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1971: गौरवशाली विजय को याद करने का सप्ताह

1971 भारत-पाक युद्ध
फाइल फोटो

48 वर्ष पहले इस सप्‍ताह पाकिस्‍तान के खिलाफ सैन्‍य अभियान पूरी तेजी पर था। 16 जून, 1971 को तत्‍कालीन पूर्वी पाकिस्‍तान में पाक सेना ने भारतीय सेना और मुक्‍ति वाहिनी के सामने आत्‍म समर्पण कर दिया था। समर्पण वाले दस्‍तावेज में कहा गया, पाकिस्‍तानी पूर्वी कमान ईस्‍टर्न थियेटर में भारत और बांग्‍ला देश सैन्‍य बलों के जनरल आफिसर कमांडिंग इन चीफ जगजीत सिंह अरोडा के सामने बांग्‍ला देश में सभी पाकिस्‍तानी सशस्‍त्र बलों के आत्‍म समर्पण के लिए राजी है। बांग्‍लादेश उस वर्ष मार्च से ही वजूद में आ चुका था और आखिरकार पाकिस्‍तान के जुल्‍मों सितम से आजाद हो चुका था।





भारत के लिए यह गौरव का क्षण था। अमेरिका ने अपने सातवें बेडे को तैनात करने की धमकी दी थी लेकिन सोवियत संघ से भारत को मिले समर्थन ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया। भारत ने अंततोगत्‍वा पाकिस्‍तान का विभाजन कर दिया और एक सीमा से उढ़ने वाले संभावित खतरे को समाप्‍त कर दिया। दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद यह पहला अवसर था जब एक नए देश का जन्‍म हुआ।  भारत ने नामुमकिन को मुमकिन बना दिया था और वो भी केवल 14 दिनों में ही। पाक के अखबार अपनी सेना से मिल रही खबरों के आधार पर अंतिम दिन तक अपनी जीत का दावा करते रहे। उन्‍हें लगता रहा कि चीन एक नया मोर्चा खोल देगा या अमेरिका का सातवां बेडा उनके बचाव में आएगा। जब उन दोनों देशों ने इस लड़ाई से दूरी बना ली तो पाक की समझ में यह बात आ गई कि अब उसके सामने आत्‍म समर्पण करने के अलावा और कोई चारा नहीं है।

93,000 बंदियों का आत्‍मसमर्पण भी दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा आत्‍म समर्पण था। भारत के पास कई विकल्‍प थे लेकिन उसने किसी पर भी ध्‍यान नहीं दिया। उसने बंदियों की रक्षा की तथा उनमें से किसी को भी युद्ध अपराध के लिए सौंपने से मना कर दिया। युद्ध अपराध की उसकी कार्रवाई को उचित भी ठहराया जा सकता था क्‍योंकि आखिर 30 लाख बांग्‍लादेशी मारे गए थे और लाखों महिलाओं के साथ बलात्‍कार हुआ था और उन्‍हें प्रताडित किया गया था। केवल इसकी धमकी भर से पाकिस्‍तान दहशत में आ सकता था। भारत के पास कश्‍मीर समस्‍या के समाधान के लिए प्रयास करने का भी शानदार अवसर था जिसे भारत ने गवां दिया।

दूसरी तरफ यह हार पाक सेना के लिए जलालत का वक्‍त था जिससे वह आज तक नहीं उबर सका है। कारगिल में उसका सैन्‍य अभियान अपनी खो चुकी इज्‍जत को कुछ हद तक फिर से पाने की कोशिश थी, लेकिन उसका नतीजा उसकी एक और हार के रूप में सामने आया। पूर्वी पाकिस्‍तान में मिली हार के बाद अपने देश के भीतर अपनी खोई इज्‍जत को छुपाने के लिए पाक सेना ने अपने बच्‍चों के सामने इतिहास को तोड मरोड कर पेश करना शुरू कर दिया।

