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इन 15 खास वजहों से याद किए जाएंगे केपीएस गिल

केपीएस गिल

नई दिल्ली। पंजाब को आतंकवाद से छुटकारा दिलाने वाले ‘सुपर कॉप’ कंवर पाल सिंह यानी केपीएस गिल का शुक्रवार को निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे। असम-मेघालय कैडर के 1958 बैच के आईपीएस अफसर केपीएस गिल ने उत्तर-पूर्वी राज्य असम में एक पुलिस अधिकारी के रूप में अपने करिअर की शुरूआत की। उनकी छवि एक कठोर अधिकारी की थी, लेकिन 1990 के दशक में जब उन्हें सिख बहुल राज्य में आतंकवाद और अलगावाद को मिटाने का जिम्मा सौपा गया तब पंजाब पुलिस में वह एक बड़ा नाम थे और उन्हें पंजाब के सुपर कॉप के रूप में पहचान मिली। आइए, आपको बताते हैं उनके जीवन से जुड़ी कुछ अहम बातें…





सुपर कॉप केपीएस गिल का दिल्ली के गंगाराम राम अस्पताल में निधन
केपीएस गिल

गिल पंजाब में ही जन्मे थे और अपनी जन्मभूमि से आतंकवाद का नामो निशां मिटा दिया।

गिल का जन्म पंजाब के लुधियाना में हुआ था। उन्होंने 1958 को पुलिस सेवा ज्वाइन की।

दस साल तक पंजाब आतंकवाद की जद में था जिसमें तकरीबन 10 हजार लोग प्रभावित हुए थे। केपीएस गिल ने पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन पर सख्त कार्रवाई की थी।

केपीएस गिल

अपनी प्रशासनिक सेवाओं के दौरान उन्होंने एक दमदार आॅफिसर के रूप में काम किया।

 

1988 को उन्होंने खालिस्तानी चरमपंथियों के खिलाफ ‘आॅपरेशन ब्लैक थंडर’ की कमान संभाली। ये आॅपरेशन काफी कामयाब हुआ।

केपीएस गिल

रिटायर होने के बाद भी केपीएस गिल प्रशासनिक सलाहकार के रूप में कार्यरत थे।

1989 से 1990 के बीच पंजाब खालिस्तानी आतंकवाद की आग में झुलस रहा था उस समय डीजीपी पद पर आसीन गिल ने जीरो टॉलरेंस पॉलिसी अपनाई और पंजाब में उग्रवाद को जड़ से खत्म कर दिया।

रिटायर होने के बाद भी गिल विभिन्न सरकारों को आतंकवाद विरोधी नीति निर्माण की सलाह देने में व्यस्त रहे। पिछले वर्ष श्रीलंका में भी उन्होंने इस संबंध में सरकारी सलाहाकार की भूमिका निभाई।

केपीएस गिल

आतंकवाद प्रभावित पंजाब में खास तकनीक से कामयाबी पाई थी।

गिल ने ‘द नाइट (योद्धा) आॅफ फाल्सहुड’ नामक एक किताब भी लिखी है। इस किताब में गिल ने पंजाब में स्वतंत्रता संग्राम की राजनीति और धार्मिक संस्थानों के दुरूपयोग के बारे में जिक्र किया है।

केपीएस गिल महात्मा गांधी को अपना रोल मॉडल मानते थे।

गिल फॉल्टलाइन्स पत्रिका के संपादक भी थे और इंस्टीटट्यूट आॅफ कॅनफ्लिक्ट मैनेजमेंट नामक संस्था चलाते थे।
केपीएस गिल ने अफगानिस्तान में युद्ध के माहौल में 218 किलोमीटर देलारम जरंज हाईवे का निर्माण चार वर्ष में कराया।

केपीएस गिल

अपने कार्यकाल में अपने कार्य के प्रति काफी संजीदा थे केपीएस गिल

2006 में सुरक्षा सलाहकार के रूप में छत्तीसगढ़ सरकार को बस्तर की तीन सड़कों के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाई। बाद में ये सड़कें नक्सल इलाकों तक पहुंचने में अहम साबित हुर्इं थी।

छत्तीसगढ़ सरकार ने गिल को नक्सल गतिविधियों को रोकने में भी सरकार की मदद के लिए नियुक्त किया था।

गुजरात के गोधरा दंगों के दौरान स्थिति को संभालने के लिए सुपरकॉप के रूप में इस मशहूर आईपीएस को गुजरात के उस समय के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया था।

केपीएस गिल

प्रशासनिक सेवा के दौरान पंजाब में उनके सक्रिय योगदान के चलते उन पर राहुल चंदन द्वारा लिखी एक किताब भी प्रकाशित हो चुकी है।

केपीएस गिल के जीवन पर आधारित राहुल चंदन की लिखी पुस्तक द पैरामाउंट कॉप में उनके बारे में जिक्र किया गया है कि पंजाब में एक ऐसा आदमी निकला जिसने पुलिस में जान भर दी।

किताब के मुताबिक उस दौर में एक डीआईजी स्वर्णमंदिर मत्था टेकने गया था उसे मार दिया गया, लेकिन उसकी लाश उठाने कोई जाने को तैयार नहीं था। लोगों में इतना खौफ था कि पांच बजे बाजार बंद हो जाते थे और पुलिस स्टेशन बंद हो जाते थे। इस दौरान यहां 25 हजार लोग मारे गए थे।

केपीएस गिल

भारतीय हॉकी संघ के अध्यक्ष भी रहे केपीएस गिल

पंजाब में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद केपीएस गिल वर्ष 1995 में पुलिस फोर्स से रिटायर हुए। पंजाब में प्रशासनिक सेवा में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें 1989 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

विवादों से भी गिल का खूब नाता जुड़ा रहा। एक वरिष्ठ महिला आईएएस अधिकारी रूपन देओल बजाज ने केपीएस गिल पर यौन दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था। 17 साल बाद उन्हें इस मामले में दोषी ठहराया गया था, लेकिन गिल की सजा और जुर्माना कम कर दिए गए थे और उन्हें जेल भी नहीं भेजा गया।

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