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AFSPA एक बार फिर बना बहस का केंद्र

सीआरपीएफ
फाइल फोटो

कांग्रेस ने जम्मू व कश्मीर के तहत अपने घोषणापत्र में कहा कि ‘ सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) और अशांत क्षेत्र अधिनियम की फिर से समीक्षा की जाएगी। सुरक्षा की आवश्यकताओं और मानवाधिकारों (एचआर) की सुरक्षा में संतुलन बनाने के लिए कानून में उपयुक्त बदलाव लाए जाएंगे। इसके बाद बयान से AFSPA एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है।





एक अधिनियम के रूप में AFSPA संसद द्वारा सबसे पहले वर्ष 1958 में पूर्वोत्तर में बढ़ती अराजकता से निपटने के लिए पारित किया गया था। यह आतंकवादियों और अन्य विद्वेषी ताकतों के खिलाफ शत्रुतापूर्ण माहौल में कार्यरत सेना के जवानों को सैन्य अभियान से संबंधित लचीलापन और सुरक्षा प्रदान करता है। इस कानून में पहले ही काफी बदलाव लाए जा चुके हैं। वर्तमान में भी यह एक सक्षम कानून बना हुआ है।

सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल 2017 में उन क्षेत्रों में भी जहां AFSPA लागू है, अफस्पां के एक मामले में फैसला सुनाया था कि पुलिस को मौत के उन सभी मामलों की जांच करनी चाहिए  जिसमें पीड़ित चाहे आतंकवादी, उग्रवादी या बागी ही क्यों न हों। इस आदेश में कहा गया कि यह लोकतंत्र, कानून के शासन के संरक्षण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है। इसलिए  यह कानून को प्रतिरक्षा या इस मामले में कोई छूट प्रदान नहीं करती। बहरहाल AFSPA की आलोचना करना तो आसान है लेकिन जब सैन्य टुकडि़यां विद्वेषपूर्ण माहौल में  खासकर, देश के प्रति शत्रुता का भाव रखने वाली ताकतों के निशाने पर रहती हैं तो वे अपने दायित्व को बेहतर ढंग से अंजाम दे सकें, इसलिए उन्हें सुरक्षा प्रदान किए जाने की जरूरत है।

सेना ने अभी हाल में एक विशिष्ट एचआर प्रकोष्ठ की स्थापना की है जिसकी रुपरेखा सीधे सेना प्रमुख के तहत कार्य करने के लिाए बनाई गई है। इसमें एक डीआईजी रैंक का आईपीएस अधिकारी भी होगा जो अन्य एजेन्सियों के साथ मिल कर मानवाधिकार मामलों की जांच का समन्वय करेगा। घाटी में प्रत्येक मुख्यालय में मानवाधिकार को समर्पित एक प्रतिष्ठान है। इस प्रकार  स्पष्ट है कि सेना मानवाधिकार मामलों को बहुत गंभीरता से लेती है।

कांग्रेस घोषणापत्र में इसे ‘आंतरिक सुरक्षा के शीर्ष’ में नहीं डाला गया है जहां तर्कसम्मत तरीके से इसका जिक्र किया जाना चाहिए था बल्कि ‘जम्मू एवं कश्मीर‘ के तहत इसका उल्लेख किया गया है जिसका सीधा तात्पर्य यह है कि यह विशेष रूप से घाटी के लिए है। कश्मीर घाटी में पाक द्वारा आतंकवाद को शह दिया जाता है और वहां अधिकतर आतंकियों की घुसपैठ कराई जा रही है, इसलिए वहां AFSPA अनिवार्य है। सियासी पार्टियां भले ही इसे कमजोर करना या हटाना चाहें, लेकिन इससे सेना के लिए एक बड़ी मुश्किल पैदा हो जाएगी।

अफस्पा को क्यों बने रहना चाहिए, इसकी वजह बहुत सरल है। किसी भी सेना को कभी भी अपने ही लोगों को निशाना बनाने के लिए प्रशिक्षित या सुसज्जित नहीं किया जाता। सेना को प्राथमिक रुप से दुश्मनों से देश की सुरक्षा करने एवं युद्ध लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। बहरहाल  जब बाहरी हस्तक्षेप होता है और स्थिति सभी प्रकार के पुलिस बलों के काबू से बाहर हो जाती है तो सरकार की व्यवस्था कायम करवाने की जिम्मेदारी सेना पर आ जाती है।

जब सेना पर इसकी जिम्मेदारी आ जाती है तो वह अपने अनुभव के अनुसार जवानों की भर्ती और तैनाती करती है। जहां पुलिस बलों के पास तलाशी लेने और गिरफ्तार करने का अधिकार है, सेना कई मामलों में बिना ऐसे अधिकारों के खुद ही यह काम करती है। इसलिए  उसे यह अधिकार प्रदान करना आवश्यक है। सरकार ही उसे यह जिम्मेदारी और अधिकार प्रदान करती है और इसे वापस लेने का फैसला भी सरकार का ही होता है।

ऐसे माहौल में सेना की भूमिका स्पष्ट होती है। उसका दायित्व सरकार के लिए ऐसे माहौल का निर्माण करना है जिससे कि सरकार अपनी कानूनी शासन व्यवस्था स्थापित करे। जब यह स्थापित हो जाती है तो सरकार ही इसे वापस लेने का फैसला करती है। इस प्रकार, इसकी तैनाती और इसे वापस लिया जाना दोनों ही सियासी फैसले हैं। अगर गलत तरीके से फैसले लिए गए तो ये नुकसानदायक साबित हो सकते हैं।

सेना देश की ताकत का आखिरी साधन है। इसका उपयोग तभी किया जाता है जब सरकार के पास उपलब्ध सभी अन्य ताकतें विफल हो जाती हैं। इसलिए, इसे विफल होने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अलावा इसके  यह केवल भारतीय सेना ही है जो आतंकवाद से आसानी से लड़ लेती है। कोई भी दूसरी सेना आतंकवाद से निपटने में नरम रवैया अख्तियार नहीं कर सकती। इसने कभी भी हेलिकॉप्टर जंगी जहाज, भारी हथियारों या वायु ताकतों का इस्तेमाल नहीं किया है। इसलिए, इस प्रकार के सैन्य अभियानों में उसे ही ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है।

ऐसे माहौल में काम करने वाली सेना की सुरक्षा में कमी लाने या उसमें संशोधन करने से कानूनी पचड़े से बचने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता होगी जिससे विद्वेषी ताकतों को बल मिलेगा। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हानिकारक साबित होगा। कांग्रेस जैसी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों को अपने घोषणापत्र में ऐसी टिप्पणियों को रखने से पहले इस बिंदु पर विचार करना चाहिए। अफस्पा में कमी के साथ सेना की तैनाती जारी रखना वैसे ही निरर्थक है जैसे ऐसे माहौल में केवल पुलिस बलों की तैनाती निरर्थक है। इसे या तो वर्तमान में विद्यमान स्थिति के रूप में जारी रखा जाना चाहिए या बलों को वापस बुला लिया जाना चाहिए और काबू पाने के लिए हालात को दूसरी एजेन्सियों के सुपुर्द कर दिया  जाना चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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