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शहादत की 25 कहानियां: शहीदों ने देश से किया वादा निभाया, लेकिन….

नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के सुकमा में माओवादी हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के 25 जवानों के पार्थिव शरीर को उनके घर भेज दिया गया है। माओवादियों ने घात लगाकर सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन पर हमला किया था। जवानों ने देश से किया वादा तो शहादत देकर पूरी कर दी लेकिन अपने परिजनों, दोस्तों से किए कुछ वादे नहीं पूरे कर सके। कुछ जवानों ने परिजनों से जल्द आने की बात कही थी तो कुछ दोस्तों को पार्टी देने की बात।





जवानों की शहादत के बाद उनके परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। इन जवानों में कोई इकलौता कमाने वाला था तो किसी का भाई पढ़ रहा था। किसी की बहन की शादी होने वाली थी तो किसी के परिजनों ने उन्हें लेकर कई सपने देखे थे। जवानों के पार्थिव शरीर को उनके घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी राजपत्रित अधिकारियों को सौंपी गई है।

इस घटना में सीआरपीएफ के 25 जवानों ने शहादत दी

इन्स्पेक्टर रघबीर सिंह

माओवादी हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के इन्स्पेक्टर रघबीर सिंह मूल रूप से गांव साथियाला, जिला-अमृतसर (पंजाब) के रहने वाले थे। उनकी पत्नी बलजीत कौर और अन्य परिजनों का उनकी शहादत की खबर सुनने के बाद से ही रो-रोकर बुरा हाल है।

 

एएसआई संजय कुमार

माओवादी हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के एएसआई संजय कुमार मूल रूप से गांव-चाचियन, पोस्ट-पालम, जनपद-कांगड़ा (हिमाचल) के रहने वाले थे। शहीद संजय के पिता राजेंद्र शर्मा आर्मी में सूबेदार रह चुके हैं और सीआरपीएफ में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। अभी उन्हें अधरंग (लकवा) हुआ है, इसलिए बिस्तर पर ही रहते हैं।

शहीद एएसआई संजय कुमार (फाइल फोटो)

बेटे की शहादत की खबर सुनकर वह बदहवास हो गए हैं। मां, पत्नी और बेटियों का रो-रोकर बुरा हाल है। तीन भाइयों व एक बहन के भाई संजय कुमार मार्च 1990 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। शहीद की बेटी अमिशा पहली और दूसरी बेटी सातवीं क्लास में पढ़ती है। उनकी पत्नी अंकिता शर्मा और अन्य परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। उनके क्षेत्र के लोग बता रहे हैं कि वह एक बहुत ही अच्छे और मिलनसार इंसान थे।

 

हेड कांस्टेबल सुरेंदर कुमार

नक्सली हमले में हिमाचल के मंडी जिले के नेरचौक निवासी सुरेंद्र कुमार (33) भी शहीद हुए हैं। सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन में तैनात सुरेंद्र डेढ़ माह की छुट्टी काटकर दस अप्रैल को ही लौटे थे।

सुरेंद्र कुमार अपने पीछे पत्नी किरण, दो साल की बेटी एलीना और माता विमला ठाकुर को छोड़ गए हैं। सूचना मिलते ही क्षेत्र में शोक की लहर छा गई। वर्ष 2003 में भर्ती हुए सुरेंद्र कुमार कुछ माह पहले मौत को मात दे चुके थे।

 

