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 चीन के खिलाफ नया गठजोड़ 

रंजीत-कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

रंजीत कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

न्यूयार्क में भारत, जापान और अमेरिका के विदेश मंत्रियों की 18 सितम्बर को पहली त्रिपक्षीय बैठक हुई जो एक नए उभरते अंतर्राष्ट्रीय समीकरण की ओर इशारा करती है। भारत इसके पहले रूस और चीन के साथ त्रिपक्षीय शिखर  बैठकें करता रहा है लेकिन पिछले मार्च  महीने में रूस-चीन-भारत त्रिपत्रीय बैठक को भारी धक्का तब लगा था जब चीन के विदेश मंत्री वांग ई ने यह कह कर भारत आने से मना कर दिया था कि  व्यस्तता की वजह से वह नई दिल्ली नहीं पहुंच सके जबकि सचाई यह थी कि वह भारत से इसलिये नाराज थे कि भारत ने  इस साल के शुरू में दलाई लामा को अरुणाचल  प्रदेश का दौरा करने दिया। आखिर इस रूस-चीन-भारत त्रिपक्षीय बैठक से अब तक भारत को मिला ही क्या? इस पृष्ठभूमि में भारत द्वारा अमरीका और जापान के विदेश मंत्रियों के साथ विदेश मंत्री स्तर की बैठक करने की विशेष अहमियत है। इस  बैठक में जो बातें की गईं वह चीन को निशाना बना कर ही थीं।





इसके  करीब एक दशक पहले भारत, जापान, अमेरिका और आस्ट्रेलिया की चतुर्पक्षीय बैठक में चीन से रिश्तों की संवेदनशीलता के मद्देनजर भारत ने इसमें भाग लेने से परहेज  किया था। लेकिन अब जबकि चीन खुल कर भारत के खिलाफ खड़ा हो गया है और आपसी सीमा मसलों से लेकर अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत का खुलकर विरोध कर दुश्मनागत का रवैया दिखाने लगा है भारत के लिये यह लाजिमी था कि अपने राष्ट्रीय सामरिक हितों की रक्षा के लिये  उन देशों  से हाथ मिलाए और उनके साथ सामरिक रिश्ते गहरे करने की पहल करे  जो चीन के आक्रामक रवैये से परेशान हैं।  दक्षिण चीन सागर में चीन ने जिस तरह प्रभुत्वकारी  व विस्तारवादी नीति लागू करनी शुरू की है उसे अमेरिका और जापान पचा नहीं पा रहे हैं।

जून के मध्य से अढ़ाई महीने तक जिस तरह चीनी सेना ने भूटान के डोकलाम इलाके में आपसी सहमतियों को तोड़ते हुए सडक़ बनानी शुरू की और भारत द्वारा इसे रोके जाने के बाद चीनी सरकारी मीडिया में भारत के खिलाफ जो  जहर उगला गया उससे भारत को अब पूरा भरोसा हो गया है कि चीन कभी भारत का सच्चा दोस्त नहीं हो सकता। इसलिये भारत के सामरिक हितों की कीमत पर  एशिया में चीन के विस्तारवादी और आक्रामक सैन्य रवैये का रोकना भारत के लिये जरूरी हो गया था और ऐसा लगता है कि यह तभी मुमकिन हो सकता है जब चीन के रवैये से परेशान देश एकजुट हों।  न्यूयार्क  में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन और जापानी विदेश मंत्री तारो कोनो की बैठक इस मायने में ऐतिहासिक हो सकती है। हो सकता है कि इसमें आस्ट्रेलिया भी बाद में साथ हो ले और इसे पुराने प्रस्तावित चतुर्पक्षीय आकार दे दें।  भारत आस्ट्रेलिया और अमेरिका की त्रिपक्षीय बैठकें तो पहले से ही हो रही हैं  लेकिन अब जबकि भारत जापान और अमेरिका ने त्रिपक्षीय बैठक कर आपसी हितों के  क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय मसलों पर बैठक की है यह लाजिमी है कि इन तीनों त्रिपक्षीय बैठकों के भागीदार देश मिल कर चर्तुपक्षीय बैठक का सिलसिला शुरु करें तो चीन के लिये यह एक बड़ा संदेश होगा कि यदि वह अपने भौगोलिक इलाके से बाहर जाकर अपने पड़ोसी देशों जैसे भारत , वियतनाम , जापान आदि के भूभाग पर दावा करता है और इनके पडोस वाले देशों के साथ चिंता पैदा करने  वाला रिश्ता बनाता है तो बाकी देश भी चीन के खिलाफ आपसी एकजुटता मजबूत करेंगे।

 

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