Kargil Diary

#Kargildiary: पैराशूट से कूदा और शहीद हो गया

पैराट्रूपर-गोपाल-सिंह

महज 13 साल के जगतार सिंह ने अपने भाई की मौत का बदला लेने की ठान ली है। वो कहता है, ‘मैं उन पाकिस्तानियों को छोड़ूंगा नहीं।’ जगतार के भाई पैराट्रूपर गोपाल सिंह की मौत ऑपरेशन विजय के दौरान तब हुई जब वो पैराशूट से कूदा। गोपाल की शहादत के बारे में उसका परिवार इससे ज्यादा कुछ नहीं जानता।





  • मुझे पता था कि फौज में भर्ती होने का नतीजा क्या हो सकता है लेकिन जो होना है सो होता ही है। मुझे नाज़ है अपने पुत्र पर

गोपाल का परिवार चंडीगढ़- नंगल राजमार्ग के बायीं ओर स्थित ढेर नामक गांव में रहता है। गोपाल के पिता प्रकाशचंद अनपढ़ खेतिहर मजदूर हैं। लेकिन हैं एक समझदार इंसान। वो कहते हैं, ‘मैंने अपने बेटे को फ़ौज में खुद ही भर्ती कराया था, थोड़ा बहुत पढ़ लिख गया था तो हमने सोचा वो क्यों मजदूरी करे। मुझे पता था कि फौज में भर्ती होने का नतीजा क्या हो सकता है लेकिन जो होना है सो होता ही है। मुझे नाज़ है अपने पुत्र पर।’

गोपाल-के-परिजन

गोपाल सिंह की मौत की खबर के बाद रोता-बिलखता परिवार

प्रकाशचंद कहते हैं, ’13 जुलाई की शाम को तहसीलदार हमारे घर आया और बोला कि तुम्हारे बच्चे के बारे में बहुत खराब सूचना आई है। मैं फौरन समझ गया था उसके आने का मतलब।’ अगले दिन सुबह गोपाल शहीद बनकर घर लौटा।

परिवार वालों ने इससे पहले उसे आखिरी बार जनवरी माह में देखा था। प्रकाशचंद के परिवार की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गांव के एक छोर पर बने उनके कच्चे पक्के मकान के बाहर दरवाजा तो क्या चारदीवारी तक नहीं है। घर की आमदनी के जरिए के नाम पर प्रकाशचंद को मिलने वाली दिहाड़ी है और बाकी खर्च चलता था गोपाल के वेतन से। जगतार के अलावा प्रकाश का एक और लड़का है। 18 वर्षीय भवन सिंह। भवन की एक टांग पोलियो की शिकार हो चुकी है।

शहीद-के -पिता-प्रकाशचंद

शहीद गोपाल सिंह के पिता और छोटे भाई-बहन

भवन सिंह से छोटी उनकी बेटी है 16 वर्षीय परमजीत। परमजीत 9वीं कक्षा तक पढ़ चुकी है लेकिन अब शायद ना पढ़ पाएगी। इस बारे में प्रकाशचंद कहते हैं, ‘एक तो घर का कामकाज करना होता है और दूसरा हम उसकी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते- इसलिए उसका स्कूल जाना बंद करवा दिया है।

लेकिन छोटे बेटे जगतार सिंह को लेकर उन्हें आशाएं हैं। या यूं कहें कि उन्हें जो भी आशाएं हैं वो जगतार से ही हैं। प्रकाशचंद कहता है, जगतार को तो मैं जरूर पढ़ाऊंगा और उसे फौज में भी भेजूंगा।

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