Kargil Diary

#Kargildiary: पुर्जा-पुर्जा कट मरे

सूबेदार-निर्मल-सिंह

हजारों फुट की उंचाई, दुर्गम बर्फीली पहाड़ियां और घना अंधेरा। इतना ही नहीं, उस पर दुश्मन की मजबूत स्थिति जो ऊंचाई पर होने का पूरा फायदा उठा रहा था ऐसी परिस्थितियों के बावजूद भारतीय फौजियों की उस टुकड़ी का आत्मविश्वास नहीं डगमगाया। दुश्मन की हर गोली का जवाब देने के साथ ही टुकड़ी का इरादा लगातार आगे बढ़ने का भी था। पूरी रात उस टुकड़ी के सैनिक लड़ते रहे। उनमें से 18 शहीद हो गए और छह घायल हो गए। पहाड़ी की बर्फ शहीदों के खून से लाल हो गई। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन फौजियों ने दुश्मन के आठ सैनिकों को मार गिराया।





वीरता की एक मिसाल बनी उस टुकड़ी का नेतृत्व थे सूबेदार निर्मल सिंह। 40 वर्ष की ढलती उम्र में भी यह जौहर दिखाया था। उस सूबेदार ने जो गुरु गोविंद सिंह का सच्चा सिपाही था। उस सूबेदार को याद था गुरु की वो वाणी ‘पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कबहुं न छोड़े खेत’ और सूबेदार ने रण क्षेत्र नहीं छोड़ा। उसने सीने पर गोलियां खाई। दुश्मन ने यदि तीन तरफ से न घेर लिया होता तो यह सूबदार कुछ और ही कर डालता।

बहादुरी देश प्रेम और फौजी जीवन सूबेदार निर्मल सिंह के परिवार की धरोहर है। यह परिवार गुरदासपुर जिले की पुराना शाला तहशील स्थित छिना बेत गाँव का रहने वाला है।

निर्मल के चाचा मंसा सिंह फौज में सूबेदार थे। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा गठित ‘आजाद हिन्द फौज’ में भी वो रहे। देश की आजादी के लिए उस समय हुए युद्ध में उन्हें बंधक बना लिया गया था। वे सात साल जापानियों की कैद में रहे। 65 वर्ष की आयु होने पर 1992 में उनका स्वर्गवास हो गया।

उन्हीं सूबेदार मंसा सिंह के चार पुत्रों में से दो सूबेदारों ने फौजी जीवन चुना। उनमें से एक हवालदार किशन सिंह सेवानिवृत हैं और दूसरा पुत्र सूबेदार महिंदर सिंह बीकानेर में तैनात है, लेकिन थोड़ी अजीब बात है कि परिवार की ऐसी पृष्ठभूमि और स्वयं आधी जिन्दगी सेना में गुजार चुके निर्मल सिंह के दो पुत्र हैं हरजीत सिंह(12) और मलकीत सिंह (9) वर्ष।

सूबेदार-निर्मल-सिंह

सूबेदार निर्मल सिंह का गमज़दा परिवार

निर्मल सिंह की पत्नी मंजीत कौर बताती हैं कि उन्हें दोनों पुत्र जान से प्यारे थे। फौजी जीवन की वजह से अलग-अलग जगह तैनाती से निर्मल सिंह को परिवार से दूर रहना पड़ता था। वह नहीं चाहते थे कि बुढ़ापे में जवान बेटे उनसे दूर हो जाएं। दरअसल, परिवार से दूर रहने की तकलीफ निर्मल सिंह की एक कमजोरी थी। मंजीत कौर कहती हैं ‘वो नहीं चाहते थे कि बच्चों को भी वैसे ही हालत में जिन्दगी गुजारनी पड़े और अब तो दोनों बच्चों के सहारे ही मुझे जिन्दगी काटनी है।’

चाची की बात अभी पूरी हुई ही थी कि निर्मल सिंह का भतीजा दलजीत सिंह कहता है कि मुझे तो फौज में ही जाना है। 20 वर्षीय दलजीत 12वीं पास कर चुका है। उसकी सैनिक बनने की बहुत इच्छा है। वो दो बार प्रयास भी कर चुका है पर भर्ती नहीं हो पाया। बड़ा मायूस होकर कहता है ‘रामगढ़ में दो बार भर्ती होने गया था पर नहीं चुना गया, डॉक्टर ने कहा कि तेरे दिल की धड़कन तेज है।’ दिलजीत सिंह कहता है चाचा थोड़ी बहुत सिफारिश करते तो मेरा काम बन जाता, पर चाचा ने साफ-साफ कह दिया ‘खुद को काबिल बनाओ सिफारिश करना मेरा उसूल नहीं है।’

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