Kargil Diary

#Kargildiary : मेजर कंवल गुलजार का वो आखिरी फोन

करगिल संघर्ष





मेजर के. जी. सिंह ‘अमर रहे’, ‘भारत माता की जय’, ‘वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फ़तेह’ नारों से उस दिन जलंधर शहर गूँज रहा था। विवेक विहार स्थित मेजर कंवल गुलजार सिंह के घर से लेकर श्मशान भूमि तक के करीब आठ किलोमीटर लम्बे रास्ते के दोनों ओर लोगों का हुजूम देश के उस सिपाही को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए उमड़ रहा था। हर कोई मेजर की आखिरी विदाई में उसका आखिर तक साथ देना चाहता था।

  • पर जो सम्मान मेजर कंवल गुलजार अपनी शहादत के जरिए परिवार को दे गए, इतना सम्मान आज तक इस फौजी परिवार को नहीं मिला।

3 अप्रैल 1962 को जन्मे कंवल गुलजार सिंह अपने परिवार में कोई एकमात्र फौजी नहीं थे। उनके भाई, पिता और दादा के अलावा और भी परिजन ऐसे हैं जो फौज की नौकरी कर चुके हैं या कर रहे हैं। पर जो सम्मान मेजर कंवल गुलजार अपनी शहादत के जरिए परिवार को दे गए, इतना सम्मान आज तक इस फौजी परिवार को नहीं मिला।

32 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात मेजर कंवल गुलजार सिंह मई माह के आखिर तक मणिपुर में तैनात थे। जून में उनकी यूनिट को मणिपुर से कश्मीर के आदेश मिले। जिस ट्रेन में मेजर कंवल गुलजार जा रहे थे पांच जून को जालंधर पहुंची थी। तब पूरा परिवार उस सिपाही से मिलने रेलवे स्टेशन आया था। यह मुलाकात कई महीनों के बाद हुई थी। सब लोग बहुत खुश थे। इसके बाद काफी दिन तक मेजर कंवल गुलजार और उसके परिवार के बीच कोई संपर्क नहीं हुआ।

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मेजर कंवल गुलजार सिंह के पिता अवकाश प्राप्त मेजर करतार सिंह

उस दिन 3 जुलाई थी। मेजर कवल गुलजार का फोन आया। पिता सेवानिवृत्त मेजर करतार सिंह से उनकी बात हुई। परीक्षा की उस घड़ी में पिता ने पुत्र का हौसला बढाया, विजयश्री का आशीर्वाद दिया और दीर्घायु की कामना की। उस फोन के आने से परिवार वालों को काफी तसल्ली हुई परन्तु फोन पर हुई वार्ता मेजर कंवल गुलजार और उसके पिता की आखिरी वार्ता थी। उसी रात कंवल गुलजार सिंह जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा इलाके में अपनी टुकड़ी के साथ गश्त पर थे। रास्ते में घात लगाकर बैठे आतंकवादियों ने ताबड़तोड़ गोलीबारी करते हुए सैनिक टुकड़ी पर हमला बोल दिया। सैनिक टुकड़ी व आतंकवादियों में जवाबी फायरिंग हुई। मेजर कंवल गुलजार को 18 गोलियां लगीं। इस लड़ाई में वे खेत रहे।

  • फौजियों का सम्मान यहां मरने के बाद ही होता है। जिन्दा रहते उनकी तकलीफों को सुनने व समस्याओं का निराकरण करने वालों का अभाव है।

कंवल गुलजार की शहादत की सूचना पहले मेरठ पहुंची जहाँ छावनी में उन्हें आवास मिला हुआ था। कंवल गुलजार की पत्नी हरजीत कौर व दोनों बच्चे वहीं रह रहे थे। सुबह 11 बजे बड़े भाई परमजीत सिंह को अखनूर में पता चला कि उनका अनुज वीरगति को प्राप्त हुआ है। मेजर परमजीत 31 मीडियम रेजिमेंट में है। मेजर परमजीत बताते हैं कि विज्ञान में स्नातक उनके भाई को पुस्तकें पढने, संगीत सुनने और हॉकी खेलने का शौक था पर फौजी जीवन से उससे भी अधिक लगाव था। पिछले आठ महीनों से तो कंवल गुलजार ने कोई छुट्टी भी नहीं ली थी। हाई एल्टीट्यूड वार कोर्स, कमांडो ट्रेनिंग, ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी मद्रास, स्टाफ कालेज और भी न जाने क्या क्या कर रखा था मेजर कंवल गुलजार ने।

शहीद मेजर का यह फौजी परिवार शहीदों को जनसाधारण की ओर से दिए जाने वाले सम्मान को लेकर खुद को बहुत कृतज्ञ मानता है और सरकार द्वारा शहीद सैनिकों को सैनिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किए जाने को लेकर अच्छे कार्य के रूप में देखता है। परन्तु दूसरी तरफ यही परिवार इस बात को लेकर भी चिंतित है कि फौजियों का सम्मान यहां मरने के बाद ही होता है। जिन्दा रहते उनकी तकलीफों को सुनने व समस्याओं का निराकरण करने वालों का अभाव है।इसके लिए परिवार के सदस्य नेताओं और अफसरशाहों को दोषी मानते हैं।

परिवार को शोक की घड़ी में सांत्वना देने आए सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर परमजीत सिंह कहते हैं कि राजनेताओं ने हमारी सेना को भी राजनीति का अड्डा बनाना शुरू कर दिया है। इसे वोट बैंक समझा जाने लगा है। फौजियों की भलाई के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं मात्र की जाती हैं। कोई ठोस योजना सामने नहीं लाई जाती। पर, साथ ही वह मानते हैं कि इन हालत के लिए अति वरिष्ठ पदों पर आसीन सैन्य अधिकारी भी दोषी हैं।

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