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सीडीएस की नियुक्ति की घोषणा से नई संभावनाओं का जन्म

सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत

प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले के प्राचीर से घोषणा की कि सरकार देश में सैन्य सुधारों के एक हिस्से के रूप में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की नियुक्ति करेगी। इस पर कई तरह के विचार व्यक्त किए गए जिनमें अधिकांश विचार उम्मीदों से ओतप्रोत थे। कई लोगों को निराशा भी होगी क्योंकि कई अवसरों पर इस प्रकार की घोषणाएं हो चुकी हैं लेकिन इसे अभी तक अमल में नहीं लाया जा सका है।





सीडीएस की नियुक्ति की मांग रणनीतिक विचारक और सेना के कई लोग करते रहे हैं। बहरहाल नियुक्ति और इसके अधिकार की प्रकृति अलग-अलग रही है। इसके महत्व को इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि अधिकांश विकसित देशों ने इस मॉडल को अपना रखा है। राष्ट्रीय सुरक्षा के शीर्ष प्रबंधन के पुनर्गठन के लिए सरकार द्वारा गठित की गई प्रत्येक कमिटी इसकी सिफारिश करती रही है।

करगिल युद्ध के बाद सीडीएस की नियुक्ति की सिफारिश करने वाली सबसे उल्लेखनीय कमिटी सुब्रमण्यम कमेटी रही है। इसकी सिफारिशों में रक्षा मंत्रालय का पुनर्गठन, मुख्यालय समेकित डिफेंस स्टाफ (आईडीएस) का सृजन और सीडीएस की नियुक्ति करना शामिल है। इनमें से केवल मुख्यालय आईडीएस का ही सृजन किया गया, दूसरों की अनदेखी कर दी गई। आदर्श रूप से मुख्यालय आईडीएस को रक्षा मंत्रालय का हिस्सा होना चाहिए और वह प्रकार एकीकृत होनी चाहिए कि सरकार और सेना मुख्यालय के बीच विचार प्रक्रिया में एकरूपता हो तथा सेना मुख्यालय  के विचारों को सही तरीके से पहुंचाया जा सके।

इसके बाद सरकार ने नरेश चंद्र टास्क फोर्स का गठन किया। इसने सिफारिश की कि सीडीएस को एक स्थायी चेयरमैन चीफ ऑफ स्टाफ कमिटी (PCCDSC) में तबदील कर दिया जाए। इसका अर्थ यह हुआ कि सीडीएस एक फाइव स्टार नहीं बल्कि फोर स्टार जनरल बन जाएगा जो वर्तमान प्रमुखों के समकक्ष होगा, भले ही बराबरों में पहला अर्थात वरिष्ठ होगा। इसने संयुक्त कमान की अवधारणा को भी खारिज कर दिया।

दुनिया भर में इसके कई मॉडल हैं जिनमें आदर्श से लेकर निरर्थक सभी हैं। पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में, सीडीएस तीनों सेनाओं का प्रमुख होता है। अमेरिका में अवधारणा थिएटर कमानों एवं चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी की है। उनके मामले में, थिएटर कमानों के कमांडर सीधे डिफेंस सेक्रेटरी को रिपोर्ट करते हैं जबकि चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरमैन इस श्रंखला में बने रहते हैं। सबसे बुरी स्थिति पाकिस्तान की है जहां सीडीएस की नियुक्ति केवल शून्य को भरने के लिए होती है और उसे नाभिकीय बलों के लिए उत्तरदायी समझा जाता है, हालांकि वह सेना प्रमुख के अधीन कार्य करता है।

भारत के मामले में, सरकारों ने इससे डरते हुए कि पूरी सैन्य ताकत एक ही हाथ में आ जाएगी, सीडीएस की नियुक्ति पर विचार करने से भी परहेज किया है। यह खौफ पड़ोसी देशों की घटनाओं से और बढ़ गया है जहां कई अवसरों पर सेना ने देश की कमान संभाली है। मनमोहन सिंह सरकार ने अपना पूरा कार्यकाल सीडीएस की नियुक्ति पर केवल राजनीतिक सर्वसहमति बनाने में निकाल दिया।

तख्तापलट के इस खौफ का लाभ नौकरशाही उठाती रही है जिसे डर रहा है कि सीडीएस की नियुक्ति का परिणाम एक फाइव स्टार जनरल के रूप में सामने आएगा जो उसे कैबिनेट सचिव से वरिष्ठ बनाने के द्वारा इस जटिल प्रोटोकॉल श्रृंखला को प्रतिसंतुलित कर देगा। सरकार के भीतर व्याप्त इस डर से अवगत तीनों सेनाओं ने मध्य मार्ग के रूप में PCCOSC का भी प्रस्ताव रखा था।

