Kargil Diary

#Kargildiary : स्टेयरिंग नहीं उसे तो बन्दूक चाहिए थी

संतोख सिंह





20 जम्मू कश्मीर राइफल्स का संतोख सिंह यूं तो सिपाही चालक था पर असल में उसके भीतर दुश्मन पर बरसने वाला सैनिक छटपटाता रहता था। संतोख की वही छटपटाहट उसे शहादत के मुहाने तक ले गई।

संतोख सिंह का काम सैनिकों व अधिकारियों को लाना-ले जाना था। पर संतोख सिंह उन सैनिकों की कार्यशैली पर काफी नजर रखता था। वो कैसे-कैसे कार्रवाई करते हैं, उसे जानने की संतोख को काफी दिलचस्पी रहती। 12 जुलाई की रात भी कुछ ऐसा ही हुआ द्रास सेक्टर के केरी क्षेत्र में गश्त के लिए कुछ सैनिकों को भेजा गया था। सैनिक दो वाहनों में सवार थे। एक वाहन संतोख चला रहा था। एक जगह दुर्गम पहाड़ी के किनारे दोनों वाहन रुक गए। वाहन से सैनिकों को कार्रवाई के लिए पैदल जाना था। संतोख सिंह को भी जिज्ञासा हुई सैनिक टुकड़ी की कार्रवाई देखने की, सो वो बिना किसी को बताए चुपचाप कुछ दूर तक उनके पीछे चलता रहा। उस वक्त वाहन दुश्मन की ओर से जबरदस्त फायरिंग हो रही थी। ऐसी ही कोई गोली संतोख को लगी घायल संतोख वहीं गिर गया।

  • बारहवीं के इम्तहान देते ही मात्र 18 वर्ष की उम्र में ही वह फौज में भर्ती हो गया। फौजी बनने का शौक तो उसे बचपन से ही था। इसके आगे उसने मां की एक न सुनी।

कुछ देर बाद जब सैनिक लौटे, तो संतोख को वाहन में मौजूद न देख हैरानी हुई। कुछ सैनिक उसे खोजने गए। तभी उनकी नजर संतोख पर पड़ी। वह बर्फीली पहाड़ी पर बेहोश पड़ा हुआ था। संतोख को अस्पताल ले जाया गया। वहाँ उसने एक उल्टी की और प्राण त्याग दिए।

शहीद ड्राइवर सिपाही संतोख सिंह

शहीद ड्राइवर सिपाही संतोख सिंह का परिवार

गरीब किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाला संतोख सिंह फौज में जाने वाला अपने परिवार का पहला सदस्य था।बारहवीं के इम्तहान देते ही मात्र 18 वर्ष की उम्र में ही वह फौज में भर्ती हो गया। फौजी बनने का शौक तो उसे बचपन से ही था। इसके आगे उसने मां की एक न सुनी। मां रत्नो देवी कहती हैं, ‘मैंने उसे मना किया था कि फौज की नौकरी न कर, पर उसने मेरी सुनी नहीं।’ इसी के साथ बिलखती वह वृद्धा कहती है, ‘मैं अपने पोतों को तो फौज में नहीं भेजूंगी।’ मां की यह बात बड़े तीन भाइयों को नागवार गुजरती है। वो कहता है, ‘फौज में क्यों नहीं भेजेगी, फौज में नहीं जाएंगे तो करेंगे क्या।’ मां बेटे में इसी को लेकर बहस हो जाती है।

हिमाचल प्रदेश के नूरपुर क्षेत्र स्थित थोड़ा बलून, टीका जटोली नामक गाँव के इस सिख जाट परिवार के पास असल में न तो इतनी भूमि है कि उस पर खेती करके गुजारा हो सके और न ही आमदनी का कोई और साधन। संतोख के तीन भाइयों में दो तो सरकारी नौकरी करते हैं और तीसरा खेती-बाड़ी करता है।

  • उसने सोचा था कि जब घर से खुशखबरी आएगी, तभी दो महीने की सालाना छुट्टी लेकर आऊंगा। यह खुशखबरी थी उसकी होने वाली संतान की।

रत्नो देवी तो अपने मन की बात कहकर बोझ हल्का कर लेती है पर नरेंद्र कौर की दशा तो अजीब है। उससे तो कुछ कहते भी नहीं बन पा रहा था। नरेंद्र कौर पत्नी है संतोख की। दोनों के विवाह को 18 माह हुए हैं। कई महीने हो गए संतोख छुट्टी लेकर नहीं आया था। उसने सोचा था कि जब घर से खुशखबरी आएगी, तभी दो महीने की सालाना छुट्टी लेकर आऊंगा। यह खुशखबरी थी उसकी होने वाली संतान की।

शहीद ड्राइवर सिपाही संतोख सिंह

शहीद ड्राइवर सिपाही संतोख सिंह का खेत

संतोख तक अब यह खुशखबरी अब कभी नहीं पहुंच पाएगी। जिस वक्त मैं नरेंद्र कौर से मिला वह कष्ट में थी। उसका प्रसव काल बेहद निकट था। पर कमाल का हौसला था उसमें। अपने भविष्य के बारे में उसने कुछ बातें तय कर ली हैं।कहती है, ‘मैं दसवीं तक तो पढ़ी हूँ पांचवीं तक के बच्चों को तो स्कूल में पढ़ा लूंगी।’ इतना ही नहीं उसकी एक इच्छा भी है, ‘अगर मेरा बेटा हुआ, तो उसे फौजी बनाऊंगी।’ शहीद परिवारों को मिल रही सहायता से परिवार संतुष्ट है। उन्हें तसल्ली इस बात से भी है कि सरकार शहीदों की याद जिन्दा रखना चाहती है। उनके गाँव के बाहर शहीद संतोख की याद में विद्यालय बनाने तथा वहाँ डिस्पेंसरी खोलने की घोषणा शासन ने की है।

Comments

Most Popular

To Top