हेड कांस्टेबल बन्ना राम

राजस्थान के सीकर जिले के नीमकाथाना क्षेत्र के गोवर्धनपुरा में रहने वाले हेड कांस्टेबल बन्ना राम भी नक्सलियों के हमले का शिकार हो गए और शहादत को प्राप्त हुए। बन्नाराम के परिजनों ने बताया कि 26 साल पहले साल 1991 में बन्ना राम फौजी के रूप में भर्ती हुए थे। जुलाई 2016 में ही उनकी पोस्टिंग छत्तीसगढ़ में हुई थी। इससे पहले बन्ना राम अहमदाबाद में तैनात थे। परिजनों के मुताबिक बन्ना राम डेढ माह पहले ही छुट्टियां बिताने के लिए गांव आए थे और दोबारा जल्दी आने की बात कहकर गए थे। लेकिन सोमवार देर रात बन्ना राम की शहादत की सूचना मिली। आपको बता दें कि शहीद बन्ना राम का बेटा अजय अभी बारहवीं कक्षा में पढ़ता है। 2 साल पहले ही उन्होंने अपनी बेटी किरण की शादी की थी।

 

एएसआई रामेश्वर लाल

राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के बालाराजपुर के रहने वाले एएसआई रामेश्वर लाल की दोनों बेटियों का पिता की मौत खबर सुनने के बाद से रो-रोकर बुरा हाल है। उनकी पत्नी सरस्वती देवी को कुछ सूझ ही नहीं रहा है। शहीद के परिजन और पड़ोसी बेटियों को ढांढ़स बंधा रहे हैं लेकिन वे बार-बार बेसुध हो जाती हैं। उधर, शहीद के भतीजे ने रामेश्वर लाल की शहादत को परिवार के लिए गर्व की बात बताया है। साथ ही सरकार पर नक्सलियों पर ठोस कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाते हुए शहीदों की शहादत का हवाला देते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग भी की है।

 

एएसआई नरेश कुमार

शहीद एएसआई नरेश कुमार मूलरूप से सोनीपत के जैनपुर गांव के रहने वाले थे। वह घर में अकेले कमाने वाले व्यक्ति थे। उनकी पत्नी राजबाला का कहना है कि सरकार इन हमलों को रोके, अगर ऐसे ही चलता रहा तो सभी जवान शहीद हो जाएंगे। शहीद नरेश कुमार का परिवार 2 कमरों के मकान में रह रहा है। उनका छोटा भाई अभी पढ़ाई कर रहा है। परिवार में उनकी पत्नी राजबाला, एक बड़ी बेटी और दो बेटे हैं। तीनों बच्चे अभी पढ़ाई कर रहे हैं।

शहीद एएसआई नरेश कुमार की पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है

नरेश की पत्नी राजबाला ने बताया कि उनकी आखिरी बार बात रविवार को हुई थी। उस दिन भी ठीक से बात नहीं हो पाई थी क्योंकि मोबाइल में नेटवर्क न होने की वजह से फोन कट रहा था। नरेश कुमार 7 अप्रैल को छुट्टी पूरी कर छत्तीसगढ़ गए थे। शहीद नरेश के परिवार व बच्चों के लिए परिजनों ने सरकार से गुहार लगाई है कि सरकार द्वारा उनकी सहायता के लिए आगे आना चाहिए। नरेश घर में अकेले कमाने वाले थे, उनके चले जाने के बाद परिवार के लिए सबसे बड़ी समस्या आर्थिक संकट की है। ऐसे में सरकार द्वारा परिवार के सदस्यों को सरकारी नौकरी देनी चाहिए।

कांस्टेबल मनोज कुमार

सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन के शहीद हुए 25 जवानों में 2 जवान उत्तर प्रदेश के थे। जिनके गाँव में आज मातम छाया हुआ है। जिनमे से एक हैं सीआरपीएफ कांस्टेबल मनोज कुमार। मनोज कुमार मुज़फ्फरनगर के भोपा थाना क्षेत्र के नीरगाजानी गाँव के रहने वाले थे। उनकी माँ राजेश देवी का रो-रो कर बुरा हाल है। उन्होंने बताया कि कल मनोज कुमार के एक दोस्त का फ़ोन आया था। उसने ही इन्हें मनोज के शहीद होने की जानकारी दी।

