Kargil Diary

#Kargildiary : शहादत के बाद दो परिवारों में ऐसे बना… मौत का रिश्ता !





जन्म ही नहीं, कभी-कभी मृत्यु भी रिश्ते बनाती है। बलविंदर कौर और दलजीत कौर में एक ऐसा ही रिश्ता कायम हुआ है। एक अनाम रिश्ता। वे दोनों पत्नियां हैं उन शहीदों की जिन्होंने वतन की राह पर एक साथ प्राण त्यागे। वे शहीद हैं 8 सिख रेजिमेंट के सूबेदार जोगिंदर सिंह और नायक रंजीत सिंह। पंजाब के होशियारपुर जिला स्थित म्यानी गांव में रहता है सूबेदार जोगिंदर सिंह का परिवार और वहां से बमुश्किल चार किलोमीटर के फासले पर है रंजीत सिंह का गांव रड़ा। ये दोनों ही गांव सलेमपुर तहसील में है।

बरसों से एक ही यूनिट में तैनात सूबेदार जोगिंदर सिंह और नायक रंजीत सिंह को पता नहीं चल सका था कि वो पड़ोसी हैं। दोनों ही सालाना छुट्टी लेकर घर आया करते थे। रास्ता एक ही था पर कभी रास्ते में मिले नहीं। गांव आकर भी कभी उनके बीच मुलाकात नहीं। पर इस बार वे दोनों साथ-साथ आए और वो भी बहुत लंबा सफर तय करके, शहीद होकर। वो तारीख थी 23 मई 1999।

गांव के लोगों को याद है। उस दिन खूब बारिश हो रही थी। दोनों का अंतिम संस्कार अलग-अलग जगह किया गया पूरे सैनिक सम्मान के साथ। बाइस वर्ष पूर्व (उस समय के हिसाब से) सेना में भर्ती हुए सूबेदार जोगिंदर के लिए परीक्षा की घड़ी थी। करगिल क्षेत्र में पाकिस्तानी सैनिक व घुसपैठिए पहुंच चुके थे और भारतीय सेना उनको खदेड़ने के लिए अथक प्रयास कर रही थी। उसी आपरेशन विजय के तहत सूबेदार जोगिंदर सिंह को ‘टाइगर हिल’ पर कार्रवाई करने का आदेश दिया गया। सूबेदार जोगिंदर सिंह एक कंपनी फोर्स (करीब 80 सैनिक) के साथ पहाड़ी पर पहुंच गए। 18 मई की रात उन्हें गश्त करते हुए एक अन्य चौकी तक पहुंचना था कि अचानक पाकिस्तानियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। भारतीय सैनिकों ने इसका तगड़ा जवाब दिया। गोलीबारी के दौरान ही सूबेदार जोगिंदर सिंह और नायक रंजीत बुरी तरह घायल हो गए। कुछ देर बाद उन्होंने वहीं प्राण त्याग दिए।

देश के विभिन्न प्रांतों में तैनाती के बाद सूबेदार जोगिंदर की यूनिट 8 सिख लाइट इनफेंटरी अब पठानकोट में तैनात थी। 18 मार्च को जोगिंदर सिंह एडवांस पार्टी की टुकड़ी लेकर श्रीनगर गए थे। जोगिंदर सिंह पिछली बार आठ फरवरी को छुट्टी लेकर आए थे और बीस दिन बाद ही लौट गए थे। उनकी पत्नी बलविंदर बताती हैं कि हमने सोचा था कि बीच वाले बच्चे जितेंदर सिंह (10 वर्ष) को इस बार कपूरथला स्थित सैनिक स्कूल में भेजेंगे। जितेंदर से बड़ा बलजिंदर सिंह (15 वर्ष) है और सबसे छोटी बिटिया पांच वर्षीय जसविंदर कौर। मां के यह कहने पर कि बड़े बेटे को तो मैं फौज में नहीं भेजूंगी, बलजिंदर उस वक्त तो चुप्पी साधे रहता है पर बाद में मां की अनुपस्थिति में उसने कहा है, ‘मैं तो नेवी में जाऊंगा।’ शायद यह उसका खून ही बोल रहा था। बलजिंदर के पिता ही नहीं दादा और परदादा भी फौज में थे।

