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अफगान में भारतीय फौज क्यों नहीं

रंजीत-कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

रंजीत कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

अफगानिस्तान भारत का पड़ोसी देश है और वहां हमेशा अशांति और अस्थिरता का बना रहना भारत के अल्पकालिक और दीर्घकालिक सामरिक हितों के नजरिये से ठीक नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि अपने सामरिक हितों की रक्षा के लिये भारत क्या करे? क्या अमेरिका की मांग पर भारत वहां अपनी फौज तैनात कर दे जो पाकिस्तान समर्थित तालिबानी आतंकियों से लड़ाई को तैयार रहे। पिछले सप्ताह अमरीकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस जब भारत आए तो अफगानिस्तान की सुरक्षा में भारत को बेहतर योगदान देने को कहा। लेकिन भारतीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ इनकार कर दिया। वास्तव में अफगानिस्तान में फौज तैनात करने की मांग अमेरिका ने पिछले दशक के शुरू में भी की थी जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। लेकिन तब गहन मंथन के बाद भारतीय नेतृत्व ने इसे मंजूरी नहीं दी थी।
मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के बीच में स्थित अफगानिस्तान की भूराजनीतिक स्थिति ऐसी है कि वहां अपना प्रभुत्व जमाने के लिये अस्सी के दशक से ही बड़ी ताकतों के बीच होड़ चल रही है। अस्सी के दशक में जब वहां तत्कालीन सोवियत संघ ने अमेरिका को पांव जमाने से रोकने के लिये अपनी फौज भेज दी और बबरक करमल की अगुवाई में सोवियत समर्थक कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना की तो अमेरिका को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और वहां से सोवियत समर्थक सरकार को उखाड़ फेंकने के लिये कट्टरपंथी जेहादी ताकतों को सैनिक और आर्थिक मदद दी और इसमें पाकिस्तान को साझेदार बनाया। पाकिस्तान ने भी इसमें अपना सामरिक हित देखा और सोचा कि अफगानिस्तान पर यदि इस्लामी ताकतों का कब्जा हो जाए तो वह पाकिस्तान के लिये सामरिक पिछवाड़े का काम करेगा। यानी भारत से जब युद्ध होगा तो अपने सामरिक हथियारों को वहां तैनात कर देगा जहां भारत उन पर हमला करने की जुर्रत नहीं कर सकेगा।
लेकिन वहां हालात तेजी से बदले और 2001 में अमेरिका ने अफगानिस्तान पर मिसाइलों की वर्षा कर अलकायदा औऱ जेहादी तालिबानी ताकतों को तो उखाड़ फेंका औऱ कुछ सालों तक वहां अपनी फौज की ताकत के बल पर जनतांत्रिक सरकार को जमाने में अभूतपूर्व योगदान दिया लेकिन इसके बाद अमेरिका के पांव वहां से डगमगाने लगे और इसी का नतीजा है कि अफगानिस्तान में एक बार फिर से पाकिस्तान समर्थक तालिबानी ताकतें वहां आतंक का नंगा नाच दिखा रही हैं।





अफगानिस्तान की जनतांत्रिक सरकार को अपना पांव जमाने के लिये भारत ने तीन अरब डालर के निवेश से विकास और पुनर्निर्माण के कई प्रोजेक्ट पूरे किये जिसमें ईरान की सीमा से मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान को जोड़ने वाले राजमार्ग तक 220 किलोमीटर लम्बा राजमार्ग बना दिया, संसद की नई इमारत बनवा दी, अस्पताल खुलवाए, बिजली पैदा करने के लिये बांध बनवाए, स्कूलों को फिर से सक्रिय किया और सुरक्षा बलों के हजारों जवानों को ट्रेनिंग दी।

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत यह सब काम अमेरिका और उसके साथी देशों के सवा लाख से अधिक सैनिकों की सुरक्षा छतरी के नीचे ही कर सका। लेकिन अब अफगानिस्तान से यूरोपीय फौज हट चुकी है और अमेरिका के केवल आठ हजार सैनिक ही बचे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वहां आठ हजार अतिरिक्त फौज भेजने का वादा किया है लेकिन अब वह भारत से भी उम्मीद कर रहा है कि वहां अपनी फौज भेज दे।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र के तहत दुनिया भर में शांति रक्षक भूमिका भारत निभाता रहा है लेकिन अफगानिस्तान में विदेशी फौज संयुक्त राष्ट्र के तहत नहीं गई हैं इसलिये भारत वहां अपनी फौज किसी दूसरे देश के झंड़े तले तैनात नहीं कर सकता। अफगानिस्तान में शांति व स्थिरता के लिये भारत जो योगदान दे चुका और आगे देने वाला है वही वहां सुरक्षा बनाए रखने में काफी सहायक साबित होगा।

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