उन्होंने रोते हुए कहा कि अगर वह 2-4 को मार के शहीद हुआ है तो ठीक है। मनोज अपने घर में कमाने वाला इकलौता था। ऐसे में उनके सामने रोटी की बहुत बड़ी समस्या है। उन्होंने रोते हुए सरकार से गुज़ारिश की कि मेरा कमाऊ ही चला गया हमें सरकार की तरफ कुछ न कुछ तो मिलना चाहिए जिससे हम रोटी खा सकें।

कांस्टेबल राममेहर

छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ की टुकड़ी पर हुए हमले में करनाल के गांव खेड़ी मान सिंह का जवान राममेहर भी शहीद हो गया है। राममेहर के परिवार में उनके पिता पूर्ण चन्द्र संधू को रात करीब 12 बजे सीआरपीएफ के अधिकारियों का फोन आया कि उनका बेटा शहीद हो गया है। जवान के शहीद होने की सूचना के साथ ही घर में कोहराम मच गया और गांव में मातम छाया हुआ है।

शहीद राम मेहर (लाल घेरे में)

शहीद राममेहर 6 भाइयों में से चौथे नम्बर के थे और उनके एक बेटा और बेटी है। राममेहर के पिता पूर्ण संधू का कहना है कि राममेहर 1 मई को छुट्टी पर घर आने वाला था, लेकिन उससे पहले ही यह हादसा हो गया। शहीद राममेहर के पिता अपने बेटे की मौत के लिए सरकार को दोषी मानते हैं। उनका कहना है कि सरकार अपने जवानों को मरवा रही है, लेकिन उग्रवादियों के खिलाफ खुली कार्रवाई के आदेश नहीं देती।

हेड कांस्टेबल कृष्ण पाल सिंह

शहीद हेड कांस्टेबल के.पी. सिंह यूपी के एटा जनपद के अलागंज तहसील के एक छोटे से गाँव दांडी के रहने वाले थे।

शहीद के पी सिंह

के. पी. सिंह की शहादत पर जहाँ उनके परिवार और गाँव वालों को फ़ख्र है वहीँ उनके न होने से सभी की आँखें नम भी हैं। घर वालों का कहना है घर की सारी जिम्मेदारी के. पी. सिंह के ही कन्धों पर थी। उनकी ही कमाई से घर चलता था। ऐसे में के.पी. सिंह के परिवार के सामने अब जहाँ अपनी जरूरतों को पूरा करने करने की चुनौती है। वहीँ उनकी पत्नी और बच्चो को अब उनके बिना जीने की आदत भी डालनी होगी।

के.पी. सिंह के भाई का कहना है की वह बहुत संघर्षशील और सब को साथ लेकर चलने वालों में से थे उनके पिता का कहना है कि प्रधानमंत्री को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। क्योंकि ये हमला बाहर से नही हुआ बल्कि अपने ही देश के लोगों द्वारा किया गया है। ऐसे में पीएम को उनकी समस्याओं के बारे में भी विचार करना चाहिए।

 

कांस्टेबल बिनय बर्मन

शहीदों में कूचबिहार के अथरनाला के रहने वाले बिनय बर्मन का नाम भी शामिल है। उनके परिवार में माता-पिता तथा पत्नी के अलावा एक साल का बच्चा भी है। परिजनों ने बताया कि वह छह साल पहले सीआरपीएफ में भरती हुए थे। वह कश्मीर में तैनात थे। पिछले साल ही कश्मीर से उनका तबादला सुकमा कर दिया गया। उनकी शहादत की खबर मिलने के बात पत्नी चुमकी बर्मन समेत पूरे परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है।

सब इंस्पेक्टर कृष्ण कुमार दास

सुकमा में सोमवार को हुए नक्सली हमले में शहीदों में कूचबिहार के पूर्व विवेकानंदपल्ली के रहने वाले कृष्ण कुमार दास (26) भी शामिल हैं। कृष्ण कुमार दास की शादी पिछले साल ही हुई थी।

