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स्पष्ट मानसिकता की प्रतीक है आर्मी चीफ की साफगोई

सेना प्रमुख बिपिन रावत

सेना प्रमुख ने पिछले हफ्ते कई चैनलों को साक्षात्कार दिया। हर साक्षात्कार में उन्होंने कुछ समान बिंदुओं पर जोर दिया। पहला बिंदु यह था कि जम्मू एवं कश्मीर में आतंकवाद पाकिस्तान प्रायोजित है और जो सैन्य अभियानों में बाधा पहुंचाने के जरिये आतंकियों की मदद करते हैं वे भी देश के दुश्मन हैं। दूसरा बिंदु यह कि जब तक पाकिस्तान वास्तव में शांति के प्रति अपना इरादा नहीं जताता, पाकिस्तान के साथ बातचीत न करने की सरकार की नीति का समर्थन किया। उन्होंने यह कहते हुए इसे न्यायोचित ठहराया कि नियंत्रण रेखा से सटे क्षेत्रों में कोई बदलाव नहीं आया है, जहां घुसपैठियों की सहायता करने के लिए गोलीबारी की जाती है।





तीसरा बिंदु यह कि मणिपुर में सेना के खिलाफ ज्यादातर मामले पीडि़तों के प्रथम संबंधियों द्वारा दायर नहीं किए गए हैं बल्कि तीसरे पक्ष द्वारा दायर किए गए हैं जो न केवल झूठे हैं बल्कि उन्हें गलत इरादों की बू भी आती है। अधिकांश मामले बल के अत्याधिक प्रयोग के आधार पर दायर किए गए हैं। आखिर में, सेना प्रमुख ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का समर्थन किया और कहा कि जिन्हें अवैध नागरिक के रूप में चिन्हित किया गया है, उन्हें अवश्य निर्वासित कर दिया जाना चाहिए।

यह जगजाहिर है कि आतंकवाद पाक प्रायोजित और समर्थित है। अधिकांश आतंकी पाकिस्तानी नागरिक हैं, यह भी साबित हो चुका है। जब सुरक्षा बल आतंकियों (घुसपैठिये एवं स्थानीय आतंकी) के खिलाफ कार्रवाई करती है तो जो लोग पत्थर फेंकने के जरिये सेना की कार्रवाई में बाधा पहुंचाते हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि ऐसा करना गलत और गैरकानूनी है। इसलिए घाटी स्थित राजनीतिक दलों के विचारों के बावजूद  उन्हें आतंकियों के प्रति सहानुभूति रखने वाला माना जाना चाहिए और उनके खिलाफ भी वैसी ही कार्रवाई की जानी चाहिए। सेना प्रमुख ने बिल्कुल सही कहा कि इस तरह की करतूत आतंकी बनने की दिशा में पहला कदम है।

पाकिस्तान के खिलाफ राष्ट्रीय रणनीति पर चर्चा करते हुए उन्होंने इस तथ्य को रेखांकित किया कि पाकिस्तान अलग-थलग पड़ता जा रहा है और उसे अंतरराष्ट्रीय दबाव महसूस होने लगा है। ट्रम्प के हालिया साक्षात्कार एवं शेष पश्चिमी देशों से समर्थन न मिलने से अब उसके एकाध समर्थक ही रह गए हैं जिनमें चीन एवं सऊदी अरब उसके सबसे घनिष्ठ हैं। पाक की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि उसे आईएमएफ से कर्ज के लिए भीख मांगनी पड़ रही है। यही भारतीय रणनीति थी और यह सफल रही है और अगर भारतीय सरजमीं पर आतंकी हमला करने की पाक की कोशिशों का उसे मुकाबला करना है तो इस रणनीति से देश को भी लाभ होगा।

