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कश्मीर पर एम एन वांचू से लो सबक…

प्रभात डबराल

कश्मीर के अलगाववादियों का समर्थन करोगे, पत्थरबाजों के पक्ष में बोलोगे, कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं था- ऐसा कहोगे और सोचोगे के लोग खुश होंगे तुम्हारा तर्क समझेंगे, तो तुमसे बड़ा मूर्ख कौन है। गाली खाने के काम करोगे तो गालियां ही पड़ेंगी न खाओ गाली खूब खाओ, हमें क्या लेकिन प्रॉब्लम ये है कि तुम्हारी मूर्खता से उनके हाथ मज़बूत होते हैं जो इस देश को तोड़ना चाहते हैं जो कश्मीर की समस्या को सुलझाना नहीं चाहते बल्कि इसे और उलझा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। इससे भी ज़्यादा गंभीर बात ये है कि मानवाधिकार के नाम पर दिए जा रहे तुम्हारे ऊलजलूल बयान उन लोगों के संघर्ष और क़ुर्बानियों पर पानी फेर देते हैं जिन्होंने जान हथेली पर रख कर अलगाववादियों से लोहा लिया और कुछ ने तो जान तक क़ुर्बान कर दी। हमारे आज के बड़बोले स्वयंभू ‘देशभक्त’ तुम्हारे साथ उन्हें भी लपेट दे रहे हैं।





एम एन वांचू का नाम सुने हो?.. 1989 में जब घाटी में पंडितों का नेता होने का दम भरने वाले सूरमा भी आतंकियों का मुक़ाबला करने की जगह बाक़ियों के साथ घाटी छोड़ भाग निकले तो वामपंथी मानवाधिकार वादी वांचू ने ऐसा नहीं किया- वे श्रीनगर में ही जमे रहे, आतंकियों को चुनौती देते रहे और साथ ही साथ सुरक्षा बालों की ज़्यादतियों के खिलाफ भी आवाज़ उठाते रहे। मैं 1990-91 में उनसे श्रीनगर मे मिला था। आतंकवाद चरम पर था, आम मुस्लमान भी घर से बाहर निकलने में डरता था, पंडित तो भाग ही चुके थे, लेकिन वांचू साहब एक थैला लटका कर खुलेआम घूमते थे। उन्हें आतंकी भी गाली देते थे और सुरक्षाबल भी…फिर एक दिन आतंकियों ने उन्हें मार डाला…उनका बेटा आज भी  श्रीनगर में रह रहा है…तुम जब ऊटपटांग तरीके से पत्थरबाज़ों की हिमायत करते हो तो आज के स्वयंभू देशभक्तों को वांचू जैसे असली देशभक्तों की सोच पर हमला करने का अवसर दे देते हो।

तुमने रंजूर का नाम भी नहीं सुना होगा…वो सीपीआई के राज्य सचिव  थे। अलगाववादियों के खिलाफ खुलकर बोलते थे। पब्लिक मीटिंग्स करते थे…1990-91 में आतंकियों ने उन्हें मार डाल। उनके कई और साथी भी आतंकियों के हाथों शहीद हुए। आज तुम्हारे कारण ये नक़ली देशभक्त वामपंथियों को ही देशद्रोही बोलने लगे हैं…कश्मीर मे अगर किसी राजनीतिक जमात ने वहीं घाटी में रहकर आतंकियों को खुलकर चुनौती दी तो सीपीआई और सीपीएम के कार्यकर्ता ही हैं, हालांकि उनकी तादाद बहुत कम है…सीपीएम के राज्य सचिव युसूफ तारिगामी आज भी वही हैं, उन पर कई हमले हो चुके हैं। फिर भी तुम्हारी हरकतों के कारण नकली देशभक्तों को वामपंथियों पर हमला करने का मौका मिल रहा है….

थोड़ा ज़ुबान पर काबू रखो यार, बुरा वक़्त है…देशहित में थोड़ा संयम भी ज़रूरी है…उनके हाथ मज़बूत मत करो जो देश तोड़ने पर आमादा हैं।

वरिष्ठ पत्रकार प्रभात डबराल के फेसबुक वॉल से…

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