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अटलजी के इस निर्णय से दुनिया मुरीद हुई भारत की

अटल बिहारी वाजपेयी

नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में गुरुवार को निधन हो गया। वे 93 वर्ष के थे। अपने जीवनकाल में उन्होंने शालीन राजनीति के साथ कड़े और बड़े फैसले लिये। विपक्ष में रहते हुए उन्होंने जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, चन्द्रशेखर, नरसिम्हा राव को उनकी नीतियों पर संसद में घेरा और कारगर वैकल्पिक राह दिखाई। जब वह भारत के प्रधानमंत्री बने तो राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण से लेकर चतुर्भुज सड़क योजना, सुरक्षा, सेहत, रक्षा, शिक्षा, संस्कृति जैसे तमाम क्षेत्रों में अपने कुशल नेतृत्व की छाप छोड़ी। वह भारत को ताकतवर देशों में शामिल करना चाहते थे और ऐसा उन्होंने बतौर प्रधानमंत्री अपने दूसरे कार्यकाल के पहले तीन महीनों में ही परमाणु परीक्षण कर ऐसा कर दिखाया।





अटल बिहारी वाजपेयी वर्ष 1998 में जब दूसरी बार प्रधानमंत्री बने तो उनके नेतृत्व में भारत ने परमाणु परीक्षण किया था। गठबंधन की सरकार में इतना बड़ा फैसला लेना आसान नहीं था लेकिन उन्होंने फैसला लिया और 11 मई, 1998 को राजस्थान के पोखरण में तीन बमों का सफल परीक्षण कर दुनिया को हैरान कर दिया। भारत के इस परीक्षण के बारे में किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई जबकि पोखरण-1 (वर्ष 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय भारत ने पहली बार परमाणु परीक्षण किया था।) के बाद चौबीसों घंटे दुनिया की निगाहें पोखरण पर रहती थीं। वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ अबुल कलाम ने भी एक इंटरव्यू में बताया था कि उस समय भारत पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव काफी ज्यादा था लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने तय किया था कि वह आग बढ़कर परीक्ष करेंगे। इसके साथ ही भारत एक परमाणु ताकत बना।

इंडिया टूडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक अटल बिहारी वाजपेयी तो वर्ष 1996 में ही परमाणु कार्यक्रम को हरी झंडी दिखाना चाहते थे लेकिन उन्होंने बाद में यह फैसला टाल दिया था। बता दें कि अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो उनकी सरकार 13 दिन ही चल पाई थी। बाद में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी।

वर्ष 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी दोबारा प्रधानमंत्री बने। यह सरकार भी ज्यादा नहीं चल पाई लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने इस दौरान कई बड़े फैसले लेकर बताया कि राष्ट्र सुरक्षा के मामले में उनकी सरकार कोई भी फैसला लेने से हिचकेगी नहीं। परमाणु परीक्षण इसकी मिसाल है।

वर्ष 1998 में 11 मई को परमाणु परीक्षण के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने संवाददाता सम्मेलन में अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को भी श्रेय़ दिया। परमाणु परीक्षण के बारे में उन्होंने कहा-हमारे परमाणु हथियार विशुद्ध रूप से किसी विरोधी की तरफ से परमाणु हमले के डर को खत्म करने के लिए हैं।

समय-समय पर दिये गये भाषणों में अटलजी ने परमाणु परीक्षण का श्रेय परमाणु ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष आर. चिदंबरम, रक्षा अनुसंधान विकास संस्थान के चीफ एपीजे अब्दुल कलाम और अन्य वैज्ञानिकों को भी दिया।

वर्ष 1999 में करगिल में पड़ोसी देश पाकिस्तान के घुसपैठियों को मार भगाया गया। दो महीने तक चले युद्ध में भारत के शौर्य और अदम्य साहस से भरे जांबाज सैनिकों ने एक बार फिर बहादुरी का परिचय दिया। करगिल युद्ध की यह विजय भी अटलजी के खाते में दर्ज है। उन्हीं की कोशिशों का प्रतिफल था भारत-पाकिस्तान के बीच समझौता एक्सप्रेस और दिल्ली से लाहौर के बीच बस सेवा चलाने की शुरुआत हुई। पाकिस्तान के हठी रवैये के संदर्भ में वे संसद से लेकर आम आदमी के बीच में अपने चुटीले अंदाज में कहते थे-आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं।

पाकिस्तान को लेकर उनकी नीति स्पष्ट थी। वे पाकिस्तान के साथ शांति का संबंध चाहते थे लेकिन किसी मजबूरी वश नहीं। वह कहते भी थे- पाकिस्तान के साथ सामान्य संबंध बनाने की कोशिशें हमारी कमजोरी का प्रतीक नहीं हैं बल्कि शांति के लिए हमारी प्रतिबद्धता का संकेत है।

‘रक्षक न्यूज’ की तरफ से भारत के इस महान सपूत को शत-शत नमन।

 

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