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सारागढ़ी: जब 21 सिख जवानों ने दुश्मनों को धूल चटाई

सारागढ़ी के योद्धा

क्या 21 आदमी 10-12 हजार लोगों का मुकाबला कर सकते हैं? जवाब में कोई भी नहीं ही कहेगा। लेकिन आज से 120 वर्ष पहले सिर्फ 21 सिख योद्धाओं ने लगभग 12 हजार अफगानों का मुकाबला किया था। अफगानी कबाइलियों के खिलाफ लड़ी गई इस जंग में भारतीय योद्धाओं ने शौर्य की ऐसी मिसाल कायम की कि यूनेस्को ने इस लड़ाई को विश्व की आठ श्रेष्ठ जंग में शामिल किया।





कहां हुई थी लड़ाई ?

यहीं हुआ था सारागढ़ी का ऐतिहासिक युद्ध

यहीं हुआ था सारागढ़ी का ऐतिहासिक युद्ध (फ़ाइल फोटो )

एक सौ बीस वर्ष पहले आज ही के दिन 12 सितंबर 1897 को अविभाजित भारत के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत (अब पाकिस्तान) में स्थित हिंदुकुश पर्वतमाला के समाना क्षेत्र में एक छोटा से गांव सारागढ़ी में लड़ा गया था यह युद्ध। कबाइलियों की लूटमार पर नियंत्रण के लिए अंग्रेजों ने खानकी घाटी में लोकहार्ट किले और गुलिस्तान किले में अपनी सेना तैनात कर रखी थी। दोनों किले आमने-सामने नहीं थे, किसी किले पर हमले हो जाए तो दूसरे को पता नहीं चल सकता था। इसलिए दोनों किलों के बीच में सारागढ़ी पहाड़ी पर संकेतों का आदान-प्रदान करने के लिए एक रिले चौकी बनाई गई। उस समय सूचनाओं का आदान-प्रदान हेलियोग्राफी और दृश्य संकेतों के द्वारा होता था। इस चौकी का मुख्य काम सूचनाएं भेजने का था इसलिए यहां ज्यादा सैनिक नहीं होते थे।

पहले गुलिस्तान किले पर हुआ था हमला

गुलिस्तान-किला

कबाइलियों ने 3 सितंबर को गुलिस्तान किले पर हमला किया

सारागढ़ी पर हमले से नौ दिन पहले कबाइलियों ने 3 सितंबर को गुलिस्तान किले पर हमला किया। यहां तैनात 36 सिख बटालियन ने हमले को नाकाम कर दिया। गौरतलब है कि 20 अप्रैल 1894 को ब्रिटिश आर्मी में कर्नल जे. कूक की कमान में 36 सिख बटालियन का गठन किया गया था और वर्ष 1897 में दोनों किलों पर इसे तैनात किया जा रहा था। तीन सितंबर के हमले में कबाइलियों को मात तो मिली लेकिन छह दिन बाद उन्होंने फिर हमला किया। नतीजा इस बार भी वही रहा और इस बार भी वे परास्त हुए।

दोनों किलों का संपर्क तोड़ने के लिए सारागढ़ी पर हमला

सारागढ़ी पर हमला

सारागढ़ी पर हमला (फाइल)

लोकहार्ट और गुलिस्तान किले का संपर्क तोड़ने के लिए कबाइलियों ने सारागढ़ी और लोकहार्ट किले पर घेरा डाल दिया। 12 सितंबर को भारी संख्या में कबाइलियों ने हमला कर दिया। अलग-अलग स्रोतों के मुताबिक हमलावर 10 से 15 हजार के बीच माने जाते हैं। सारागढ़ी चौकी में मौजूद थे सिर्फ 21 सिख सैनिक। संख्या के हिसाब से मामला गैरबराबरी का था लेकिन बहादुर सिखों ने लड़ने का फैसला किया।

हवलदार ईशर सिंह कर रहे थे नेतृत्व

हवलदार ईशर सिंह

हवलदार ईशर सिंह (प्रतीकात्मक)