सूबेदार जोगिंदर सिंह के पिता सरदार सिंह

उसके दादा सरदार सिंह न सिर्फ देश में बल्कि भारतीय सेना की ओर से दूसरे देशों में भी तैनात रहे हैं। लीबिया में, इटली में, और भी न जाने कहां-कहां। वृद्ध सरदार सिंह से बात करने के लिए थोड़ा ऊंची आवाज में बोलना पड़ता है पर उनके साथ बातचीत करना एक अलग ही अनुभव है। वो सेना और सैनिकों के काम के विभिन्न पहलुओं की खासी समझ रखते हैं। अब और तब की फौज में फर्क के बारे में सवाल पूछे जाने पर वो कहते हैं, ‘अब इस बात की खुशी होती है कि शहीद की लाश घर तो पहुंच जाती है।’ सरदार सिंह याद करते हैं कि वो जमाना जब न तो इतने संचार के माध्यम थे और न ही आवाजाही के बेहतर साधन। शहीद सैनिकों के शव परिवार तक पहुंचने की बात तो बहुत दूर उनकी खबर तक महीनों में पहुंचती थी। दसवीं कक्षा तक पढ़ी लखी बलजिंदर कौर बड़ी ही साधारण सी घरेलू महीला हैं। पति और ससुर से फौज और फौजियों के बारे में उसने जो कुछ भी देखा व सुना वह शायद अच्छा अनुभव नहीं था क्योंकि वह कहती है ‘बड़े बेटे को मैंने फौज में नौकरी नहीं करवानी।’

रंजीत सिंह गोद में बच्चा लिए हुए

कुछ-कुछ ऐसा ही कहती है रड़ा गांव की दलजीत कौर-शहीद रंजीत सिंह की पत्नी। दलजीत कौर का एक ही बेटा है साढ़े पांच बरस का अवनीत सिंह। दलजीत बताती है कि उसके पति का सपना अवनीत को डॉक्टर बनाने का था। मैं भी यही चाहती हूं। 6 फुट लंबा रंजीत मुक्केबाजी का बहुत शौकीन था। सेना में विभिन्न बाक्सिंग मुकाबलों में उसने खूब इनाम जीते व नाम कमाया। उसकी मुक्केबाजी सैनिकों के बीच में ही नहीं गांव के किशोरों-युवकों में भी अपनी जगह रखती थी। रंजीत जब भी सालाना छुट्टी लेकर गांव आता तो वहां के लड़कों को इकट्ठा कर लेता था, उन्हें मुक्केबाजी का प्रशिक्षण दिया करता था।

पति की प्रसिद्धि और बल का जिक्र करते हुए दलजीत का गला रुंध जाता है, आंखें भर आती हैं। पर शायद पति के बारे में बात करते रहना और उसे याद करना दलजीत कौर को कुछ बेहतर महसूस करवा रहा था। वो कहती हैं, ‘उन्हें वेटलिफ्टिंग का भी बहुत शौक था पर घर में उसके लिए सामान नहीं था। अपने इसी शौक को पूरा करने के लिए वो अक्सर ट्रैक्टर का पहिया उठा लिया करते थे।’ तभी रंजीत की मां व दादी वहां आती हैं।

रंजीत सिंह के परिजन (बाएं से) पत्नी, पुत्र, दादी और मां

सूबेदार जोगिंदर सिंह का बड़ा बेटा बलजिंदर (इस संवाददाता के साथ रंजीत के घर गया था) उनके पांव छूकर अभिवादन करता है। दोनों महिलाएं कुछ जिज्ञासा से उसे देखती हैं। इससे पहले कि बुजुर्ग महिलाएं कुछ पूछे दलजीत बलजिंदर का परिचय देते हुए कहती हैं कि ये उन्हीं सूबेदार साहब का बड़ा पुत्र है। इसके बाद दोनों महिलाएं बलजिंदर से उसके परिवार का कुशलक्षेम पूछती हैं। बलजिंदर दलजीत कौर की ओर से मुखातिब होता है, ‘आंटी मम्मी ने पुछवाया है कि अगर आपको भी उनके साथ जाना है तो…’ जवाब में दलजीत कौर उसे समझाती हैं कि तेरी मम्मी और मुझे वहां जाने की कोई जरूरत नहीं है। मेरे ससुर जाएंगे तू उनके साथ चले जाना बस तुम दोनों के वहां जाने से भी काम हो जाएगा। असल में जिस काम की बात हो रही थी वह कागजी कार्यवाही पूरी करवाने से संबंधित था।

यह कागज दलजीत के पति रंजीत सिंह व बलविंदर कौर के पति सूबेदार जोगिंदर सिंह की शहादत से संबंधित थे। बलजिंदर बताता है कि मैं इनके घर पहली बार आया हूं। हमारा परिवार तो इनके बारे में जानता ही नहीं था। हमारी जान पहचान तो डैडी के जाने के बाद ही हुई है।

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