Paramilitary Force

तम्बू में गुजारा कर रेसलर बनीं बेटियां, अब SSB में मिली नौकरी

 बागपत। एक छोटे से गांव में रहने वाली लक्ष्मी को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि एक दिन उसकी बेटी  हाथों में बन्दूक उठाए देश की सेवा करेगी। कभी तंबू में पल-बढ़ी विधवा मां की दोनों बेटियों ने रेसलर बन पहले कई  राष्ट्रीय मैडल जीते और अब खेल कोटे के तहत उनकी एक बेटी को ससश्त्र सीमा बल में नियुक्त किया गया  है।





न भोजन था न रहने को घर

एक जमीनी विवाद में उनके पति की हत्या कर दी गई। पति के देहांत के बाद नीलम और मेघना की मां की जिन्दगी और भी मुश्किल हो गई। उधर दोनों बेटियों की जिम्मेदारी अकेले उठाना किसी चुनौती से कम नहीं था। यही नहीं पति के देहांत के बाद गुंडों ने उन्हें गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया। बेटियों के लिए वह गांव छोड़कर संतनगर आ गईं। लेकिन यहां न रहने को घर था और न ही खाने को भोजन। लेकिन मेहनत और मजदूरी की और एक तंबू में रहकर गुजारा किया। कई बार यहां भी लोग उन्हें परेशान करने आ जाते। तब लक्ष्मी ने अपनी दोनों बेटियों को पहलवान बनाने की ठानी। उन्होंने अपनी बेटियों को पास के ही एक अखाड़े में भेजना शुरू किया, ताकि वे शारीरिक रूप से मजबूत बन सकें।

झेलना पड़ा पंचायत का विरोध

लक्ष्मी ने बेटियों को अखाड़े भेजना शुरू किया तो गांव वालों ने उनके छोटे बाल व कपड़ों को लेकर पंचायत ने विरोध करना शुरू कर दिया। लेकिन लक्ष्मी की बेटियों की हिम्मत और हौंसले के आगे उनकी एक न चली। बेटियों की मेहनत रंग लाइ और वे नेशनल रेसलर बनीं।

धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी। नीलम तोमर ने छह बार स्टेट लेवल पर गोल्ड मेडल जीता है। 2009 में नेशनल लेवल पर सब-जूनियर में सिल्वर, 2010 में गोल्ड, 2011 जूनियर में सिल्वर जीत कर नीलम ने खुद को साबित किया। 2015 में नीलम को राष्ट्रीय प्रतियोगिता में कांस्य पदक मिला। मेघना ने भी राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में छह पदक जीते हैं।

स्पोर्ट कोटे से SSB में मिली नौकरी

लक्ष्मी चाहती थी कि उनकी बेटियों की नौकरी हो जाए तो उनके भविष्य की फ़िक्र मिट जाए और उनकी मुराद पूरी हो भी गई उनकी बड़ी बेटी नीलम को देश की सीमाओं की रक्षा के लिए तैनात होने वाले अर्धसैनिक बल एसएसबी (सशस्त्र सीमा बल) में खेल कोटे से कांस्टेबल पद पर नियुक्ति मिल गई है।

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