DEFENCE

स्वदेशी रक्षा सामग्री में विदेशी उपकरणों की हिस्सेदारी घटेगी

नई दिल्ली। भारत एक तरफ जहां ‘मेक इन इंडिया’ को और मजबूत बनाने की दिशा में प्रयासरत है। वहीं, दूसरी तरफ विदेशी कंपनियां भारतीय कंपनियों की सांझेदारी में बनाए जा रहे हथियारों की तकनीक के मामले में अपना स्वामित्व जमाने की कोशिश में हैं। ऐसे में एक तो बड़ी राशि विदेशों को जा रही है और दूसरा विदेशी उपकरणों के ज्यादा इस्तेमाल से कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। ऐसे में सरकार सार्वजानिक रक्षा उपक्रमों की ओर से तैयार किए जा रहे हथियारों में विदेशी उपकरणों की हिस्सेदारी को 20 प्रतिशत तक घटाना चाहती है जबकि वर्तमान में यह हिस्सेदारी साठ प्रतिशत तक है।





तकनीक के लिए विदेशों पर निर्भरता

रक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक इस बारे में सार्वजानिक रक्षा उपक्रमों को निर्देश दिए गए हैं कि सार्वजानिक उपक्रमों में बन रहे हथियारों में विदेशों से आयातित उपकरण का मूल्य कुल कीमत से बीस प्रतिशत से ज्यादा न हो। गौरतलब है कि इस वर्ष के शुरुआत में जब संसदीय समिति बजट की समीक्षा कर रही थी तब यह मामला उसके समक्ष भी आया था। समिति ने इस बात पर चिंता जताई थी कि हथियारों की खरीद के लिए जहां एक तरफ विदेशों पर निर्भरता बनी हुई है।  दूसरा जो हथियार देश में बन रहे हैं उनमें भी विदेशों की आधी हिस्सेदारी है।

कम होगी विदेशी हिस्सेदारी  

भारत में ज्यादातर तकनीकें डीआरडीओ द्वारा विकसित होती हैं। डीआरडीओ हथियार विकसित तो कर देता है लेकिन उसे सभी उपकरण उपलब्ध नहीं होते। समिति ने इसके लिए सरकार को देश में निर्मित हो रहे हथियारों के लिए देश में ही कलपुर्जों के निर्माण पर जोर देने की बात कही थी। अब मंत्रालय ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए और विदेशी हिस्सेदारी को कम करने के लिए ये कदम उठाया है।

किस रक्षा सामग्री में विदेश की कितनी हिस्सेदारी

हॉक-58 प्रतिशत, एडवांस लाइट हेलिकॉप्टर-50 प्रतिशत, डोर्नियर-228-60 प्रतिशत, एलसीए तेजस-40प्रतिशत, ये चारों विमान हिन्दुस्तान एयरनौटिक्स लिमिटेडद्वारा (HAL) बनाए जा रहे हैं। उधर भारतीय नौसेना की बात करें तो नौसेना प्रोजेक्ट में विदेशी उपकरणों का मूल्य 58 प्रतिशत तक है। अब सरकार द्वारा इस इस विदेशी भागीदारी को 20 फीसदी की कमी लाने के फैसले से विदेशों पर निर्भरता कम होगी।

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