Assam Rifles

जानिए, दलाई लामा के लिए क्यों खास है असम रायफल्स का यह जवान?

धर्मशाला। रविवार को सुगलगखांग मंदिर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा असम राइफल्स के एक रिटायर्ड जवान से मिलकर काफी भावुक हो गए। जी हां, दरअसल यह वही जवान था जिसने 1959 में उनके भारत आने के दौरान उन्हें सुरक्षा प्रदान की थी। आपको जानकारी दे दें कि तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद दलाई लामा अपने समर्थकों के साथ मार्च, 1959 में 5 असम राइफल्स के सात जवानों की मदद से भारत पहुंचे थे। इन जवानों में असम राइफल्स के जवान नरेन चंद्र दास भी शामिल थे।





इनकी वजह से जिन्दा हैं दलाई लामा

तिबब्त के निर्वासित नेता दलाई लामा अगर आज जिंदा हैं तो नरेन चंद्र दास नामक उस शख्स की बदौलत जो एक जमाने में असम रायफल्स का जवान था। दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश से 31 मार्च 1959 को भारत आए थे। उस समय 5 असम रायफल्स के छह जवानों के साथ असम के सोनितपुर निवासी नरेन दास ने दलाई लामा को सुरक्षा प्रदान कर उन्हें भारत भूमि तक सुरक्षित पहुंचाया। गौरतलब है कि उन सात जवानों में से नरेन दास ही एकमात्र जीवित बचे हुए हैं।

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1959 में तब नरेन चंद्र दास की उम्र महज 23 साल थी, जबकि दलाई लामा 22 वर्ष के थे जब उन्हें तिब्बत से निकालकर भारत लाया गया। पिछले 60 वर्षों में इन दोनों की मुलाकात पिछले साल अप्रैल में गुवाहाटी में हुई थी। इस दौरान दलाई लामा ने नरेन को एक सिल्क की शॉल भी भेंट की थी। दलाई लामा ने तब खुद को शरण देने के लिए भारत और यहां के नागरिकों का धन्यवाद किया था।

बीमार होने पर भी नहीं ठुकरा सके निमंत्रण

स्वास्थ्य ख़राब होने पर भी नरेन दास ने दलाई लामा का निमंत्रण स्वीकार किया और सुगलगखांग मंदिर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान दलाई से मिलने पहुंचे। इस दौरान उन्हें VIP ट्रीटमेंट दिया गया वहीं कार्यक्रम के बीच दलाई लामा सबसे पहले नरेन चंद्र दास के पास गए और उनका स्वागत किया। यही नहीं वह नरेन को गले लगाने से भी खुद को नहीं रोक सके।

दलाई लामा के कार्यक्रम में शामिल हुए नरेन दास ने कहा, ”मैं इतनी लम्बी यात्रा करने में असमर्थ हूं, लेकिन दलाई लामा के साथ अपने साझा अतीत को याद करने उनसे मिलने आया हूं। उस दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि तिब्बती धर्मगुरु से पहली मुलाकात के दौरान जब उन्होंने पहली बार भारतीय सीमा में प्रवेश किया तो धर्मगुरु एक घोड़े की पीठ पर बैठे हुए थे और उनके साथ तकरीबन बीस अंगरक्षक थे। 60 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद उन्हें एक वैश्विक आध्यात्मिक नेता के रूप में उनको मिली ख्याति से मैं गर्व महसूस कर रहा हूं।”

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