शहीद सब इंस्पेक्टर के के दास

इनके भाई विश्वरूप दास ने बताया है कि टीवी से सुकमा हमले की जानकारी मिली। उसके बाद सीआरपीएफ कंट्रोल रूम को भाई का हालचाल जानने के लिए फोन किया। वहीं से भाई के शहीद होने की जानकारी मिली।

कांस्टेबल नरेश यादव

बिहार के दरभंगा जिले के अहिला गांव के रहने वाले सीआरपीएफ जवान नरेश यादव सोमवार को छत्तीसगढ़ के सुकमा में हुए नक्सलियों के हमले में शहीद हो गए। शहीद होने की जैसे की घर में सूचना मिली, घर में कोहराम मच गया।

शहीद नरेश यादव (इनसेट में)

घर में कल से ही पत्नी रीता देवी का रो रोकर बुरा हाल है। घर की महिलाएं समझाने में जुटी हुई है। नरेश यादव के दो लड़के और एक लड़की है। नरेश के शहीद होने पर गांव के लोग भी मायूस हैं। घर पर रिश्तेदार भी कई जगहों से पहुंच गए हैं। सभी लोग शहीद के शव आने का इंतजार कर रहे हैं।

कांस्टेबल अभय कुमार

इस नक्सली हमले में बिहार के 6 जवान भी शहीद हुए हैं। बिहार के इन शहीद जवानों में वैशाली के लोमा गांव के अभय कुमार भी शामिल हैं। अभय कुमार के गांव और उनके रिश्तेदारों को इस खबर पर विश्वास नहीं हो रहा है। अभी कुछ ही समय पहले अभय छुट्टी मनाकर वापस ड्यूटी पर लौटे थे। लेकिन 25 दिन बाद ही उनके शहीद होने की खबर आई।

शहीद अभय कुमार (बाएं) और रोते-बिलखते परिजन (दाएं)

अभय की एक साल पहले ही शादी हुई थी। पति के शहीद होने की खबर के बाद पत्नी बार बार बेहोश हो जा रही है और जब भी होश आता है तो फिर रोने लगती है। अभय कुमार 25 दिन पहले ही गृह प्रवेश के मौके पर गांव आये थे। गृह प्रवेश की पूजा करने के बाद वह बोल कर गये थे कि आने पर भोज दूंगा। लेकिन इस बीच उनके शहीद होने की खबर आ गई। अभय के दो और भाई तिब्बत सेना और सीआरपीएफ में तैनात हैं। इस दुखद समाचार के बाद घर के लोगों को बुरा हाल है। गांव के लोग परिजनों को ढांढस बंधा रहे हैं। 2010 में अभय ने सीआरपीएफ ज्वाइन किया था। पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी अभय के कंधों पर आ गई थी। अभय के पिता का नाम विश्वनाथ चौधरी है जो किसान थे।

कांस्टेबल सौरभ कुमार

शहीदों में दानापुर कैंट (पटना) के निवासी सौरभ कुमार का नाम भी शामिल हैं। सौरभ कुमार सीआरपीएफ में कांस्टेबल के पद पर तैनात थे। जैसे ही इस घटना में सौरभ कुमार की शहीद होने की घटना मिली उनके घर पर मातम पसर गया।

आस-पास के लोग इस घटना से काफी दुखी है उनके घर में लोग लगातार परिवार को ढाढ़स बंधाने के लिए आ रहे हैं। परिजनों का रो रो कर हाल बुरा है। जहाँ एक तरफ उनकी शहादत पर दानापुर और पटना वासियों की आंखे नम है वहीं दूसरी तरफ उनके ऊपर गर्व भी है।

कांस्टेबल अभय मिश्रा

नक्सली हमले में सीआरपीएफ की 74 वीं बटालियन के अभय मिश्रा शहीद हो गए। अभय भोजपुर जिले के तुलसी गांव के रहने वाले थे। अभय के परिजनों का रो रोकर बुरा हाल है। अभय की कमाई से ही घर चलता था। अभय ने 2012 में सीआरपीएफ के 74 वीं बटालियन ज्वाइन किया था और उसके बाद उनकी पोस्टिंग छत्तीसगढ़ के सुकमा में कर दी गई थी। तब से लेकर अब तक अभय की पोस्टिंग कहीं दूसरी जगह नहीं हुई थी।