हालांकि पाक ने बातचीत के कुछ संकेत दिए हैं लेकिन जमीन पर उसके इरादे उससे मेल नहीं खाते। अगर बातचीत के लिए वह संजीदा था तो उसे कुछ सकारात्मक कदमों के जरिये अपने इरादों की झलक भी पेश करनी चाहिए थी। केवल बातचीत की मांग करने से कोई नतीजा नहीं निकलने वाला है। नियंत्रण रेखा हमेशा ही सक्रिय रहा है। गोलीबारी का स्तर घुसपैठ कराने की पाक की कोशिशों पर निर्भर करता है। भारत ने हमेशा बहादुरी के साथ उसका जवाब दिया है। उसने पाक को बिल्कुल सही चेतावनी दी कि सर्जिकल स्ट्राइक केवल एक ही विकल्प नहीं है। अगर पाकिस्तान ने कोई बड़ा हमला करने का प्रयास किया तो उससे निपटने के कई और तरीकों का भी उपयोग किया जा सकता है।

इन रिपोर्टों को देखते हुए कि आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए कुछ आतंकियों ने दिल्ली की दिशा में घुसपैठ किया है, सेनाप्रमुख ने पाक को जोरदार चेतावनी दी कि ऐसा हुआ तो उसका जोरदार प्रतिशोध लिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट वर्तमान में कुछ एनजीओ द्वारा सेना के खिलाफ दायर याचिकाओं के एक संकलन की सुनवाई कर रहा है जिसमें उन्होंने सेना पर न्यायेतर हत्याओं का आरोप लगाया है। इनमें से ज्यादातर मामलों में पीडि़तों के प्रथम संबंधियों द्वारा मुकदमे नहीं किए गए हैं जिन्हें तत्काल मामले की रिपोर्ट करनी चाहिए थी, बल्कि एनजीओ द्वारा दायर किए गए है। एनजीओ के इन कदमों का गुप्त अभिप्राय हो सकता है क्योंकि सेना को अदालत में घसीटने से सैन्य संचालनों की गति एवं उसके संचालन पर प्रभाव पड़ता है।

इस वर्ष 09 सितंबर को ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया कि सेना मुख्यालय उत्तर पूर्व में सैन्य संचालनों की धीमी गति से चिंतित है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सेना के जवानों के खिलाफ निर्देश जारी किए हैं। इसका नतीजा सेना के जवानों के हताहत होने की संख्या में बढ़ोतरी तथा आतंकियों को नगण्य नुकसान होने के रूप में आया। यह आतंकियों को फिर से संभलने का मौका दे सकता है और शायद यही इन एनजीओ का इरादा भी हो। सेनाप्रमुख ने बिल्कुल सही इच्छा जताई है कि इसकी भी जांच होनी चाहिए।

एनआरसी एक प्रकार की कवायद है जो वर्तमान में केवल असम में उपयोग में लाई जा रही है। हालांकि अंतिम कदम अभी उठाए जाने हैं, पर इस प्रकार की कोशिश जम्मू जैसे नगरों में भी की जानी चाहिए जहां बांग्लादेशी और रोहिंग्याओं की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है। अगर इसे समय रहते नियंत्रित न किया गया तो यह आबादी के संतुलन को बदल कर रख देगा और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करेगा। हालांकि मीडिया में इस कदम की सियासी मंसूबों के रूप में आलोचना की गई है, लेकिन ऐसी टिप्पणियों के देश के लिए सुरक्षा संबंधी पहलू भी हो सकते हैं जिसे सुरक्षा के नजरिये से विश्लेषित किए जाने की आवश्यकता है।

इस साक्षात्कार में सेना प्रमुख ने जानबूझ कर सियासी बातों से परहेज किया लेकिन बेहद जरूरी बिंदुओं को जरूर सामने रखा। जो लोग सैन्य अभियानों में बाधा पहुंचा रहे हैं उनके लिए खुली चेतावनी थी कि आपको पाक परस्त समझा जाएगा और आप पर कोई रहम नहीं किया जाएगा। जो एनजीओ सेना के खिलाफ झूठे मामले उछाल रहे हैं, उनके लिए भी चेतावनी थी कि सरकार आपके इरादों और फंडिंग की पड़ताल करेगी। सेना प्रमुख हमेशा सावधानीपूर्वक और ठोस तथ्यों के आधार पर बोलते हैं और यह इसका एक जीवंत उदाहरण था।

अंत में, पाकिस्तान के लिए एक स्पष्ट संकेत था कि वह अपने दुस्साहसों को घाटी तक ही सीमित रखे, इससे आगे बढ़ने पर उसे भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

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ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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