पाकिस्‍तान में इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता है 1965 की लड़ाई के बाद भारत ने बंगाल के हिन्‍दुओं के साथ मिलकर साजिश की और पश्‍चिम पाकिस्‍तान के खिलाफ बंगालियों में नफरत फैलाना शुरू कर दिया और अंत में 1971 के दिसंबर में पूर्वी पाकिस्‍तान पर हमला कर दिया जिसका नतीजा पूर्वी पाकिस्‍तान और पश्‍चिमी पाकिस्‍तान की टूट के रूप में सामने आया। बांग्‍लादेश की जनता पर उनके अत्‍याचारों या उनके नेतृत्‍व की विफलता या यह कि इसकी वजह पश्‍चिम पाकिस्‍तान के राजनीतिक तंत्र उन चुनाव परिणामों को स्‍वीकार न करना पड़ा।

बहरहाल पाकिस्‍तान ने इस करारी हार से कोई सबक नहीं सीखा। उसने बांग्‍लादेश के लोगों को हिंसात्‍मक रूप से कुचलने की कोशिश की। उसके बल प्रयोग का जोरदार तरीके से प्रतिरोध हुआ। उसने यह स्‍वीकार करने से मना कर दिया था कि बांग्‍लादेश का भी समान अधिकार है और इसलिए उसे भी इज्‍जत दिया जाना जरूरी है। इसके विपरीत, उसने शेख मुजीबुर्रहमान को जेल भेजने के जरिये नेतृत्‍व के खिलाफ कार्रवाई की जबकि उसे सत्‍ता को साझा करना चाहिए था। पाकिस्‍तान अब बलुचिस्‍तान और खैबर पख्‍तुनख्‍वा में वैसी ही कार्रवाई कर रहा है और वहॉं के लोगों से उसे वैसे ही विरोध का सामना करना पड रहा है। बहुत जल्‍द उसका एक और विभाजन भी हो सकता है।

भारतीय सशस्‍त्र बलों के लिए 1971 इसके गौरव के शिखर का वर्ष था। 1962 में पराजय और 1965 में छोटी जीत के बाद 1971 की शानदार सफलता ने देश को गौरवान्‍वित कर दिया। बलों के भीतर का आत्‍मविश्‍वास इसके बाद 1999 में कारगिल में एक बार फिर दिखाई दिया। तब से भारतीय सशस्‍त्र बलों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है।

भारत और बांग्‍लादेश हर वर्ष 1971 की जीत एक साथ मनाते हैं। इस अवसर को विजय दिवस कहा जाता है। वर्तमान में सेवारत जवानों और परिवारों के साथ साथ बांग्‍लादेश की पूर्व मुक्‍ति वाहिनी के सदस्‍य कोलकाता का दौरा करते हैं जहां वे संयुक्‍त रूप से उन लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जिन्‍होंने लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति दी। साल 1971 के युद्ध के भारत की तरफ से लड़े पूर्व सैनिक भी इस अवसर पर उपस्‍थित रहते हैं।

इस दौरे के दौरान दोनों बलों के सदस्‍य अपने विवरणों और यादगारियों का आदान-प्रदान करते हैं। मुक्‍ति वाहिनी के कई सदस्‍य बड़े चाव से अपने भारतीय कमांडिंग अधिकारियों और देश में प्राप्‍त प्रशिक्षण को याद करते हैं। इसी प्रकार भारतीय भी इसी तरह की श्रद्धांजलि देने बांग्‍लादेश का दौरा करते है।

1971 की जीत मुख्‍य रूप से उस भरोसे के कारण थी जो राजनीतिक नेतृत्‍व ने सशस्‍त्र बलों पर जताई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का सेना प्रमुख फील्‍ड मार्शल एसएचएफजे मानेकशॉ पर पूरा भरोसा था और उन्‍होंने सेना को अभियान का समय, गति चुनने की पूरी आजादी दी और कोई हस्‍तक्षेप नहीं किया। नौकरशाही को इससे परे रखा गया क्‍योंकि मानेकशॉं की राष्‍ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मामलों में सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंच थी और इसका नतीजा जीत के रूप में सामने आया। क्‍या वर्तमान परिस्‍थितियों में भी इसी प्रकार का माहौल बनाया जा सकता है ? अगर ऐसा होता है तो राष्‍ट्रीय सुरक्षा का प्रबंधन और बेहतर हो जाएगा ।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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