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सशस्त्र सेना झंडा दिवस और UGC के निर्देश

सशस्त्र सेना झंडा दिवस

हर साल की तरह 07 दिसंबर को सशस्त्र सेना झंडा दिवस आया और बिना कोई गहरी छाप छोड़े चला गया। सेना तथा पैरामिलिट्री फोर्सेज के साथ जो जुड़ाव, झुकाव देश के नागरिकों के भीतर होना चाहिए था वह पूरे देश में दिखाई नहीं दिया। इस पहलू पर राज और समाज दोनों को चिंतन-मनन करने और उस पर कारगर योजना बना कर कदम बढ़ाने की जरूरत है। झंडा दिवस पर हालांकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने देश भर के विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया था कि वे संघर्षों के दौरान देश के सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान के याद में 07 दिसंबर को सशस्त्र सेना झंडा दिवस मनाए। विश्वविद्यालयों को लिखे गए पत्र में UGC ने साफ-साफ कहा था कि विश्वविद्यालय आतंकवाद तथा उग्रवाद के खतरों के खिलाफ और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान नागरिकों के जीवन को सुरक्षित रखने व देश की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखने के लिए हमारे वीर सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान को सम्मान दें। पत्र में इस बात का भी निर्देश दिया गया था कि विश्वविद्यालय इस मुद्दे पर छात्रों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए कॉलेजों व शैक्षणिक संस्थानों में विविध कार्यक्रम तथा वार्ताएं आयोजित करें। निश्चय ही UGC की यह पहल सराहनीय कही जाएगी। लेकिन 07 दिसंबर को झंडा दिवस का दिन आया और बिना खास मौजूदगी दर्ज किए कॉलेजों-विश्वविद्यालयों से होता आगे बढ़ गया।





दरअसल यूजीसी का यह बेहद कारगर साबित हो सकने वाला निर्देश भरा पत्र 800 से भी ज्यादा विश्वविद्यालयों, कॉलेजों के लिए जारी किया गया। समय की मांग तो यह थी कि पूरी शिद्दत, ईमानदारी के साथ इस दिवस को मनाया जाता। देश प्रेम, सैनिकों की भूमिका, उनकी कार्यशैली, उनके शौर्य, अनुकरणीय वीरता, अदम्य साहस, सर्वोच्च बलिदान आदि से जुड़े विविध कार्यक्रम, वार्ताएं, चर्चाएं, सेना में भर्ती होने के लिए करियर मेले, विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों के प्रांगन में आयोजित होते। पर ऐसा व्यापक स्तर पर नहीं हो सका। जरूरी तो यह था कि छात्र-छात्राएं, शिक्षक उन वीर सैनिकों, शहीदों को याद करते जिन्होंने हमारी खातिर वीरोचित कर्तव्यपालन किया और जरूरत पड़ी तो अपनी सर्वोच्च बलिदान दिया। मौजूदा दौर में उग्रवाद, नक्सलवाद और सीमा पर सेना व सैन्य बलों के जवान जिस जांबाजी और निष्ठा के साथ अपना कर्तव्य पालन कर रहे हैं वह अतुल्य है। अनुकरणीय है। इन्हीं वीर, पराक्रमी जवानों की वजह से हम स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में पढ़ पा रहे हैं, खेती-किसानी कर पा रहे हैं, कल-कारखानों में काम कर पा रहे हैं और सुरक्षित जीवन जी रहे हैं। यह एहसास हमें इस सशस्त्र बल झंडा दिवस पर होना चाहिए था। UGC  ने शायद इसीलिए सारे विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया था। UGC को देश के इन सभी केंद्रीय, राज्य, डीम्ड और निजी विश्वविद्यालयों के प्रमुखों से पूछना चाहिए कि उन्होंने इस दिशा में कितनी सक्रियता दिखाई और छात्रों को इस ओर आकर्षित करने में कितना सफल हुए।

सशस्त्र सेना झंडा दिवस की परिकल्पना आजादी के बाद 1949 में इसलिए की गई थी कि हम भारतीय सेनाओं के जांबाज सैनिकों तथा उनके परिजनों के प्रति सम्मान व्यक्त कर सकें और उनके कल्याण के लिए एकजुट हो सकें। पर बीते 70 वर्षों में इस दिशा में सारगर्भित काम इसलिए नहीं हो पाया कि हम देश के सभी वर्गों के नागरिकों को जोड़ नहीं पाए। यह उचित नहीं है। जरूरत है कि उत्साह, उमंग के साथ छात्रों युवाओं, शिक्षकों, किसानों, कामगारों, सैनिकों, भूतपूर्व सैनिकों, राजनेताओं आदि को जोड़कर देशभर में ऐसे कार्यक्रम 07 दिसंबर के दौरान पूरे सप्ताह आयोजित किए जाएं। तभी सशस्त्र सेना झंडा दिवस सार्थक हो सकेगा।

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