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CRPF की ‘लेडी सिंघम’, घाटी में बखूबी निबटती हैं पत्थरबाजों से

नई दिल्ली: सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी… आतंकियों के अलावा इनके स्थानीय हमदर्दों से निबटने की चुनौती… किस रास्ते पर पत्थरबाजों का झुंड मिल जाए कुछ पता नहीं… एक निश्चित संख्या में सुरक्षाबलों की टोली… भटके हुए अपनों को बचाने की भी जिम्मेदारी… ये सारी चुनौतियां धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में गाहे-बगाहे आती रहती हैं लेकिन पिछले साल हालात तब गंभीर हो गए जब हिजबुल के आतंकी बुरहान बानी का एनकाउंटर किया गया। बिगड़े माहौल से निबटने के लिए एक महिला अफसर ने मोर्चा सम्भाला तो बवालियों के पैर उखड़ गए। यह महिला अफसर है 28 वर्षीय कंचन यादव, 2010 यूपीएससी, सीआरपीएफ बैच की अधिकारी। कंचन श्रीनगर में सीआरपीएफ 44वीं बटालियन की असिस्टेंट कमांडेंट हैं। उनके दृढ निश्चय और अदम्य साहस ने घाटी में ‘लेडी सिंघम’ का नाम दिया। कंचन को वहाँ के पत्थरबाजों से निबटने में महारथ हासिल है।





कंचन श्रीनगर में सीआरपीएफ 44वीं बटालियन की असिस्टेंट कमांडेंट हैं।

कंचन श्रीनगर में सीआरपीएफ 44वीं बटालियन की असिस्टेंट कमांडेंट हैं। उनके दृढ निश्चय और अदम्य साहस ने घाटी में ‘लेडी सिंघम’ का नाम दिया।

बुरहान बानी के एनकाउंटर के बाद धरती का स्वर्ग लगभग नर्क में तब्दील हो गया था। सुरक्षाबलों पर आम लोगों ने जमकर पत्थरबाजी की। कई जवान घायल हुए तो कई लोग मारे भी गए। सुरक्षाबलों के सामने चुनौतियां बहुत ही कठिन। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि वह किसके खिलाफ एक्शन लें, आतंकियों के या फिर अपनों के? लेकिन इन सबके बीच ‘लेडी सिंघम’ कंचन यादव भी थीं, जिनके पास पत्थरबाजों और सुरक्षाबलों के भटके हुए दुश्मनों से निबटने के साथ-साथ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी है। उनकी पोस्टिंग श्रीनगर के पुराने शहर के पत्थर मस्जिद क्षेत्र में है।

पत्थर मस्जिद वह क्षेत्र है जहां सुरक्षाबलों को कई साल से पत्थरबाजों से निबटना पड़ रहा है लेकिन बुरहान बानी के एनकाउंटर के बाद यहां के हालात और बिगड़ गए थे। ऐसे में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और पत्थरबाजों से निबटने के लिए कंचन यादव ने अदम्य साहस का परिचय दिया। वह सुबह से रात तक घाटी की सड़कों पर पत्थरबाजों से निबटने के लिए डटी रहती थीं। ‘लेडी सिंघम’ की पहली पोस्टिंग 2015 में श्रीनगर में ही हुई थी।

कंचन कहती हैं, मेरे लिए देश सर्वोपरि है और मुझे अपना काम बहुत पसंद है। मैंने देश सेवा के लिए फोर्स ज्वाइन की। जब आप वर्दी पहनते हैं आपके ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। जब कंचन से यह पूछा गया कि उन्हें पत्थरबाजों से निबटने में कैसी-कैसी दिक्कतें हुई तो उन्होंने कहा कि शुरू-शुरू में उन्हें थोड़ी दिक्कते हुईं लेकिन शीर्ष अधिकारियों के निर्देशन में वह अपनी ड्यूटी करती रही और धीरे-धीरे उन्हें परिस्थितियों को काबू करना आ गया। वह कहती हैं कि हम महिलाएं किसी से कम नहीं हैं। बस आप अपने दिल की सुनिए और आप कुछ भी कर सकती हैं।

एक सवाल के जवाब में कंचन यादव ने कहा कि, जब फोर्स में ट्रेनिंग लेकर काम करने के लिए मैदान में निकलते हैं तो सबसे पहले एक बात मन में रहती है कि हम फोर्स का हिस्सा हैं। उनके मुताबिक, ऐसे में महिला और पुरुष की कोई बात नहीं रह जाती और सिर्फ देश की सेवा सुरक्षा की भावना रह जाती है। उन्होंने कहा कि, मैंने और मेरे पति ने अपना जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया है। परिवार इसके बीच नहीं आता। कंचन के पति नौसेना में अफसर हैं।

‘कंचन यादव हमारी लेडी सिंघम’

उनकी बटालियन के लोग उन्हें ‘लेडी सिंघम’ कहकर बुलाते हैं। लंबे समय से अशांत घाटी में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी कंचन के ही कंधों पर है। उनकी बटालियन के जवान कहते हैं कि एक फिल्म है जिसमें एक अफसर को ‘सिंघम’ कहा जाता है लेकिन हमारे लिए कंचन यादव रियल लाइफ में लेडी सिंघम है। हालांकि, कंचन यादव कहती हैं वह सिर्फ अपनी ड्यूटी करती हैं और यदि वह लेडी सिंघम हैं तो फोर्स का हर जवान सिंघम है।

कंचन यादव के बारे में

  • हरियाणा की रहने वाली कंचन में देशप्रेम का जज्बा अपने परिवार से ही आया है।
  • 2010 यूपीएससी, सीआरपीएफ बैच की अधिकारी
  • उनकी मां भी सीआरपीएफ में असिस्टेंट कमांडेंट हैं और इस समय  मणिपुर में चुनावी ड्यूटी में लगी हैं।
  • कंचन के नाना पैरामिलिट्री फोर्स से रिटायर हुए थे। जबकि पिता वायुसेना से रिटायर हुए हैं।
  • उनकी मां 1999 में करगिल युद्ध के समय कश्मीर में ही तैनात थीं। उस समय 11 साल की उम्र में कंचन पहली बार कश्मीर गई थीं।
  • कंचन के पति नौसेना में अफसर हैं। दोनों ने दिसंबर 2015 में शादी की थी।

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