Kargil Diary

#Kargildiary : स्कूल में जूनियर शहादत में सीनियर

कारगिल संघर्ष





हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले का पालमपुर नगर किसी और बात के लिए भले ही ख्याति प्राप्त न कर सका हो पर स्वतंत्र भारत के युद्ध के इतिहास में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करवा गया है। करगिल क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना व घुसपैठियों की आमद का पता लगने के बाद ही युद्ध की स्थिति बनी थी। जहां उस घुसपैठ का पता लगाने वाला लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया पालमपुर का था वहीं, जुलाई में सामरिक महत्व की टाइगर हिल को पाकिस्तानी कब्जे से मुक्त कराने की कार्रवाई में महत्वपूर्ण योगदान देना वाला कैप्टन विक्रम बतरा भी देवभूमि के इसी नगर का बाशिंदा था। यह भी एक इत्तेफाक है कि जिस जिस स्कूल में विक्रम बतरा ने पढ़ाई की उस स्कूल में सौरभ कालिया ने भी शिक्षा पाई। सौरभ स्कूल में विक्रम से जूनियर था पर शहादत के मामले में वो सीनियर निकला। सौरभ की शहादत विक्रम से पहले हुई थी। दोनों के स्कूल एक ही होने के आलावा उनमें एक और समानता थी। दोनों ने ही विज्ञान में स्नातक डिग्री हासिल की थी।

‘जय माता दी करते जाना और ऊंची चोटियां चढ़ते जाना’ आखिरी बार जब कैप्टन विक्रम बतरा का फोन आया तो मां ने उसको यही कहा था। और कैप्टन विक्रम ने मां के उन शब्दों को रणभूमि में साकार रूप दिया। उसने अपने साहस व शौर्य के बूते सिर्फ चोटियां ही नहीं चढ़ीं, ऊंचाइयां छूने वालों के लिए एक मिसाल भी कायम की।

भारत मां के शहीद वीर सपूतों की फेहरिस्त में अपना नाम जोड़ गए कैप्टन विक्रम की मां कमल बतरा कहती हैं, ‘लगता है कि वो देश की खातिर ही आया था। जवान बेटे की कमी तो महसूस होती ही है पर वो जाते-जाते मुझे भारत मां की बहन बना गया।’

कैप्टन विक्रम की मां कमल बतरा (फाइल फोटो)

करगिल की दुर्गम बर्फीली पहाड़ियों पर भारतीय सेना के पाकिस्तानी सेना व घुसपैठियों के साथ हुए युद्ध का इतिहास जब भी लिखा जाएगा विक्रम बतरा का जिक्र किए बिना न होगा। हिमाचल प्रदेश के पालमपुर का 24 वर्षीय विक्रम कारनामा ही ऐसा कर गया। वो शेर शाह था और शेरशाह ही साबित हुआ। सेना में उसका कोड नाम शेरशाह था।

कैप्टन विक्रम अपनी कंपनी के साथ जब मश्कोह घाटी की 5140 चोटी पर चढ़ रहा तो दुश्मन ने उसे ललकारा। कैप्टन ने वायरलेस सेट पर सुना, आगे बढ़ने की हिम्मत न करना, वरना तुम्हारे फौजियों की लाश उठाने वाला भी हिम्मत नहीं जुटा पाएगा। कैप्टन ने पूरी दृढ़ता से जवाब दिया, हमारी छोड़ो अपनी खैर मनाओ। बस फिर क्या था एक तरफ से कैप्टन विक्रम ने अपनी कंपनी के साथ दुश्मन पर जबरदस्त हमला बोल दिया तो दूसरी तरफ से उसी के साथी कैप्टन संजीव जंबवाल की कंपनी ने धावा बोल दिया। उन्होंने दो पाकिस्तानी सैनिकों व छह घुसपैठियों को ढेर कर दिया तथा बाकी को अपनी जान बचाकर भागना पड़ गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह कारनामा करगिल की टाइगर हिल पर अपना कब्जा वापस लेने का रास्ता खोल गया।

वह चोटी जीतने के बाद कैप्टन बतरा ने अपने बेस पर वायरलेस से संदेश भेजा, ‘ये दिल मांगे मोर’। कैप्टन बतरा की इस उपलब्धि पर उन्हें सेना ने सम्मान भी दिया। विक्रम को रणभूमि में ही तरक्की देकर कैप्टन बनाया गया और उनको महावीर चक्र से सम्मानित करने की सिफारिश की गई थी। सेनाध्यक्ष वेद प्रकाश मलिक ने उसे खुद फोन करके मुबारकबाद दी। उत्साही वीर सैनिक अधिकारी और भी न जाने क्या कमाल दिखाता पर समय ने इससे पहले ही उसे छीन लिया। सात जुलाई की रात दुश्मन जबरदस्त गोलीबारी कर रहा था कैप्टन विक्रम कुछ साथियों के साथ अपने बंकर में था। खाने का वक्त हो रहा था लेकिन एक जवान बंकर से बाहर था। कैप्टन बतरा उसे बुलाने के लिए खुद बाहर गए और जब लौट रहे थे तो दुश्मन की गोली ने उन्हें अपना निशाना बना लिया। वह गोली कैप्टन के दिल में लगी।

9 सितंबर 1974 को जन्मा विक्रम बतरा जुड़वा भाइयों में बड़ा था। पालमपुर के डीएवी स्कूल एवं केन्द्रीय विद्यालय से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद विक्रम ने चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से विज्ञान में स्नातक की डिग्री ली। जून 1997 में उसने थल सेना अधिकारी के रूप में कमीशन प्राप्त किया। प्रारंभ में वह सोपोर में बतौर लेफ्टिनेंट तैनात थे।

इससे पहले विक्रम मर्चेंट नेवी में चुन लिया गया था। उसे आस्ट्रेलिया की एक कंपनी के लिए काम करना था और विदेश में रहना था। इस बारे में उसने तैयारी भी कर ली थी पर अचानक उसने विचार बदल लिया। शायद इसलिए कि उसे देश के लिए कुछ करना था।

कराटे में ब्लैक बेल्ट और टेनिस में चैंपियन रहे विक्रम को फौज में जाने की प्रेरणा अपने बड़े बुजुर्गों से मिली। हालांकि उसके पिता गिरधारी लाल बतरा पेशे से अध्यापक हैं और परौरा स्थित सीनियर सेकेंडरी स्कूल में प्रिंसिपल हैं (यह उस वक्त की बात है)।

विक्रम के फूफा योगध्यान बतरा सेना में कर्नल थे। लेकिन बुजुर्ग जो न कर पाए वो कैप्टन बतरा 24 साल की छोटी सी उम्र में कर गया। वो देश के लिए शहीद हो गया। एहसानमंद देश ने उसकी बहादुरी के लिए उसे परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

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