराने गोला-बारूद का उपयोग प्रशिक्षण के लिए किया जाता है। हथियारों की बनावट जितनी पेचीदा होगी, उनके बेहतर इस्तेमाल की अवधि उतनी ही कम होगी। रॉकेटों एवं मिसाइलों की उपयोगिता अवधि दूसरे हथियारों की तुलना में कम होती है जिसकी मुख्य वजह यह है कि इसमें इलेक्ट्रानिक पार्ट लगे होते हैं। साथ ही, ये महंगे भी होते हैं। विभिन्न प्रकार के गोला बारूद की स्टोरेज आवश्यकता भी अलग अलग होती है।

फंड की कमी की वजह से सेना को अब अपनी प्राथमिकताओं से समझौता करने को मजबूर होना पड़ रहा है। अखबारों की रिपोर्ट के अनुसार, Smerch rockets, Konkors missiles, anti-tank ammunition और influence mines जैसे हथियारों की खरीद नहीं की जाएगी। इसलिए, उनका भंडारण वांछित स्तर से कम हो जाएगा। ऐसा फैसला भले ही सख्त हो, लेकिन इन्हें लिए जाने की जरूरत है क्योंकि सरकार अतिरिक्त फंड जारी करने की इच्छुक नहीं दिखती। इसके लिए जरूरी है कि महत्वपूर्ण गोला बारूद की फिर से जांच की जाए और उसकी स्थिति के अनुरूप, उसकी उपयोगिता अवधि बढ़ाने के विकल्प पर विचार किया जाए। बहरहाल, इसे केवल आपातकालीन और कम अवधि वाला उपाय ही माना जाना चाहिए।

विशिष्ट प्रकार के गोला-बारूद की कमी का भी असर पड़ा है क्योंकि इसका ज्यादातर हिस्सा अभी भी आयात पर ही निर्भर है। स्वदेशी रूप से निर्मित हथियार अभी भी उपलब्ध कराए जा सकते हैं। चूंकि बजट ने रक्षा तैयारियों को प्रभावित किया है, इसलिए सरकार को निश्चित रूप से इसके लिए अधिक आवंटन पर फिर से विचार करना चाहिए क्योंकि युद्ध सामग्री की कमी किसी भी सूरत में अस्वीकार्य है।

दीर्घकालिक अवधि में भी हथियारों की कमी की पूर्ति नहीं की जा सकती, क्योंकि हर वर्ष सैन्य उपकरणों का एक बड़ा हिस्सा अपनी सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल की मियाद (शेल्फ लाइफ) समाप्त कर चुका होता है। इसलिए, इस आशंका को देखते हुए कि सरकार द्वारा आगे आने वाले वर्षों में भी अतिरिक्त फंड जारी किए जाने के आसार नहीं हैं, हथियारों की कमी एवं साथ-साथ सुरक्षा चिंताएं भी बढ़ती ही जाएंगी।

हथियारों की कमी के अतिरिक्त, सेना को उपकरणों के स्पेयर पार्ट्स खरीदने तथा उसे फिर से उपयोग में लाने की आवश्यकता पर भी पुनर्विचार करने को मजबूर होना पड़ रहा है। जैसे ही कोई उपकरण पुराना हो जाता है, उसके रखरखाव की लागत भी बढ़ जाती है। अगर उसकी जगह नया उपकरण खरीदा जाना है तब तो यह फैसला तार्किक लगता है लेकिन पूंजीगत बजट में भी कमी किए जाने की वजह से सेना द्वारा ऐसी खरीद की कोई गुंजाइश नहीं दिखती। इसका नतीजा उपकरणों की उपलब्धता में कमी के रूप में सामने आएगा, जिसे वांछनीय नहीं कहा जा सकता।

ऐसे हालात दुश्मन देशों के लिए उकसाने वाले कदम उठाने के दरवाजे खोल देंगे क्योंकि कमियों से जूझ रही कोई भी सेना सैन्य आपरेशन के लिए कभी भी पूरी तरह तैयार नहीं होगी। सेना के जवान बेशक अपने पास उपलब्ध हथियारों के साथ अपनी आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ेंगे, लेकिन यह सुनिश्चित करना कि उसके पास सही समय पर सही मात्रा में हथियार मौजूद हों, सरकार की जिम्मेदारी है। अगर सरकार ऐसा करने में विफल रहती है तो इसका मतलब है कि वह राष्ट्र की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रही है जो नुकसानदायक साबित हो सकता है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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