Kargil Diary

#Kargildiary: ऐसे बदल गया राइफलमैन सुनील का सफर

राइफलमैन-सुनील-कुमार

हर भाई की तरह नायक कंवरदेव को भी अपनी बहन के घर जाने में बेहद खुशी हुआ करती थी। उस दिन बहन के गांव तक जाने के लिए उसके पांव नहीं उठ रहे थे। जाना जरूरी था लेकिन इस बार बहन को अर्पण करने के वास्ते उसके पास कोई सौगात नहीं थी। बस उसके साथ आया था भांजा सुनील। शहीद होकर, तिरंगा ओढ़कर।





फौजी होकर भी कंवरदेव तब अपनी आंखों के पानी पर काबू ना पा सका। उस दिन कंवरदेव ने बहन, भांजियों व अन्य परिजनों को ही नहीं उस जीजा (सुनील के पिता) को भी बिलखते देखा जो अब तक कई युद्धों का गवाह रह चुका है।

परिजनों की चीत्कार और आंसुओं के सैलाब से भरे उस महौल में बस तसल्ली देने को वही दो वाक्य थे- ‘आपका भांजा बहुत बहादुर था।’ यह वाक्य राइफलमैन सुनील के कंपनी कमांडर मेजर ने सुनील का शव सौंपते हुए कंवरदेव से कहे थे। नायक कंवरदेव भी करगिल की उस रणभूमि में तैनात थे जहां उनके भांजे ने वीरगति प्राप्त की। हिमाचल प्रदेश के सुजानपुर स्थित गांव तननैनकड़ के सीताराम का पुत्र सुनील 28 राष्ट्रीय राइफल्स में था।

  • उसकी यूनिट को युद्ध क्षेत्र से हटाकर अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा में तैनात होने का हुक्म मिला था। पर सुनील और उसके साथियों के भाग्य में दूसरा ही सफर लिखा था।

18 जुलाई की रात करगिल की उस पहाड़ी पर दुश्मनों का सफाया होने पर सुबह सुनील अपने साथी जवानों के साथ नीचे उतरा था। वहां कुछ घंटे आराम करने के बाद उसे सफर की तैयारी करने थी। उसकी यूनिट को युद्ध क्षेत्र से हटाकर अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा में तैनात होने का हुक्म मिला था। पर सुनील और उसके साथियों के भाग्य में दूसरा ही सफर लिखा था। अचानक दुश्मन ने जबरदस्त गोलीबारी कर डाली। ऐसा ही एक गोला उन सैनिकों पर आकर गिरा। सुनील और उनके साथी ने वहीं पर प्राण त्याग दिए तथा दो सैनिक घायल हो गए। मार्च में 20 दिनों की छुट्टी बिताकर सुनील जब गांव गया था तो आकर बहुत से काम करने का उसने वादा किया था। अपनी छोटी बहन नीलम को डोली में विदा करने की भी उसकी हसरत थी। नीलम का विवाह 22 अक्टूबर को होना था। रणभूमि से भेजे पत्रों में सुनील ने लिखा था, तब तक शायद लड़ाई खत्म हो जाएगी। मैं लम्बी छुट्टी लेकर नीलम के विवाह पर आऊंगा।

बीस वर्ष की उम्र में सेना में भर्ती हुआ सुनील बड़े भाई मेहरचंद की तरह खेती करना नहीं चाहता था। पिता ही केवल नहीं फौज में जाने के लिए उसके और भी बड़े बुजुर्ग प्रेरणास्त्रोत थे। सुनील के पिता सीताराम बताते हैं कि उन्होंने 1965 और 1971 के युद्ध में हिस्सा लिया। 71 के युद्ध में उनके 36 साथी जवान शहीद हुए थे। सुनील के चाचा बलदेव सिंह 14 डोगरा रेजिमेंट में सूबेदार हैं। उनका लड़का सिपाही प्रवीन कुमार कलकत्ता में तैनात है। सुनील के बड़े जीजा कृष्ण कुमार भी फौज में हैं। यही नहीं कंवरदेव के अलावा के अलावा उसके तीनों मामा भी फौज में ही हैं।

ऐसे फौजी परिवार में बड़े लाड-प्यार से पला सुनील आज्ञाकारी पुत्र ही नहीं जिम्मेदार भाई भी था। मां को सुनील की शादी का बहुत ही चाव था। इस बारे में जब बात की तो मां को उसने कहा था, ‘पहलों दोनों बहनों को विदा कर दूं फिर अपना ब्याह रचाऊंगा।’

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