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अमरनाथ यात्राः यह सेतु है कश्मीर को भारत के साथ जोड़ने का

अमरनाथ गुफा

कड़ी सुरक्षा के बीच शुरू हो चुकी अमरनाथ यात्रा केवल तीर्थयात्रा भर नहीं है। तीर्थयात्रा के राष्ट्रीय कैलेंडर का एक प्रमुख हिस्सा होने के अलावा मानसरोवर यात्रा के समान ही यह एक समारोह है जो सेतु का अर्थात जोड़ने का काम करता है। यह देश भर से तीर्थयात्रा के लिए भक्तों को एकत्र करने का काम करता है जो वर्षों से अबाध गति से चला आ रहा है। इसके धार्मिक महत्व के अतिरिक्त यह सुदूर एवं अराजक क्षेत्रों में भी धार्मिक विविधता का संकेत देता है।





कश्मीर वासियों के लिए यह बेहद बेसब्री से प्रतीक्षित एक समारोह और राजस्व अर्जित करने का एक बड़ा स्रोत है। यात्रा के अंतिम रूट तक यात्रियों के लिए विविध प्रकार की अनिवार्य वस्तुओं की सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले अमूमन मुसलमान होते हैं जो कश्मीर घाटी के विभिन्न क्षेत्रों से आए होते हैं। यात्रा अवधि के दौरान उन्हें धन का अच्छा खासा लाभ प्राप्त होता है और इसलिए वे प्रत्येक वर्ष सख्त सुरक्षा जांचों एवं कठिन जीवन स्तर तथा कामकाजी स्थितियों के बावजूद वहां उपस्थित रहते हैं। वे सरल और कड़ी मेहनत करने वाले कश्मीरी होते हैं जो वहां की बहुसंख्यक आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और अपनी आमदनी से अपने परिवार और सगे संबंधियों के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। उनमें से कोई यह नहीं चाहता कि किसी आतंकी हमले के रूप में किसी प्रकार का कोई व्यवधान पैदा हो, क्योंकि इसका उनकी आजीविका पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

व्यापारियों के लिए यह समारोह बिक्री में किसी उपहार की तरह है। पर्यटन के लगातार कम होने के कारण इसी अवसर पर बड़े पैमाने पर हस्तशिल्पों की बिक्री होती है, क्योंकि तीर्थयात्री अपनी यात्रा की प्रिय यादगार वस्तु ले जाने के इच्छुक होते हैं। अधिकांश स्थानीय कश्मीरी खुशमिजाज और मददगार होते हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस प्रकार की कई खबरें आईं हैं जब स्थानीय लोगों ने यात्रा के दौरान फंसे यात्रियों या दुर्घटना के पीड़ितों की सहायता की है।

तीर्थयात्रियों के लिए सुरक्षा के जोखिम का कोई खास मायने नहीं होता। प्रत्येक वर्ष उनकी तादाद बढ़ती जाती है और उनका संकल्प भी बढ़ता जाता है। जब उनसे पूछा जाता है तो वे एक स्वर से यही कहते हैं कि चूंकि भारतीय सेना पर उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी है इसलिए उनके मन में किसी भी प्रकार का कोई भय नहीं है। वे बहुसंख्यक भारतीयों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अपने दिल की गहराईयों से सेना पर भरोसा करते हैं। चूंकि औसत भारतीय ही यात्रा करते हैं, इसलिए उनके द्वारा प्रदर्शित संकल्प एवं भावना साबित करती है कि देश किसी शत्रु या आक्रांता से भयभीत नहीं हो सकता जो उसके अंदरूनी तानेबाने को नष्ट करना चाहते हैं।

पाकिस्तान और आतंकी गतिविधियों में संलिप्त उसके मुट्ठी भर उग्रवादियों के लिए यह तीर्थयात्रा निहत्थे लोगों की एक बड़ी आवाजाही है, जिसमें देश के लगभग सभी हिस्सों के लोग मौजूद रहते हैं। वे एक विशिष्ट धर्म के अनुयायी होते हैं और रोजाना परिचित रास्तों से गुजरते हैं। वे महसूस करते हैं कि कोई दुर्घटना या इस तीर्थयात्रा पर कोई भी हमला उन्हें बेहिसाब बदनामी देगा।

इसलिए  ठहरने आने-जाने, मेडिकल से जुड़ी आपातकालीन स्थितियों तथा तीर्थयात्रियों की हिफाजत करने के दौरान हर कदम पर बेशुमार सावधानी बरती जाती है। आयोजकों के लिए यह उनकी आंखों की नींद उड़ा देने वाला समय होता है क्योंकि उन्हें बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना होता है और कई प्रकार के कार्यकलाप के अलावा यात्रा के संचालन में विविध प्रकार के कार्यों से जुड़ी कई तरह एजेन्सियों में समन्वय एवं तालमेल बनाने और अनगिनत प्रकार की आकस्मिक स्थितियों से निपटना होता है। मौसम की मार हमेशा ही यात्रा को और दुरुह बना देती है क्योंकि सड़कों के बाधित हो जाने से सुदूर स्थानों पर आवाजाही ठप पड़ जाती है।

यह यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा ही नहीं  बल्कि इसकी तुलना में और भी बहुत कुछ है। यह एक आम आदमी के एक धार्मिक दायित्व को पूर्ण करने के लिए कई प्रकार की बाधाओं से पार पाने के संकल्प का द्योतक है। यह दुनिया को संदेश देता है कि भारतीयों का उनकी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार बलों पर पूरा विश्वास है और कोई भी खतरा इस विश्वास और आस्था को डिगा नहीं पाएगा।

यह दुनिया के सामने यह भी प्रदर्शित करता है कि पूरा कश्मीर कोई समस्याग्रस्त क्षेत्र नहीं है और सभी कश्मीरी भारत-विरोधी नहीं हैं। यह वास्तव में ऐसी यात्रा है जो कश्मीर को शेष भारत के साथ जोड देती है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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