Kargil Diary

#Kargildiary : वो कर दिया जो बड़े-बड़ों के वश में नहीं

सतवंत-सिंह

पिछले साल जनवरी की ही तो बात है। सतवंत सिंह सेना में भर्ती हो गया था। इसी के साथ सरदार कश्मीर सिंह और सरदारनी सुखदेव कौर की इच्छा पूरी हो गई थी। वे अपने सबसे बड़े बेटे को कामयाबी की पहली सीढ़ी पर पांव रखते देख रहे थे। उस दिन उन्होंने वाहे गुरु के सामने अरदास की थी कि पुत्तर कामयाबी की और ऊंचाइयां छुए।





  • सालाहपुर बेत गांव का सतवंत करगिल में शहीद हुए सबसे कम उम्र के सैनिकों में से एक था। उसकी उम्र थी 20 बरस।

सतवंत ने उनकी उस इच्छा को शायद दूसरे ढंग से पूरा कर डाला। देश की रक्षा की राह पर कुर्बान होकर उसने उन ऊंचाइयों को छू डाला जिन्हें छूना बड़े-बड़ों के वश में नहीं है। गुरदासपुर के चक्क शरीफ तहसील क्षेत्र स्थित सालाहपुर बेत गांव का सतवंत करगिल में शहीद हुए सबसे कम उम्र के सैनिकों में से एक था। उसकी उम्र थी 20 बरस।

सतवंत-का-परिवार

शहीद सतवंत सिंह के परिवार के सदस्य

सतवंत के पिता बताते हैं, ‘हम सात भाई हैं मुझे छोड़कर बाकी सारे फौज में रहे हैं। सतवंत की भी बहुत इच्छा थी कि चाचा ताऊ की तरह सैनिक बनूं।’ दसवीं का इम्तहान पास करने के बाद सतवंत ने इस दिशा में प्रयास शुरू कर दिए थे। वो तीन चार बार सेना के भर्ती दफ्तर गया पर हर बार उसे मायूस होकर लौटना पड़ा। भर्ती अफसर ने कह दिया कि तुम्हारा कद 2 सेंटीमीटर कम है। बस फिर क्या था सतवंत पर कद बढ़ाने का भूत सवार हो गया। दिन हो या रात ज़रा सी फुर्सत मिलती नहीं थी कि व्यायाम शुरू कर देता था। कितनी-कितनी देर तक पेड़ पर लटका रहता। खैर, एक दिन उसकी मेहनत और लगन रंग लाई। इस बार उसकी लंबाई ठीक पाई गई। सतवंत सेना में भर्ती हो गया।

नौ महीने की ट्रेनिंग पूरी करके वो एक बार पंद्रह दिन के लिए और दूसरी बार सिर्फ दो दिन के लिए परिवार वालों से मिलने आया था। आठ मार्च को उसकी यूनिट 8 सिख रेजिमेंट करगिल चली गई।

  • 1965 और 1971 के युद्धों में हिस्सा ले चुके सुरजीत कहते हैं हमें तो अपने और लड़के फौज में भेजने हैं। बंगाल इंजीनियर्स से सेवानिवृत्त हुए 65 वर्षीय कुलवंत सिंह के दो पुत्र अभी भी फौज में हैं।

वो दो जुलाई की रात थी। घुसपैठियों से मुकाबले के बाद कुछ देर से शांति बनी हुई थी। वक्त रात के करीब 11 बजे का था। सतवंत को पहाड़ी पर चढ़कर तिरंगा फहराना था कि तभी आसमान में अचानक कुछ चमका जिसकी रोशनी से वह पूरा पहाड़ी क्षेत्र जगमगा उठा। पाकिस्तानियों ने वैरी लाइट पिस्टल चलाई थी और यह रोशनी उसी से हुई थी। रोशनी होते ही भारतीय सैनिक लेट गए दुश्मन को तब तक उनकी मौजूदगी का पता चल चुका था। दुश्मन ने मोर्टार का गोला दागा। सतवंत और उसके दो साथी शहीद हो गए।

सतवंत की शहादत का बयान उसके ताऊ सुरजीत सिंह और कुलवंत सिंह कर रहे थे। दोनों ही एक जमाने में फौजी रहे हैं और उन्हें गर्व है अपने शहीद भतीजे पर। 1965 और 1971 के युद्धों में हिस्सा ले चुके सुरजीत कहते हैं हमें तो अपने और लड़के फौज में भेजने हैं। बंगाल इंजीनियर्स से सेवानिवृत्त हुए 65 वर्षीय कुलवंत सिंह के दो पुत्र अभी भी फौज में हैं।

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