Kargil Diary

#Kargildiary: चट्टान से टकरा गोली सीना भेद गई

मलूक-चंद





चंडीगढ़-नंगल राजमार्ग पर आनंदपुर साहिब गुरुद्वारा से चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर बायीं तरफ है गांव लोअर दड़ौली। गांव तक पहुंचने के लिए मुख्य सड़क से डेढ़ किलोमीटर का फासला तय करना पड़ता है पर समस्या एक यह भी है कि वहां दड़ौली नाम का ही एक और गांव है। उसे अपर दड़ौली कहा जाता है। नाम तो एक जैसे हैं पर दोनों एक एकदम विपरीत दिशा में है। बहुत से लोगों के लिए परेशानी खड़ी होती है जब उन्हें यह समझ नहीं आ पाता कि उन्हें जो पत्र मिला है वो कौन से दड़ौली गांव का है।

  • परंतु इस संवाददाता की यह समस्या क्षण भर में दूर हो गई। एक साहब आए और बोले, महाराज यूं कहो न कि मलूक चंद दे पिंड (गांव) जाना है।’ इतना कहकर वो एक लड़के की तरफ मुखातिब हुए, ‘ओए काका इनको मलूक दे घर छोड़ आ।’

मलूक चंद अब नहीं रहा लेकिन उसे अब अपने आसपास के गांव में रहने वाले भी जानते हैं। मलूक चंद (32 वर्ष) 16 डोगरा रेजिमेंट में लांस नायक था। उसकी यूनिट भी राजौरी सेक्टर में ‘ऑपरेशन रक्षक’ के तहत काम कर रही थी। 10 मई को मलूक चंद और करीब बीस अन्य जवान राजौरी सेक्टर में गश्त कर रहे थे। सूचना थी कि वहां घुसपैठिए हो सकते हैं। गश्त के दौरान जवानों के छोटे-छोटे ग्रुप बनाए जाते हैं। मलूक चंद ऐसे ग्रुप से कुछ हटकर चल रहा था तभी उसकी नजर छिपे हुए घुसपैठियों पर पड़ी। मलूक चंद ने निशाना साधा और बंदूक चला दी। दो घुसपैठिए वहीं धराशायी हो गए। अब उस दिशा में हलचल भी बंद हो चुकी थी। मलूक चंद को लगा कि कोई घुसपैठिया नहीं बचा परंतु उसका अंदाज गलत था कुछ ही पल बाद उस दिशा से गोलियां आनी शुरू हो गईं। मलूक ने भी जवाबी फायरिंग की पर दुश्मन की एक गोली चट्टान से टकराकर उसकी ओर आई तथा उसका सीना भेद गई।

मलूक चंद की वीरता का कारनामा सुनाते हुए लोअर दड़ौली के पूर्व सरपंच कहते हैं, ‘उसमें इतना हौसला था कि उसने एक कदम पीछे नहीं हटाया और अकेला ही दुश्मन से मुकाबला करता रहा।’

मलूक-चंद-का-परिवार

मलूक चंद के शहीद होने के बाद उनकी पत्नी का पूरा ध्यान अब तीनों बच्चों की अच्छी परवरिश पर है

जैसा मलूक चंद वैसी ही उसकी पत्नी डॉली देवी है। जीवन की वास्तविकताओं को समझकर उसने तमाम हालात में मजबूत बने रहने की ठान ली है। उसका पूरा ध्यान अब तीन बच्चों की अच्छी परवरिश पर है। खुद तो वो ज्यादा पढ़-लिख नहीं पाई पर कहती है कि बच्चों को खूब पढ़ाऊंगी। उन बच्चों में दो लड़के हैं विनोद (10 वर्ष) और प्रमोद कुमार (7वर्ष)। दोनों के सिर पर हाथ फेरते हुए डॉली देवी कहती, ‘ये फौज में अपने पिता की कमी पूरी करेंगे।’

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