Kargil Diary

#Kargildiary : … मां एक दिन ऐसा काम कर जाऊंगा!

सौरभ-कालिया





मां तुम देखना एक दिन ऐसा काम कर जाऊंगा कि सारी दुनिया में मेरा नाम होगा। मां के साथ आखरी मुलाकात में यह वाक्य लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया ने कहा था। वही सौरभ कालिया जिसने करगिल क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना और घुसपैठ का सबसे पहले पता लगाया था।

‘आपरेशन विजय’ में शहीद हुए लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया की मां विजय की आंखें तब बार-बार नम हो जाती हैं जब जब उन्हें अपने वीर सपूत का कहा वो आखिरी वाक्य याद आता है। इसे भी एक अजीब इत्तेफाक कहा जाएगा कि बजरंग बली के भक्त सौरभ ने सैनिक कार्रवाई के लिए 16 हजार फुट ऊंची जिस जगह को चुना उसे बजरंग चौकी कहा जाता है।

दिसंबर 1998 में कमीशन प्राप्त कर लेफ्टिनेंट बना 22 वर्षीय सौरभ हिमाचल प्रदेश के पालमपुर निवासी वैज्ञानिक एन. के. कालिया का बड़ा बेटा था। 4 जाट रेजिमेंट (इनफेंटरी) के लेफ्टिनेंट के रूप में उसकी पहली तैनाती करगिल सेक्टर में ही हुई। मई के पहले पखवाड़े में वो तीन बार काकसर क्षेत्र में गश्त पर गया तो उसी दौरान उसने वहां पाकिस्तानी सेना व घुसपैठियों के बारे में सूचना दी।

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शहीद लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया की मां विजय की आंखें बात करते बार-बार नम हो जाती (फाइल फोटो)

इतना ही नहीं घुसपैठियों की संख्या और उनके इरादों से बेखबर बहादुर सौरभ मुठ्ठी भर जवानों के साथ उस खतरनाक चोटी पर पहुंच गया। पहुंचते ही उन्हें पाकिस्तानियों की गोलियों का सामना करना पड़ा। वीर जवान करीब 30 घंटे तक उनके साथ संघर्ष करते रहे पर गोली बारूद खत्म हो गया, वायरलेस खराब हो गया। दुश्मनों की तादाद 200 थी। पाकिस्तानियों ने सौरभ और गश्ती दल के पांचों जवानों को बंधक बना लिया। यही नहीं 22 दिन तक बंधक रखे गए उन भारतीय सैनिकों को अमानवीय यातनाएं दी गई, उनके जिस्म पर जलती सिगरेट लगाई गई, गर्म सलाखें कान में डाली गई, आंखें निकाल ली गई, विभिन्न अंग काट दिए गए। पर इन तमाम शारीरिक व मानसिक यातनाओं के बावजूद सौरभ और बाकी जवानों से दुश्मन सैनिक वो नहीं उगलवा पाए जो वह चाहते थे। अंतत: पाकिस्तान ने उनके शव लौटाए।

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4 जाट रेजिमेंट (इनफेन्टरी) के लेफ्टिनेंट के रूप में पहली तैनाती करगिल सेक्टर में ही हुई (फाइल फोटो)

पाकिस्तान ने युद्ध बंदियों के साथ अमानवीयता व बर्बरता तो की ही साथ ही युद्धबंदियों से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय कानून कायदों का भी उल्लंघन किया। सौरभ के पिता व पेशे से विज्ञानी एनके कालिया अपने हृदय की पीड़ा को जब बयान करते हैं तो बहुत कड़वी पर सच्ची बात कहते हैं। वे कहते हैं, ‘देश के लिए कुर्बान होना हरेक सैनिक के लिए सम्मान की बात है लेकिन कोई मां बाप, सेना या देश उसको स्वीकार नहीं कर सकता जो कुछ सौरभ व उसके साथी सैनिकों के साथ हुआ।’

बड़े ही व्यथित पर अपनी बात जारी रखते हुए वे कहते हैं, ‘मुझे काफी तकलीफ हुई है मेरा बेटा मुझसे बिछड़ गया, मुझे उससे भी ज्यादा पीड़ा तब हुई जब मुझे अपने बेटे के साथ हुए बर्ताव का पता चला लेकिन हमारे देश की सत्ता और ऊंचे पदों पर जो लोग विद्यमान हैं उनके द्वारा इस मामले पर चुप्पी साधे रखने से मुझे सबसे ज्यादा अफसोस हुआ है।’ श्री कालिया सवाल करते हैं, ‘आखिर वे लोग पाकिस्तान की इस करतूत को क्यों नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उजागर करते।’ ऐसा न करके हमारी सरकार उन सैनिकों का मनोबल गिरा रही है जो सीमा पर लड़ रहे हैं और जिनके मन में आशंका होगी कि युद्ध में बंदी बना लिए जाने की स्थिति में पाकिस्तान उनके साथ भी वही सलूक कर सकता है।

श्री कालिया ने पूरे राष्ट्र विशेषकर प्रबुद्ध वर्ग से अपील की है कि पाकिस्तान द्वारा युद्ध बंदियों के साथ किए गए इस सलूक को एक राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में लें ताकि पाकिस्तान को इस करतूत की सजा दिलाई जा सके।

इसे भाग्य का क्रूर खेल ही कहा जाएगा कि अति धार्मिक प्रवृत्ति, प्रकृति प्रेमी व दयावान सौरभ को ऐसी बर्बरता का सामना करना पड़ा।

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