Kargil Diary

#Kargildiary : कंधे से कंधे तक… भाई के साथ एक सफ़र

सिपाही दिनेश कुमार





जब दोनों जवान बेटे छुट्टियां बिताने एक साथ घर आते थे तो उस घर का कोना कोना चहक और महक उठता था। इस बार भी दोनों साथ-साथ आए थे मगर अबकी चहक-महक की जगह सिसकियों के सैलाब ने ले ली थी।

वो घर है रिटायर कैप्टन भूप सिंह का। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिला स्थित अंदराल गांव के लोगों को आसानी से यकीन नहीं हो रहा था। भला होता भी कैसे, कुछ ही दिन पहले की तो बात है। भूप सिंह के घर में ढोलक की थाप और स्वरलहरियां गूंज रही थीं। उस खुशनुमा माहौल का स्थान 20 जून की उस सुबह मातम ने ले लिया था।

  • छह और फौजी साथियों के साथ वो दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र की उस चोर बाटला नाम की चौकी पर तैनात था जिस तक पहुंचने के लिए बटालिक सेक्टर से छह दिन लगते थे

हालांकि उस दिन भूप सिंह के दोनों फौजी बेटे राकेश और दिनेश साथ-साथ थे पर वो अब वैसे नहीं थे। बचपन में जिस छुटके दिनेश को राकेश कंधे पर बिठा फुर्ती से भागता झुलाता था, उस दिन भी वही दिनेश उसके कंधे पर था, लेकिन गहरी नींद में, तिरंगे में लिपटा।

करगिल डायरी

शहीद सिपाही दिनेश कुमार के पिता कैप्टन भूप सिंह

बीस साल के दिेनेश को फौज में भर्ती हुए अभी दो साल भी तो नहीं हुए थे। वो 3 पंजाब रेजीमेंट में सिपाही था। छह और फौजी साथियों के साथ वो दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र की उस चोर बाटला नाम की चौकी पर तैनात था जिस तक पहुंचने के लिए बटालिक सेक्टर से छह दिन लगते थे। नियंत्रण रेखा के एकदम करीब वाली वह चौकी सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण थी। पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों की गिद्ध नजर उस चौकी पर थी। सबसे ऊंची चौकी पर उन्होंने 16 जून को जबरदस्त हमला किया। हमारे सैनिकों ने पाकिस्तानी हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया पर इसी दौरान पाकिस्तानियों ने गोले दागने शुरू कर दिए। ऐसे ही गोले के विस्फोट ने तीन सैनिकों को लहूलुहान कर डाला। तीनों वहीं शहीद हो गए। दिनेश भी उन्हीं में से एक था। इत्तफाक से भूपसिंह के बड़े बेटे राकेश की तैनाती भी तब करगिल में थी। भाई की शहादत की सूचना मिलने पर वही दिनेश का शव घर लाया था।

राकेश-दिनेश की मां विद्यादेवी की दशा उस दिन तो क्या रही होगी पर महीने भर बाद जब मैं उनके घर गया तो भी वह सदमे से उबर नहीं पार्इं थीं। कैप्टन भूपसिंह ने हमें उनके सामने तक जाने से मना कर दिया था। बाहर से आए किसी भी व्यक्ति को देख वो बिलखने लगती थीं।

  • वो बताते हैं हमारे परिवार में परंपरा है फौज में भर्ती होने की। राकेश इसी परंपरा का निर्वाह करते भर्ती हो गया था।

पत्नी की हालत बयां करते कैप्टन भूपसिंह अचानक कहीं खो जाते हैं। शायद उन्हें बीते दिन याद आते हैं। वो बताते हैं हमारे परिवार में परंपरा है फौज में भर्ती होने की। राकेश इसी परंपरा का निर्वाह करते भर्ती हो गया था। पर हम दिनेश को भर्ती करना नहीं चाहते थे। राकेश हमीरपुर में इंदिरा गांधी स्मारक डिग्री कॉलेज में पढ़ रहा था। वो द्वितीय वर्ष में था कि एक दिन फौज के दफ्तर चला गया। भर्ती के दौरान वो चुन लिया गया।

दिनेश अपनी नौकरी से संतुष्ट था। वह बटालिक सेक्टर में तैनात था और 10 जनवरी को सालाना छुट्टी पर तब घर आया था जब राकेश की शादी थी।

स्वयं तीन युद्धों में हिस्सा ले चुके कैप्टन भूप सिंह जवान बेटे की शहादत के गम से उबर तो चुके हैं पर बात करते करते अचानक उनका गला भर आता है जब युद्ध होता है तो किसी न किसी को मरना होता ही है।

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