CRPF

दुश्मन पर गोलियां बरसाने वाला CRPF का यह जवान बांसुरी भी खूब बजाता है

नई दिल्ली। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जवान ज्योतिमोन के दो रूप हैं। जब वह मोर्चे पर होते हैं तो उनकी अंगुलियां बंदूक के ट्रिगर पर होती हैं और जब वह ड्यूटी पर नहीं होते तो उनके होंठो पर बांसुरी होती है और अंगुलियां जब उसके पोरों पर नृत्य करती हैं तो ऐसी मधुर स्वर लहरियां निकलती हैं आसपास के सभी लोग अपनी सुध-बुध भूल जाते हैं।





CRPF की 188वीं बटालियन का यह जवान पिछले नौ वर्षों से कश्मीर और बस्तर के अपेक्षाकृत कठिन मोर्चे पर अपनी जिम्मेदारी का सफल निर्वहन कर रहा है। ज्योतिमोन पहले छह वर्ष कश्मीर में रहे और अब तीन वर्ष से बस्तर में हैं। जिस तरह मोर्च पर वह सबसे आगे रहते हैं उसी तरह उनका बांसुरी वादन CRPF के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का स्थायी हिस्सा बन चुका है।

ज्योतिमोन को बांसुरी की मधुर स्वर लहरियां तो बचपन से ही पुकार रही थी लेकिन बांसुरी बजाना उन्होंने उम्र के 25वें वर्ष में शुरू किया। एक वेबसाइट के मुताबिक ज्योतिमोन के परिवार का संगीत से सिर्फ इतना नाता था कि उनके छोटे चाचा ढोलक व तबला बजा लेते थे। गांव में बांसुरी बेचने वाला जब बांसुरी बजाता तो बालक ज्योतिमोन उसकी स्वर लहरियों में खो जाते। बड़े हुए तो देश की खातिर कुछ करने का जज्बा उन्हें CRPF में ले आया। इन्हीं दिनों उनका बचपन का बांसुरी प्रेम फिर जाग उठा। कठिन ड्यूटी के बाद वह बांसुरी बजाने लगे। शुरुआत में सुर सही निकले लेकिन एकलव्य की भांति वे निरंतर साधना करते रहे और कुछ ही समय बाद उनकी बांसुरी से ऐसी मधुर स्वर लहरियां निकलने लगीं कि साथी और अफसर उनसे बांसुरी बजाने की फरमाइश करने लगे।

अधिकारियों ने बटालियन के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी बांसुरी वादन का कार्यक्रम निश्चित कर दिया। साथियों और अधिकारियों की प्रशंसा से उत्साहित ज्योतिमोन ने अपनी साधना और बढ़ा दी। दिल्ली से उन्होंने 12 बांसुरियों का ऐसा सेट खरीदा जिसकी कीमत 20 हजार रुपये थी। ज्योतिमोन मानते हैं कि अभी बहुत कुछ सीखना शेष है। प्रख्यात बांसुरी वादक रेवी मुरली को वह अपना गुरु बनाना चाहते हैं लेकिन CRPF की नौकरी के दौरान उन्हें ऐसा मौका मिल पायेगा यह संभव नहीं दिखता।

ज्योतिमोन की बांसुरी से पहले अपने दक्षिण अंचल की धुनें निकलती थीं लेकिन निरंतर साधना से अब वह कश्मीर और बस्तर की लोक धुनें भी सहजता से निकालते हैं।

अवकाश में जब वह घर जाते हैं तो उनके घर से निकलने वाली स्वरलहरियों से आसपास के लोगों को पता चला जाता है कि ज्योतिमोन छुट्टियों में घर आए हुए है। वह अपने बच्चों को भी बांसुरी बजाना सिखाना चाहते हैं।

 

 

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