कबाइली गुल बादशाह ने पोस्ट कमांडर ईशर सिंह को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा। निकलने के लिए सुरक्षित रास्ता देने का वादा भी किया लेकिन ईशर सिंह ने पेशकश ठुकरा दी। हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्व में सिख जवानों ने मोर्चा ले लिया। जवानों के लड़ने के तरीके और उनकी बहादुरी का कमाल था कि हमलावरों को लगा कि सामने अच्छी-खासी फौज है। हमलावरों ने सारागढ़ी पोस्ट की दीवार तोड़ने की कोशिश की लेकिन ईशर सिंह औऱ उनके साथियों ने एक के बाद एक हमलावरों को ढेर करना शुरू कर दिया। अपने साथियों की लाशें गिरते देख हमलावरों में हड़कंप मच गया। लांस नायक लाभ सिंह और भगवान सिंह ने दुश्मन पर आगे बढ़कर हमला किया। भगवान सिंह ने शहीद होने से पहले दुश्मन के ढेरों सिपाहियों को मार गिराया।

दुश्मन ने रोका मदद का रास्ता

सारागढ़ी

सारागढ़ी में क्या चल रहा है यह लोकहार्ट किले से देखा जा सकता था। फिर सिग्नलमैन गुरमुख सिंह भी आइने चमकाकर संकेतों से लड़ाई का हाल लोकाहार्ट किले तक पहुंचा रहे थे। लोकहार्ट किले से मदद भेजने का प्रयास विफल हो गया क्योंकि कबाइलियों ने भारी संख्या में घेरा डाला हुआ था। हमलावर एक के बाद एक मारे जा रहे थे लेकिन बहादुर सिखों की ताकत भी कम होती जा रही थी।

आधे जवान हो गये शहीद लेकिन दोगुनी हो गई बंदूकें

सारागढ़ी के योद्धा

सारागढ़ी के योद्धा (फाइल)

आधे जवान शहीद हो गये तो गुरमुख सिंह ने संदेश भेजा, हमारे आधे सैनिक शहीद हो गये लेकिन बचे सैनिकों के पास लड़ने के लिए दो-दो बंदूकें हो गई हैं। यह था उन सैनिकों का जज्बा। उन्हें अपनी जिंदगी की कोई चिंता नहीं थी। उनके सामने सिर्फ एक लक्ष्य था कि आखिरी सांस तक दुश्मन का मुकाबला करेंगे।

हमलावर हावी होने लगे तो गुरमुख सिंह ने संदेश भेजा कि अब संदेश भेजने से ज्यादा जरूरी है लड़ना। मुझे लड़ने की इजाजत दी जाए। गुरमुख को इजाजत मिल गई। उन्होंने बंदूक उठाई और मोर्चे पर जम गए। लड़ाई छिड़े घंटों हो गए लेकिन हमलावर आगे नहीं बढ़ पाए। कबाइलियों ने चारों ओर जमा घास-फूस व झाड़-झंखाड़ इकट्ठा कर चारों ओर आग लगा कर चौकी में सेंध लगा दी। आमने-सामने की लड़ाई में कबाइलियों को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि सभी 21 रणबांकुरे शहीद हो गये लेकिन इससे पहले उन्होंने 400-500 के लगभग दुश्मन मार गिराए। यानी हरेक सिख जवान ने बीस से ज्यादा दुश्मनों को मार गिराया। मात्र 21 सिख जवानों का मुकाबला करने में ही कबाइलियों की ऊर्जा खत्म हो गई और अगले दो दिन में ही वे हार गये।

सभी शहीदों को इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट का सम्मान

सारागढ़ी

ब्रिटिश संसद में जब इस लड़ाई के बारे में बताया गया तो सभी सदस्यों ने खड़े होकर इन बहादुरों के सम्मान में तालियां बजाईं और उन्हें सलाम किया। सारी दुनिया इन सैनिकों के बलिदान से विस्मित थी। महारानी विक्टोरिया ने इन जवानों के शौर्य को सराहा। सभी 21 जवानों को इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित किया। बहादुरी की ऐसी मिसाल दूसरी नहीं मिलती। यूनेस्कों ने इसे विश्व की 8 सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ लड़ाइयों में शुमार किया। ब्रिटेन में आज भी इस लड़ाई को याद किया जाता है।

सारागढ़ी के शहीदों की याद में स्मारकों का निर्माण

सारागढ़ी मेमोरियल

सारागढ़ी मेमोरियल (फाइल फोटो)

सारागढ़ी में शहीदों की याद में स्तूप, लोकहार्ट में स्तंभ और अमृतसर तथा फिरोजपुर में समाधि स्थलों का निर्माण किया गया। फिरोजपुर में स्मारक इसलिए बनाए गए क्योंकि ज्यादातर शहीद यहीं के थे। स्मारकों के निर्माण में महारानी विक्टोरिया के साथ-साथ जनता ने भी सहयोग किया। सारागढ़ी युद्ध के 120 वर्ष पूरे होने के मौके पर पंजाब में कई जगह कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।

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