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सैनिक व साहित्यकार को सम्मान

सैनिक और साहित्यकार महाबलेश्वर को सरस्वती सम्मान

नई दिल्ली। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में मोर्चे पर बंदूक संभालने के बाद महाबलेश्वर सैल ने कलम संभाली। पहले उन्हें देश की सेवा के लिए सम्मान मिला और अब साहित्य की सेवा के लिए। कोंकणी भाषा में उनके उपन्यास हावठण के लिए इसी हफ्ते उन्हें 26वां सरस्वती सम्मान (वर्ष 2016) दिया गया। गोवा में लुप्त हो रही कुम्हार समुदाय की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और उसके मर्म को महाबलेश्व सैल ने अपने उपन्यास में उकेरा है। यह उपन्यास वर्ष 2009 में प्रकाशित हुआ था।





सम्मान समारोह राष्ट्रीय संग्रहालय में आयोजित हुआ। मुख्य अतिथि थीं केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री निर्मला सीतारमण। उन्होंने श्री महाबलेश्वर सैल को प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिह्न और 15 लाख रुपये की नकद राशि देकर सम्मानित किया।

वर्ष 1943 में 4 अगस्त को कर्नाटक के कारवार के समीप माजाली गांव में जन्मे महाबलेश्वर सैल कोंकणी और मराठी के प्रसिद्ध लेखकों में से एक है। वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में पंजाब की हुसैनवाला सीमा पर उन्होंने दुश्मनों का खूब मुकाबला किया। बाद में उन्होंने कलम थाम ली। मराठी और कोंकणी में समानाधिकार से लिखने वाले महाबलेश्वर के मराठी में चार नाटक और एक उपन्यास तथा कोंकणी में पांच लघु कथा संकलन और सात उपन्यास छप चुके हैं। साहित्य अकादमी ने वर्ष 1993 में उन्हें तरंगां के लिए सम्मानित किया था। तरंगां लघु कथाओं का संकलन है।
इस अवसर पर महाबलेश्वर ने कहा मानवता के संदेश को लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा। समारोह में केके बिड़ला फाउंडेशन की अध्यक्ष शोभना भरतिया और समिति के सदस्य सुरेश ऋतुपर्ण सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद थे।

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