Kargil Diary

#Kargildiary : शहादत के वक्त तिरंगा उसके हाथ में था

करगिल संघर्ष





निशानी के तौर पर क्या कोई किसी को राष्ट्र ध्वज भी दे सकता है? ऐसा भी हुआ है। करगिल का घमासान ऐसी न जाने कितनी ही कहानियां अपने पीछे छोड़कर जाएगा। तब बस यही विचार जेहन में आए थे जब मंजीत कौर संदूक से निकालकर वह तिरंगा लाई जिस तिरंगे को हजारों फुट ऊंची करगिल क्षेत्र की किसी चोटी पर फहरता होना चाहिए था।

  • वह तिरंगा बड़े ही करीने से ठीक वैसे ही संभाल कर रखा गया लगता था जैसे कोई भी दुल्हन बरसों तक अपने सुहाग का जोड़ा संभालकर रखती है
करगिल संघर्ष

शहादत के वक्त यही झंडा था नायक बलदेव सिंह के हाथ में

सूती कपड़े का वह तिरंगा बड़े ही करीने से ठीक वैसे ही संभाल कर रखा गया लगता था जैसे कोई भी दुल्हन बरसों तक अपने सुहाग का जोड़ा संभालकर रखती है। मंजीत की भाभी गुरदीप कौर के लिए इस तिरंगे का महत्व शायद इससे भी कहीं ज्यादा था। यह तिरंगा उसके पति की आखिरी निशानी थी। गुरदीप को यह निशानी पति की शहादत के बाद उन फौजियों ने सौंपी जो उसके पति के साथ मैदान-ए-जंग में थे। गुरदीप का पति और मंजीत कौर का भाई 8 सिख रेजीमेंट का नायक बलदेव सिंह जब शहीद हुआ तब उसके हाथ में वही झंडा था।

बलदेव सिंह (30 वर्ष) पंजाब के कपूरथला जिले के शालापुर दोना निवासी जोगिन्दर सिंह की पांच संतानों में सबसे बड़ा था।

Comments

Most Popular

To Top