Kargil Diary

#Kargildiary : वो चार गोलियां एक-एक कर चिता की राख से निकलीं

करगिल संघर्ष





गांव के बाहर कोने पर श्मशान में एक ठंडी चिता के इर्द-गिर्द बैठे लोग। उनमें से कुछ बार-बार चिता की राख से अस्थियां चुनकर इकट्ठा कर रहे हैं। अचानक सबकी आंखें छलछला आईं। इसकी वजह थी वो चार गोलियां जो एक-एक करके राख में से निकलीं। इन्हीं पाकिस्तानी गोलियों ने नायक निर्मल सिंह का सीना छलनी किया था।

वो गोलियां लुधियाना जिले की तहसील राजकोट के जोला गांव के इस परिवार ने आज भी संभाल कर रखी हुई है। आखिर क्यों ? क्यों है यह मनहूस गोलियां वहां ? इसका कोई जवाब परिवार के पास नहीं है। पर जवाब सीधा सीधा नहीं, लंबी बातचीत के दौरान मिल जाता है। बेशक यह गोलियां मनहूस थी क्योंकि 24 वर्षीय जसविंदर कौर की मांग उजाड़ गई और तीन साल के देविन्दर के सिर से पिता का साया छीन ले गई। पर जिसके सीने को उन्होंने भेदा था। उस सीने का मालिक अपने कुनबे का नाम रोशन कर गया। गर्व है उस परिवार को उस सीने पर। सीने पर गोली खाने वाले जांबाज़ का चाचा होने का फख्र महसूस करता जगतार सिंह हथेली पर रखकर वो चार गोलियां दिखाता है। जगतार सिंह खुद भी फौजी है और सीने पर गोली खाने का ‘अर्थ और दर्द’ उससे बेहतर शायद ही कोई और समझ सकता होगा। रिश्ते में तो जगतार निर्मल सिंह का चाचा है। पर उनमें घनिष्ठता दोस्तों जैसी थी। 28 वर्षीय निर्मल जगतार से मात्र पांच साल छोटा था। पठानकोट से जब उसकी रेजिमेंट को श्रीनगर जाने का आदेश मिला तो निर्मल अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़ने के लिए 5 मई को गांव आया था। परिवार से वही उसकी आखिरी मुलाकात था।

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नायक निर्मल सिंह के शरीर में धंसी गोलियां

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नायक निर्मल सिंह के परिजन (फाइल फोटो)

नायक जगतार सिंह 11 सिख रेजिमेंट में है और इन दिनों असम में तैनात हैं। पिता की मृत्यु की सूचना पाकर गांव आया था। जगतार बताता है कि बीमारी के कारण 28 जून को पिता का स्वर्गवास हो गया था। हमने इसकी खबर निर्मल को 6 जुलाई को तार भेजकर की थी। पर इसे अजीब इत्तेफाक ही कहेंगे कि उस तार का जवाब मिलने से पहले ही निर्मल की शहादत की खबर आ गई। वो भी 6 जुलाई की घटना है। करगिल की पहाड़ियों पर निर्मल और उसके साथियों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने सुबह-सुबह अचानक हमला बोला। निर्मल और उसके साथियों ने इसका तगड़ा जवाब दिया। दोनों तरफ से जबरदस्त गोलीबारी हुई।

यहां तक कि रॉकेट लांचर भी इस्तेमाल हुआ। निर्मल और उसके 17 साथी इस घमासान में शहीद हो गए पर उन्होंने भी दो दर्जन घुसपैठिए तो मार ही डाले। इतना ही नहीं उन्होंने पहाड़ी पर अपना कब्जा किया बल्कि और सैनिक मदद पहुंचने तक कब्जा बरकरार भी रखा।

यह भी एक अजीब बात है कि जिस सीने पर निर्मल सिंह ने गोलियां झेली थीं उसी सीने की वजह से उसे फौज में भर्ती होने में दिक्कत हुई थी। पहली बार जब वह भर्ती होने के लिए मलेरकोटला गया तो फौजी अफसरों ने उसे भर्ती नहीं किया। निर्मल के सीने की चौड़ाई कम थी।

मायूस निर्मल लौट आया पर उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने कुछ महीने खूब कसरत की। तीन महीने बाद पटियाला में जब जवानों की भर्ती हुई तो निर्मल वहां गया। इस बार वह चुन लिया गया। 15 मई को करगिल जाने  से पहले निर्मल की रेजिमेंट सिक्किम, सांबा, कुपवाड़ा आदि संवेदनशील क्षेत्रों में आतंकवाद से जूझती रही। निर्मल की मां गुरचरण कौर कहती है, ‘मैंने तो हौसले से भेजा था अपना काका’।

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