शहीद अभय कुमार (बाएं) उनके पिता को समझाते हुए लोग (बाएं)

घर में अभय के मां पिता के अलावा उसका एक छोटा भाई है। जो सेना में जाने की तैयारी कर रहा था। भाई की शहादत के बाद अब उसने फौज में जाने से इनकार कर दिया है। कहा कि अब मैं खुद भी नहीं जाऊंगा और ना ही किसी को जाने दूंगा। अभय के पिता किसान हैं तो भाई बेरोजगार अब अभय के पिता रोते हुए ये कहते हैं कि अब कैसे घर चलेगा। उन्होंने इस तरह के हमले को लेकर सरकार को जिम्मेवार ठहराया है। नक्सलियों से अपील की है कि लड़ना है तो विदेशी ताकतों से लड़ो देश में हम गरीबों को मारकर क्या करोगे।

कांस्टेबल रंजीत कुमार

शहीद हुए सीआरपीएफ जवान रंजीत कुमार के पैतृक गांव फुलचोड़, शेखपुरा (बिहार) में मातमी सन्नाटा छाया हुआ है। 26 साल की उम्र में ही देश के लिए कुर्बान हुए इस जांबाज बेटे की छह साल पहले ही सीआरपीएफ में भर्ती हुई थी। घात लगाकर किये गए इस हमले को पत्नी सुनीता ने कायरता करार देते हुए ऐसे तत्वों के खिलाफ निर्णायक और सख्त कार्रवाई की मांग सरकार से की है।

शहीद रंजीत कुमार की पत्नी उनकी तस्वीर दिखाती हुई

शहीद रंजीत की अपने घर वालों से अंतिम बातचीत रविवार की रात हुई थी। रंजीत इसी महीने 28 अप्रैल को छुट्टी पर घर आने वाला था । सुनीता ने बताया कि पति की शहादत के बाद मुझे अपने दो छोटे बच्चों, सात साल के सतीश और चार साल के विकास के भविष्य की चिंता सता रही है।

कांस्टेबल कृष्ण कुमार पांडेय


बिहार का एक और सपूत कांस्टेबल कृष्ण कुमार पांडे भी सुकमा नक्सली हमले में शहीद हो गया। रोहतास जिले के भरनदुआ गांव के निवासी कृष्ण कुमार पांडे इसी साल होली की छुट्टियों में घर आए थे और होली मनाने के बाद वापस सुकमा लौट गए थे। कृष्ण कुमार अपने पीछे पत्नी, एक बुजुर्ग मां और अपनी 7 महीने की बेटी छोड़ गए हैं।

 

कांस्टेबल बनमाली राम

सुकमा में हुए नक्सली हमले में जशपुर ज़िले के धौरासंड गांव के बनमाली राम भी शहीद हुए हैं। शहीद के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। परिजनों को उनकी शहादत पर गर्व है। लेकिन उनके यूं बिछड़ जाने का ग़म भुला पाना आसान भी नहीं है। उनके क्षेत्र के लोग बताते हैं कि वह एक अच्छे इंसान थे और सबसे मिल-जुलकर रहते थे। उनकी शहादत की खबर सुनने के बाद हर कोई उनके घर की तरफ चल पड़ा।

 

कांस्टेबल एनपी सोनकर

इस नक्सली हमले में रीवा का लाल नारायण प्रसाद सोनकर (एनपी सोनकर) भी शहीद हुए हैं। जिन्हे गृहमंत्री राजनाथ सिंह और सीएम रमन सिंह सहित अन्य अधिकारियों के श्रद्धांजलि के बाद शहीद का पार्थिव देह उनके गृहग्राम त्योंथर तहसील गंगतीरा कला गांव को भेज दिया गया।

