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समर नीति: रक्षा उत्पादन में क्यों पिछड़ा भारत ?

डीआरडीओ
फाइल फोटो

भारत में रक्षा शोध एवं स्वदेशी रक्षा तकनीक के विकास के लिये 40 से अधिक रक्षा प्रयोगशालाएं रक्षा शोध एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के तहत चल रही हैं और इनके शोध प्रतिफलों को जमीन पर उतारने के लिये 40 से अधिक आयुध कारखाने और आठ सार्वजनिक उपक्रम हैं लेकिन इसके बावजूद भारत रक्षा शोध एवं स्वदेशी रक्षा तकनीक के विकास के मामले में पिछडा देश ही कहा जाएगा।





वास्तव में भारत के रक्षा शोध के संस्थान नागरिक अकादमिक संगठनों और शैक्षणिक संस्थानों से अलग हो कर ही काम करते रहे हैं। रक्षा क्षेत्र में गोपनीयता का भूत इस कदर भारतीय रक्षा प्रतिष्ठानों पर हावी रहता है कि भारत के रक्षा कार्यक्रमों से नागरिक शोध प्रतिष्ठानों को हाल तक नहीं जोड़ा जाता रहा है। हालांकि हाल के सालों में इस प्रवृति में थोड़ा स्वागत .योग्य बदलाव आया है लेकिन रक्षा और नागरिक शोध संस्थानों में तालमेल काफी बढ़ाने की जरुरत है । इसी की बदौलत भारत अपने रक्षा शोध एवं उत्पादन  को नया आयाम देने के लिये अपनी राष्ट्रीय प्रतिभा का सक्षम इस्तेमाल कर सकता है।

देश के रक्षा कर्णधारों ने देर से ही सही लेकिन इस सच्चाई को स्वीकार कर नागरिक क्षेत्र के अकादमीशियनों और वैज्ञानिकों को रक्षा कार्यक्रमों से जोड़ने की नई पहल की है जिसका प्रतिफल हम कुछ सालों बाद देख सकते हैं। भारत आधुनिक युद्धक टैंकों, लड़ाकू विमानों, पनडुब्बियों आदि के स्वदेशी उत्पादन के लिये जरूरी तकनीक और डिजाइन की क्षमता नहीं हासिल कर सका लेकिन भारत को इसके लिये पश्चाताप करने की जरुरत नहीं है। भारत को आगे की ओर देखना होगा और विज्ञान औऱ तकनीक के जो नये क्षेत्र उभर रहे हैं उन पर विशेष ध्यान दे कर समन्वित तरीके से और योजनाबद्ध ढंग से आगे बढना होगा।

इसी इरादे से  रक्षा शोध एवं विकास संगठन ( डीआरडीओ) ने एक राष्ट्रीय कार्यशाला का हाल में आयोजन किया जिसमें पहली बार नागरिक क्षेत्र के अग्रणी वैज्ञानिकों और विज्ञान प्रशासकों ने भाग ले कर नागरिक और रक्षा क्षेत्र में परस्पर सहयोग की नई बुनियाद रखी है। आज की दुनिया में साइबर तकनीक,   नैनो तकनीक , कृत्रिम  बुदिध , टेराहर्ट्ज टकनालाजी, क्वांटम तकनीक ,  रोबोटिक्स ,  स्मार्ट मटीरियल  आदि के क्षेत्र में जो उपलब्धियां हासिल की जा रही हैं उनसे भारतीय वैज्ञानिकों को भी होड़ करना होगा और  देखना होगा कि आधुनिक विज्ञान औऱ तकनीक के इन सब क्षेत्रों में भारतीय वेज्ञानिक संस्थान भी अपने पांव जमा सकें। रोचक बात यह है कि इन सब क्षेत्रों में भारतीयों ने अपने झंडे तो गाड़े हैं लेकिन विदेशी वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों , बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और विश्वविद्यालयों आदि के लिये ही अपने हुनर दिखाने में कामयाबी हासिल की है।

खेद की बात यही है कि विदेशी प्रतिष्ठान भारतीय प्रतिभाओं के हुनर का लाभ तो उठा लेते हैं लेकिन भारतीय अकादमिक या वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों से बिरले ही कुछ ऐसी प्रतिभाएं निकल पाती हैं जो कुछ कर दिखाने में कामयाब हो पाती हैं।  इसके लिये जरूरी होगा कि भारतीय प्रतिष्ठानों को स्वायत्तता और अकादमिक आजादी और समुचित वित्तीय कोष के साथ वैज्ञानिक शोध एवं विकास का काम करने की छूट मिले। विकसित देशों में तो रक्षा और नागरिक प्रतिष्ठानों और कम्पनियों के बीच खुला आदान प्रदान होता है।

इसी दिशा में डीआरडीओ ने अकादमिक जगत और रक्षा प्रतिष्ठानों के अग्रणी प्रतिनिधियों के बीच तालमेल स्थापित करने के लिये गत 13 नवम्बर को एक अहम पहल की है जिसे यदि राष्ट्रीय संकल्प और दृढ़ निश्चय के साथ आगे बढ़ाया जाए तो भारतीय प्रतिभाएं देश में ही अपने हुनर से देश औऱ दुनिया को परिचित करा सकेंगी । इससे भारत अपने बल पर रक्षा शोध एवं विकास की दुनिया में अपने झंडे गाड़ सकेगा। ‘मेक इन इंडिया’ को इसी रोडमैप से सच्चाई में बदला जा सकेगा।

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