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आर्मी डे- सेना को सम्मान देने की जरूरत

जिन जवानों और अफसरों के जज्बे से देश की सीमाएं सुरक्षित हैं ओर जिनकी बदौलत पूरा देश अमन और चैन के साथ सोता है। आज उन सैन्यकर्मियों की सेना यानी थलसेना का दिवस है। 15 जनवरी 1949 को आजाद भारत के प्रथम थलसेना अध्यक्ष के रूप में फील्ड मार्शल के.एम. करिअप्पा ने भारतीय सेना की कमान ब्रिटिश जनरल सर फ्रांसिस बूचर से हासिल की थी। इसी उपलक्ष्य में आर्मी डे मनाया जाता है।





आज भारतीय थलसेना नई चुनौतियों के साथ सबल व सक्षम ढंग से काम कर रही है तथा बदले हालात में पूरी दुनिया को संदेश दे रही है कि शांति के साथ रहना उसकी पहली प्राथमिकता है और यदि दुश्मन की निगाह में कोई खोट-खामी है तो वह कभी भी पीछे नहीं हटेगी। गत महीनों में सर्जिकल स्ट्राइक समेत कई घटनाएं इतिहास के रूप में दर्ज हैं और दुश्मन में खौफ पैदा करने के लिए काफी हैं। फिर भी नए दौर में वही कुछ पुरानी चुनौतियां जो आजादी मिलने के बाद दो पड़ोसी देशों से थीं आज भी कमोबेश बरकरार हैं। पन्द्रह हजार किलोमीटर से ज्यादा लम्बी सीमा का एक बड़ा हिस्सा इन दोनों देशों की सीमा से जुड़ा है जिसकी रखवाली और वहां से होने वाली आपत्तिजनक गतिविधियों के कारण एक चाक-चौबंद निगाह की मांग करता है जिसे थलसेना अपनी सूझबूझ व रणकौशल से सुलझाती रहती है। डोकलाम का मामला इस बात का ताजा उदाहरण है। इन बाहरी खतरों के साथ देश के आंतरिक हिस्से में आतंकवाद, उपद्रव का सामना करने तथा मानवीय व आपदा राहत कार्यों- सुनामी, भूकम्प, बाढ़ आदि का पूरे जज्बे से अंजाम देकर सेना वापस अपनी बैरकों में चली जाती है। यह उसके निष्ठा भरे कर्तव्य तथा अनुशासन को दर्शाता है।

आज थलसेना दिवस है लिहाजा सत्ता के शीर्ष पर बैठे नीति नियंताओं के साथ-साथ पूरे देशवासियों को कुछ बातों पर गौर करने की जरूरत है। पहली बात यह कि किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा विकास तथा गौरव के लिए सेना सर्वोच्च होती है। इसी तरह भारत की सुरक्षा तथा दुनिया की एक ताकत बनने के लिए जरूरी है कि भारतीय सेना की जो भी जरूरतें हैं समय पर तथा समुचित ढंग से पूरी हों। बात चाहे साजो-सामान की हो या देशवासियों से मिलने वाले प्यार-सम्मान की। लड़ाई के वक्त जब उन्हें विश्वसनीय और उच्चकोटि की मारक क्षमता के औजार मिलते हैं तो प्रतिरक्षा तंत्र तो मजबूत होता ही है, मनोबल भी ऊंचा हो जाता है। दूसरी बात उनके जज्बे का कोई सानी नहीं है। परमवीर चक्र या अन्य वीरता सम्मान प्राप्त अदम्य साहस, पराक्रम तथा शौर्य से भरी उनकी गाथाएं किसी भी देशवासी के रोंगटे खड़े कर देती हैं। पर बात इससे बनती नहीं है। आज समूची सेना के इन कर्मियों का सम्मान यानी देश का सम्मान है। लिहाजा घर-गांव, मुहल्ले, कस्बे, शहर जहां भी मिलें इनका सम्मान तथा इनकी गैर मौजूदगी में इनके माता-पिता, बच्चों, जमीन-जायदाद जिन मसलों पर भी सहयोग की अपेक्षा हो उसे देश के प्रति कर्तव्य मानकर यदि सभी नागरिक अपनी ड्यूटी निभाएंगे तो एक मायने में वही सर्वोच्च सम्मान होगा। आज के इस अवसर पर सरकार को भी उन फौजियों की परेशानियों, जरूरतों पर बिना कोताही के ध्यान देने की जरूरत है जो रिटायर हो चुके हैं और महीनों से न्याय की मांग कर रहे हैं। आज थलसेना दिवस मनाने की यही सही उपयोगिता होगी।

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