Kargil Diary

#Kargildiary : लांस नायक कुलदीप : शहादत के बाद आई उसकी चिट्ठी

शहीद लांस नायक कुलदीप सिंह





  • नाम: कुलदीप
  • उम्र:28 वर्ष
  • पता: गांव कंग, जिला अमृतसर
  • हौसला: बुलंद

यह एक परिचय है बूढ़े स्वर्णसिंह के उस कुल दीपक का जो मातृभूमि के लिए शहीद हो गया। चार भाइयों में से कुलदीप सबसे छोटा था और पूरे कुनबे में इसलिए सबका प्यारा भी था। उसके चले जाने का शोक सबको है, कुनबे को ही नहीं सारे गांव को, बल्कि आसपास के गांव वालों को भी। पर साथ ही उन सभी को नाज भी है। नाज इसलिए, क्योंकि पंजाब के उस रणबांकुरे ने मौत को खुद गले लगाया था और गोली सीने पर खाई थी।

कुलदीप के बारे में बात शुरू होते ही 70 वर्षीय उस किसान स्वर्ण सिंह की आंखों में एकदम नमी आ गई जिसके दो सगे भाई फौज में रह चुके हैं। पर यह नमी थोड़ी ही देर की मेहमान थी। क्षण भर बाद ही उसका स्थान गर्व ने ले लिया। आंखों में चमक लौट आई और स्वर्ण सिंह ने अपने पुत्र की शहादत की कहानी सुनानी शुरू कर दी। भतीजे की शहादत पर फख्र करने वाले कुलदीप के दोनों चाचा जागीर सिंह व बलकार सिंह भी वहीं किस्सा सुनाने को बेहद उत्सुक थे। वे दोनों भी फौज में रह चुके हैं।

वह 27 जून की सुबह थी। 19 राष्ट्रीय राइफल्स की एक सेक्शन फोर्स करगिल में एक पहाड़ी पर चढ़ रही थी। कड़ाके की ठंड थी और दूर-दूर तक बर्फ ही बर्फ। आवाज के नाम पर दूर से गोलियां व तोपें चलने की गर्जना के अलावा कुछ न था। हां, एक आवाज और सुनाई पड़ रही थी और वो थी फौजियों की पदचाप।

लांसनायक कुलदीप सिंह

शहीद कुलदीप सिंह के माता पिता

9 सिख लाइट इनफेंटरी का लांस नायक कुलदीप भी उन्हीं फौजियों में शामिल था। यह फौजी टुकड़ी अभी पहाड़ पर चढ़ ही रही थी कि न जाने कहाँ से एक गोली आई और कुलदीप के आगे चल रहे जवान को घायल करती निकल गई। कुलदीप ने अपने उस साथी को हौसला दिलाया और उसे पीछे हटाकर खुद उस जवान की जगह ले ली। टुकड़ी फिर आगे बढ़ी। इस बार गोली कुलदीप को लगी। चोट कुलदीप के हाथ पर लगी थी पर जख्म और दर्द की परवाह न कर कुलदीप ने कदम बढ़ाते रहने की ठान ली। पर अभी वह थोड़ा ही आगे बढ़ा था कि लगातार कई गोलियां आर्इं और उसके सीने में जा धंसी। लहूलुहान कुलदीप ने वहीं प्राण त्याग दिए।

  • परंतु मां कितने ही हौसले वाली क्यों न हो, मां तो मां ही है। कुलदीप की मां गुरबचन कौर का इसीलिए बुरा हाल है। उसकी आंखों में आंसू अभी तक नहीं थमे हैं।

उसी दिन दोपहर को थाना सदर तरनतारण से मोटरसाइकिल सवार दो पुलिसकर्मी आए। अनुभवी स्वर्णसिंह तभी समझ गए थे कि सूचना अहितकर ही आई होगी। उन्होंने पहले तो परिवार के बारे में सामान्य सी बातें कीं और आखिर में बोले ‘आपका बेटा शहीद हो गया है।’ दो दिन बाद नायक सुखविंदर सिंह कुलदीप का शव लाया जो तिरंगे में लिपटा हुआ था। शव आने के कुछ दिन बाद ही एक और चीज उस घर में आई। वह थी एक चिट्ठी जो कुलदीप ने मृत्यु से मात्र एक ही दिन पहले लिखी थी। लिखा था ‘मैं ठीक हूं चिंता मत करो।’

  • स्वर्ण सिंह का यह परिवार भले ही मिट्टी के कच्चे मकान में रहता है पर परिवार वालों का जिगरा फौलादी चट्टान सा है

मजहबी सिख कुलदीप का चचेरा भाई मेजर सिंह पहले फौज में था। अब वह पंजाब पुलिस में हवलदार है। वह कहता है, “जितना हौसला किसी फौजी में होता है उतना किसी में नहीं।“ परंतु मां कितने ही हौसले वाली क्यों न हो, मां तो मां ही है। कुलदीप की मां गुरबचन कौर का इसीलिए बुरा हाल है। उसकी आंखों में आंसू अभी तक नहीं थमे हैं। मेजर सिंह उसे दिलासा देता है, ‘ज्यादा मत रो, आंखें खराब हो गर्इं हैं चल डाक्टर से दवा लाया हूं दवा डलवा ले।’ स्वर्ण सिंह का यह परिवार भले ही मिट्टी के कच्चे मकान में रहता है पर परिवार वालों का जिगरा फौलादी चट्टान सा है। एक सुर में वहां के मर्द कहते हैं, ‘हम अपने निशान को भी फौज में भर्ती करवाएंगे।’ निशान सिंह कोई और नहीं इस परिवार का सबसे छोटा सदस्य है। कुलदीप का तीन वर्षीय इकलौता पुत्र।

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