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आयुध फैक्टरियों से जारी है धन का रिसाव !

आयुध फैक्ट्री

देश में ऑर्डनेंस फैक्टरी बोर्ड (OFB) के तहत 41 आयुध फैक्टरियां संचालित हैं जिनमें लगभग 90,000 कर्मचारी कार्यरत हैं। अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी संगठन सभी आयुध फैक्टरियों की 430 यूनियनों का प्रतिनिधित्व करता है और यह लगातार हड़ताल की धमकियां देकर सरकार को बंधक और मजबूर बनाता रहा है। सरकार ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान ओएफबी द्वारा निर्मित्त उपकरणों के लिए ऑर्डर में कटौती कर दी है। वित वर्ष 2018-19 के लिए आरंभ में 17,500 करोड़ रुपये का लक्ष्य निर्धारित किया था जिसे घटा कर 10,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। सरकार ने ओएफबी के उत्पाद रेंज से कुल 250 वस्तुओं को भी हटा दिया।





इसी के साथ साथ सरकार निजी क्षेत्र को शामिल कर ‘मेक इन इंडिया‘ को भी बढ़ाने का प्रयास कर रही है। इसने पहले ही निजी क्षेत्र को 15,000 करोड़ रुपये के बराबर के गोलाबारुद के ऑर्डर दे रखे हैं जिससे आयुध फैक्टरी यूनियनों में नाराजगी फैल गई है। सैन्य फार्मों, सेलेक्ट स्टैटिक एवं बेस वर्कशॉप तथा डिपुओं को बंद करने का नतीजा 31,000 सिविलियन कर्मचारियों को सरप्लस घोषित किए जाने के रूप में सामने आया है जिससे यूनियन गुस्से में हैं। बेशक  कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति तक दूसरे संगठनों में शिफ्ट कर दिया जाएगा।

आयुध फैक्टरियों के कर्मचारियों को सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) वेंडरों के कर्मचरियों का भी समर्थन प्राप्त है। वे आयुध फैक्टरियों को मूलभूत सामग्रियों की आपूर्ति करते हैं और ऑर्डर में कटौती से वे भी समान रूप से प्रभावित हुए हैं। एमएसएमई में लगभग तीन लाख कर्मचारी हैं जिन्हें रोजगार समाप्त हो जाने का डर सता रहा है। उनकी इकाइयों ने पहले ही कच्चे मालों के लिए ऑर्डर दे रखे थे जब सरकार ने उनके उत्पाद रेंज से वस्तुओं में कटौती कर दी।

सशस्त्र बलों  जो ओएफबी उत्पादों एवं इसके यूनियनों का एकमात्र उपभोक्ता है, के बीच धारणा में अंतर है। यूनियनों का मानना है कि उनके उत्पादन में कमी लाने और उन्हें निर्रथक बनाने के बजाये सरकार को आयुध फैक्टरियों को मजबूत बनाने में निवेश करना चाहिए और उनकी क्षमता निर्माण में मदद करनी चाहिए। वे लगातार सेना की आपूर्ति श्रृंखला में अपने महत्व को प्रचारित करते रहते हैं। कई मामलों में तो वे दावा करते हैं कि उनके उत्पाद बाजार से बेहतर गुणवत्ता के हैं।

दूसरी तरफ सशस्त्र बलों का विचार है कि आयुध फैक्टरियों के उत्पादों की गुणवत्ता निम्न है और एक निश्चित ग्राहक आधार के साथ सरकारी संस्था होने के कारण उनके शुल्क बेहद अधिक हैं। अलावा इसके इन फैक्टरियों ने आजादी के बाद के आरंभिक वर्षों में सरकार के लक्ष्य में सहायता की जब देश का औद्योगिक आधार निम्न था। वर्तमान में  मजबूत औद्योगिक आधार के साथ बाजार में व्यापक विकल्पों के साथ बेहतर गुणवत्ता के उत्पाद उपलब्ध हैं।

एक स्पष्ट उदाहरण हाल में वार्षिक कपड़ा भत्ते का है जो जवानों को उनकी पसंद का यूनिफॉर्म सामग्री चुनने और खरीदने में सक्षम बनाता है, बजाए आयुध फैक्टरियों के बनाए एवं थोपे गए उत्पादों के जहां शर्ट और ट्राउजर के कपड़ों के रंग भी अलग अलग होते थे। इससे जहां जवानों को संतुष्टि मिली है वहीं आयुध फैक्टरियों में नाराजगी फैल गई है जिनकी उत्पादन इकाइयां अब निष्क्रिय हो गई हैं।

सरकार ने संसद में एक प्रश्न के जवाब में यह भी घोषणा की कि उसकी आयुध फैक्टरियों को बंद करने की कोई योजना नहीं है। पिछले वर्ष जनवरी में, रक्षा मंत्री ने घोषणा की थी कि सरकार आयुध फैक्टरियों और रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों (डीपीएसयू) में अब और कोई निवेश नहीं करेगी। लेकिन सरकार ने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया है कि इससे ये निष्क्रिय बनी रहेंगी या उनकी क्षमताएं घट जाएंगी जिससे वे रक्षा बजट के लिए सफेद हाथी बन कर रह जाएंगी। इसका असर आधुनिकीकरण के लिए निर्धारित सशस्त्र बलों के फंड पर पड़ेगा क्योंकि फंड का आकार पहले से ही तय है।

इसके साथ साथ सेना को ऊपर से लेकर नीचे तक अपने श्रमबल में कमी लाने को विवश किया जा रहा है जिससे कि आधुनिकीकरण के लिए फंड जुटाया जा सके। सशस्त्र बलों का आखिरी सिरा केवल यूनिफॉर्म वर्ग के साथ ही खत्म नहीं हो जाता बल्कि यह आयुध फैक्टरियों तक भी विस्तारित है जिनकी उत्पादन क्षमताओं में अब कटौती की जा रही है। पर उन इकाइयों को बंद करने की दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है जिनकी उपयोगिता अब समाप्त हो चुकी है।

त्रासदी यह है कि मजदूर यूनियनें तो सरकार को विवश कर सकती हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उभरते खतरों का सामना करने के लिए जिन बलों में बढोतरी किए जाने की आवश्यकता है, उन्हें कटौती के लिए मजबूर होना पड़ रहा है क्योंकि ऐसी कोई आवाज नहीं है जो सरकार को उनकी बात सुनने के लिए मजबूर कर सके। अगर सरकारें इसी प्रकार काम करती रहीं तो राष्ट्रीय सुरक्षा यूनियन के दबावों के सामने गौण पड़ जाएगी।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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