शहीद एन पी सोनकर

सोनकर ने 2000 में सीआरपीएफ ज्वाइन की थी। उनके एक बेटा और एक बेटी हैं। शहीद सोनकर का घर गंगतीरा कला गांव में है जो रीवा जिले के त्योंथर तहसील से लगभल दो किमी की दूरी पर है। शहीद को गांव वालों ने बताया कि, जवान नारायण प्रसाद सोनकर के शहीद होने की खबर सुनकर पूरा गांव सदमे में है। साथ ही उन्होंने बताया कि, शहीद होने की बात जवान के परिवार में सिर्फ पुरुषों को ही पता है।

कांस्टेबल आशीष कुमार सिंह

शहीद 25 जवानों में से एक गढ़वा के गरनहा ग्राम के निवासी आशीष कुमार सिंह (27) थे। आशीष 30 अप्रैल को छुट्‌टी पर अपने गांव आने वाले थे। पर बीती रात उनके परिजनों को उनके शहीद होने की सूचना मिली। शहीद की पत्नी आशा देवी का का रो-रोकर बुरा हाल है। वह बार-बार बेहोश हो रही थीं। इधर, उनका पांच साल का बेटा अपनी मां से बार-बार पूछ रहा था- ‘पापा को क्या हो गया? तुम क्यों रो रही हो’?

शहीद आशीष कुमार सिंह के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है

शहीद आशीष कुमार सिंह के अच्छे व्यवहार की वजह से पूरा गांव उन्हें पहचानता था। उनके बड़े भाई आईटीबीपी, चंडीगढ़ में तैनात हैं। आशीष कुमार सिंह ने मैट्रिक पास करने के बाद 2010 में सीआरपीएफ ज्वॉइन किया था। उनके दो बेटे हैं। एक पांच साल, दूसरा ढाई साल का। उनके परिजनों ने बताया कि आशीष इससे पहले जनवरी में अपने दादा के दाह-संस्कार में शामिल होने के लिए आए थे। इसके बाद से वह ड्यूटी पर ही थे। 30 अप्रैल को छुट्‌टी पर गांव आने वाले थे।

 

कांस्टेबल पद्मनाभान एम

शहीदों में तमिलनाडु के थानजौउर जिले के अविचाकुडी का नाम भी शामिल है। उनकी शहादत की खबर मिलने के बाद पत्नी माहेश्वरी और अन्य परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। उनके गांव के लोग बताते हैं कि वह एक अच्छे और मिलनसार किस्म के इंसान थे।

 

कांस्टेबल एन सेंथिल

कांस्टेबल एन सेंथिल कुमार भी इस हमले में शहीद हो गये, जो तमिलनाडु के थे। वह तिरुवरूर जिले के नीदामंगा के रहने वाले थे। उनकी शहादत के बात क्षेत्र में शोक की लहर है। उनकी पत्नी एस विद्या और अन्य परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। ग्रामीण नक्सलियों के विरुद्ध सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

 

कांस्टेबल एन तिरुमुरुगना

कांस्टेबल एन तिरुमुरुगना भी तमिलनाडु के ही रहने वाले थे। वह सलेम जिले के नल्लूर गांव के रहने वाले थे। उनकी शहादत की खबर मिलने के बाद पत्नी टी सेल्वी और अन्य परिजनों का बुरा हाल है। एक तरफ परिजन उनकी शहादत पर गर्व की बात कह रहे हैं तो दूसरी तरफ उन्होंने सरकार से मांग की है कि नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें।

 

कांस्टेबल पी अलगु पांडी

शहीद हुए 25 सीआरपीएफ के जवानों में पी अलगु पांडी का नाम भी शामिल है। वह मदुरै जिले के मुथु नागायापुरम के रहने वाले थे। उनकी शहादत की खबर मिलने के बाद से ही मां रक्कालम का रो-रोकर बुरा हाल है। उनके परिजनों ने भी सरकार से नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है।

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