उनके  इस प्रस्ताव के अनुसार, PCCOSC मुख्यालय आईडीएस का प्रमुख होगा और संयुक्त योजना निर्माण, खरीद योजनाओं के लिए उत्तरदायी होगा तथा विविध समितियों में सेना प्रमुख का प्रतिनिधित्व करेगा। वह तीनों सेनाओं को कमान नहीं करेगा, लेकिन उसके अधीन अंडमान एवं निकोबार, रणनीतिक बल, अंतरिक्ष, साइबर एवं स्पेशल फोर्स कमान सहित वर्तमान संयुक्त कमान होंगे। वह सरकार का एकल बिन्दु सैन्य सलाहकार होगा।

सीडीएस की नियुक्ति करने से अधिक महत्वपूर्ण है सेना मुख्यालय एवं रक्षा मंत्रालय का एकीकरण। वर्तमान प्रणाली में नौकरशाही है जिसे सैन्य मामलों का कोई इल्म नहीं है लेकिन वह सशस्त्र बलों और राष्ट्रीय सुरक्षा के सभी पहलुओं के लिए जिम्मेदार है। इससे आपस में तालमेल होने के बजाये समस्याएं ही बढ़ी हैं। रक्षा मंत्रालय के साथ सेना मुख्यालय के एकीकरण से इस समस्या का समाधान हो जाएगा।

जहां तीनों सेनाओं के प्रमुख के रूप में सीडीएस अभी वक्त का तकाजा है, लेकिन इससे उभरने वाली वास्तविकता अलग हो सकती है। रिपोर्टों के अनुसार, सरकार ने सीडीएस की नियुक्ति और जो अधिकार उसके पास अनिवार्य रूप से होने चाहिए, उनपर अपने विचार अग्रेषित करने के लिए सेना मुख्यालय से संपर्क स्थापित किया है।

अगर सीडीएस सभी बलों को कमान करता है तो इसका अगला तार्किक कदम संयुक्त कमानों का सृजन होगा। इस कदम के साथ, सेना प्रमुख की भूमिका बल नियोक्ता से बदल कर बल प्रदाता की हो जाएगी। वर्तमान में वायु सेना संयुक्त कमानों के सृजन की अवधारणा के खिलाफ है और कभी भी इस पर सहमत नहीं होगी।

दुनिया में कहीं भी सीडीएस का सृजन सेना प्रमुखों की मंजूरी के साथ नहीं किया गया है। यह हमेशा राजनीतिक इच्छा शक्ति के जरिये प्रेरित सरकार की कार्रवाई रही है। इस प्रकार, इस बात की पूरी संभावना है कि सेना मुख्यालय पीसीसीओएससी की तर्ज पर एक सीडीएस का सृजन करने का विचार रखेंगे जिसका अर्थ बलों के कमांडर की नहीं बल्कि स्टाफ की नियुक्ति है। यह सरकार की विचारधारा की तर्ज पर भी होगा जो सभी अधिकारों को एक ही जगह हस्तातंरित करने से परहेज करेगी और नौकरशाही के प्रोटोकॉल के साथ छेड़छाड़ करने से भी बचेगी।

प्रधानमंत्री द्वारा की गई घोषणा इस बात के संकेत है कि सुधार जारी हैं। इसके रूपांतरण का तरीका जरूर एक मूक प्रश्न बना हुआ है। कई अवसरों पर प्रधानमंत्री द्वारा की गई घोषणाएं और बाद में उनके कार्यान्वयन में अंतर रहा है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण ओआरओपी है। फाइव-स्टार जनरल के रूप में एक पूर्णकालिक सीडीएस की अपेक्षा करना बहुत अधिक उम्मीद करने जैसा है और राजनीतिक तथा नौकरशाही के डर के कारण भारत में इसकी बहुत कम संभावना है। पीसीसीओएससी की संभावना अधिक है लेकिन इसे सीडीएस के रूप में जाना जाएगा। बहरहाल  इससे अधिक महत्वपूर्ण रक्षा मंत्रालय और सेना मुख्यालय का एकीकरण होना चाहिए। यह हमेशा के लिए भारतीय सुरक्षा प्रबंधन को बदल देगा।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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