Kargil Diary

#Kargildiary : गृह प्रवेश नहीं, विदाई हुई

हवलदार कश्मीर सिंह (फाइल फोटो)





हवलदार कश्मीर सिंह एक महीने की छुट्टी लेकर गांव आया था। उसने तय कर रखा था कि उतने दिन में नया मकान बना लेना है। मकान के लिए जमीन उसके पास थी ही और वो भी अपने ही गांव में। सो, अप्रैल में आते ही कश्मीर सिंह मकान बनाने के काम में जुट गया। बड़े ही चाव से चुन-चुन कर अच्छी और मजबूत सामग्री उसने जुटाई थी।  इतना ही नहीं, निश्चित समय में मकान पूरा भी हो गया। पर गृहप्रवेश नहीं हो सका।

पंडित जी ने इसके लिए 24 जून का दिन तय किया था। तब तक कश्मीर सिंह रुक नहीं सकता था। नौकरी फौज में जो थी। कुपवाड़ा जाते जाते कश्मीर सिंह ने अपनी पत्नी शबीना व बच्चों सुरेंद्र और सुदर्शना से वादा किया था कि 20 जून को लौटूंगा और 24 जून को धूमधाम से गृहप्रवेश करेंगे। पत्नी और बच्चे उस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। वे चाहते थे कश्मीर सिंह जल्दी आ जाएं। पर ऐसी जल्दी तो उन्होंने कभी नहीं चाही थी। कश्मीर सिंह कश्मीर से शहीद होकर लौटे।

  • पत्नी और बच्चे उस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। वे चाहते थे कश्मीर सिंह जल्दी आ जाएं। पर ऐसी जल्दी तो उन्होंने कभी नहीं चाही थी।
हवलदार कश्मीर सिंह की मां

हवलदार कश्मीर सिंह की मां

हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिला के ऊहल गांव के निवासी 38 वर्षीय कश्मीर सिंह 14 जम्मू कश्मीर राइफल्स में तैनात थे। यूं तो उनकी रेजिमेंट का बेस कुपवाड़ा था पर इन दिनों रेजिमेंट आॅपरेशन विजय के तहत द्रास सेक्टर में थी। 4 जून  की रात द्रास के काक्सर इलाके में जो पलटन ‘सर्च आॅपरेशन’ में लगी थी, कश्मीर सिंह उसी पलटन में थे। पलटन को कैप्टन स्तर का एक अफसर कमांड कर रहा था।

पलटन उसी अभियान के तहत एक पहाड़ी पर चढ़ती चली गई। जब सैनिक काफी ऊंचाई चढ़ चुके तो चोटी के आसपास  छिपे पाकिस्तानियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। अचनक हुए उस हमले का जवाब देने के लिए जब तक पलटन संभलती तब तक कमांडिंग अफसर कैप्टन, हवलदार कश्मीर सिंह व कुछ और जवान घायल हो चुके थे। कैप्टन व कश्मीर सिंह वहीं वीरगति को प्राप्त हुए।

  • कश्मीर सिंह की दो ही इच्छाएं थी पहली कि बच्चे उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त करें तथा दूसरी कि बेटा फौज में कमीशन प्राप्त कर ऊंचा ओहदा पाए।

रेजिमेंट में ‘बाक्सर’ के नाम से ही केवल पहचाने जाने वाले कश्मीर सिंह की रगों में भी एक फौजी का ही खून था। उनके पिता स्वर्गीय शेर सिंह पंजाब रेजिमेंट में हवलदार थे। वे अंग्रेजी शासन में भारतीय फौज में रहकर 17 पदकों से सम्मानित हो चुके थे। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि पांच बेटो में से कम से कम दो तो फौज में रहकर देश की सेवा करें।

कश्मीर सिंह व ध्यान सिंह ने उनकी वह इच्छा पूरी की। ध्यान सिंह 14 आर टी में हैं और अभी गुरदासपुर बॉर्डर पर तैनात हैं। कश्मीर सिंह के छोटे भाई रामनाथ पेशे से अध्यापक हैं। वे बताते हैं कि बच्चों को लेकर कश्मीर सिंह की दो ही इच्छाएं थी पहली कि बच्चे उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त करें तथा दूसरी कि बेटा फौज में कमीशन प्राप्त कर ऊंचा ओहदा पाए।

कश्मीर सिंह का परिवार ही नहीं ऊहल गांव के अन्य परिवारों में भी फौज में भर्ती होने की प्रथा है। किसी जमाने में फौज में गनर रहे उसी गांव के अध्यापक ठाकुर किशन चंद बताते हैं कि यहां शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जिसका संबंध फौज से न हो।

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