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कोबरा कमांडोज यानी नक्सलियों के लिए खौफ, जानें 7 खास बातें

आतंकियों और नक्सलियों का पल भर में काम तमाम कर देने के लिए  कोबरा बटालियन का गठन किया गया है। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की यह बटालियन अपनी फुर्ती, चाल, आक्रमण से ऐसा कर दिखाती है कि दुश्मन को पता ही नहीं चलता कि कब उसका सफाया हो गया। यह बटालियन विशेष रूप से उन इलाकों में तैनात की जाती है जहां नक्सली गाहे-बगाहे खूनी खेल खेलते हैं। कोबरा यानी ‘Commando Battalion for Resolute Action’ कोबरा कमांडोज घने जंगलों में घुसकर नक्सलियों से लोहा लेते है और उन्हें मौत के घाट उतारते हैं। इसलिए इन्हें गोरिल्ला वॉर के लिए निपुण माना जाता हैं। आइये जानते हैं इन कमांडोज की 7 खास बातें-





 10 यूनिट में बंटी है कोबरा बटालियन

 

कोबरा कमांडो

कोबरा बटालियन को दस यूनिट में बांटा गया है। ये यूनिट उन सभी दस अलग-अलग राज्यों में तैनात हैं जो नक्सलवाद से प्रभावित है। प्रत्येक यूनिट में 1,300 जवान शामिल होते हैं।

ऐसे चुने जाते हैं कोबरा कमांडोज

कोबरा बटालियन मुठभेड़ के दौरान

कोबरा बटालियन के लिए कमांडोज सीआरपीएफ जवानों में से चयनित किए जाते हैं जिसके बाद जवानों को तीन महीने की कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है। इस बीच इन्हें आक्रमण के नए पैतरों व तरीकों को सिखाया जाता हैं और हर कठिन समस्या का सामना करने के लिए मजबूत बनाया जाता हैं।

समस्याओं का आसानी से समाधान कर सकते है कमांडो

कोबरा कमांडो

कोबरा कमांडो के पास हर प्रकार की मैदानी समस्याओं का समाधान मौजूद होता हैं। कमांडोज आसानी से किसी भी प्रकार के बम को डिफ्यूज कर सकते हैं। जमीन में छिपे बमों को खोज सकते हैं और हर प्रकार की तकनीकी समस्या का हल निकालने में सक्षम होते हैं। वे 12 दिन आसानी से बिना खाए-पिए गुजार सकते हैं और किसी भी जीव को आहार बनाने में नहीं झिझकते।

योजना के साथ देते है मिशन को अंजाम

सीआरपीएफ कोबरा कमांडोज

कोबरा कमांडोज अक्सर नक्सलियों को मारने की बजाय उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं ताकि जंगल में छिपे नक्सली अड्डों और समूहों का पता लगाकर नेस्तानाबूद किया जा सके। कोबरा कमांडो प्राय: गोलीबारी का प्रयोग कम करते हैं ताकि उनकी किसी हरकत की भनक नक्सलियों  न लगे।

गोरिल्ला शैली दुनिया भर में मशहूर

कोबरा कमांडो ट्रेनिंग

कोबरा कमांडो गोरिल्ला वॉर की शैली विश्व भर में प्रभावी है और यही कारण है कि विश्व की शक्तिशाली शक्तियां जैसे कि अमेरिका, रूस और इजराइल अपनी सेनाओं के लिए गोरिल्ला लड़ाईयों के गुर सीखने के लिए कोबरा कमांडोज की मदद लेते हैं।

कोबरा बटालियन की पहली महिला कमांडो

कमांडो उषा किरण

कोबरा बटालियन में महिलाएं भी अहम भूमिका निभाती हैं। पहली महिला कमांडो का नाम है-उषा किरण। जिन्होंने महज 25 साल की उम्र में ही सीआरपीएफ ज्वाइंन किया और वहां से चयनित होकर कोबरा कमांडो बनीं। उषा के पिता भी फॉर्स में अपनी सेवा दे चुके हैं। जांबाज उषा किरण गुरिल्ला लड़ाईयों में माहिर मानी जाती हैं। वे एथलीट भी रह चुकी हैं। साल 2018 में ‘वोग इंडिया’ मैगजीन ने उन्हें ‘यंग अचीव ऑफ द ईयर’ भी चुना है।

 

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