Kargil Diary

#Kargildiary : ‘मुझे अपनी ड्यूटी पूरी करनी है’

देसा सिंह





देसा सिंह उस दिन बहुत खुश था। उसके सबसे छोटे भाई झिरमिल सिंह की शादी थी। बारात में ढोल, बैंड बाजे के आगे सबसे ज्यादा नाचने वालों में देसा सिंह ही था। अगले दिन छोटी बहू की डोली घर आई और देसा सिंह उसी दिन चला गया। फिर ऐसा गया कि ज़िंदा लौटकर नहीं आया।

अमृतसर के सलेमपुर गाँव का जाट सिख 30 वर्षीय देसा सिंह 8 सिख रेजिमेंट में हवलदार था। 6 जुलाई की तड़के ऑपरेशन विजय के दौरान ऐलान किया गया कि करगिल हिल पर कब्जा वापस ले लिया गया है। जिस अग्रिम टुकड़ी में देसा सिंह था उसे आदेश दिया गया कि चोटी की तरफ बढ़ो। टुकड़ी अभी बढ़ी ही थी कि दुश्मन ने गोलाबारी शुरू कर दी। इस अचानक हमले से टुकड़ी के 16 जवानों में से देसा सिंह समेत 14 शहीद हो गए। देसा सिंह भी उन्हीं शहीदों में था। दुश्मन निरंतर गोलाबारी कर रहा था। हालत इतनी खराब थी कि भारतीय सैनिक हर रोज उन 14 जवानों के शव रात को ही उठाकर ला पाए।

  • टुकड़ी अभी बढ़ी ही थी कि दुश्मन ने गोलाबारी शुरू कर दी। इस अचानक हमले से टुकड़ी के 16 जवानों में से देसा सिंह समेत 14 शहीद हो गए। देसा सिंह भी उन्हीं शहीदों में था।

देसा सिंह की शहादत तो इन शब्दों में बयां की भी जा सकती है, परन्तु जो स्थिति उसकी पत्नी गुलशन कौर की है उसे समझकर बता पाना आसान नहीं है। वह देसा सिंह की दूसरी पत्नी है, कानून के नजरिये से उनका ये विवाह जायज नहीं है। इसलिए फौजी की बेवा को मिलने वाली आर्थिक सहायता और अन्य सुविधाएं मिलने में गुलशन कौर को दिक्कत आ रही है।

desa singh

देसा सिंह की पत्नी (बच्चे को गोद में लिए हुए) और मां 

देसा सिंह का भाई पंजाब पुलिस का सिपाही जसविंदर सिंह बताता है कि देसा की पहली पत्नी दिमागी बीमारी से पीड़ित है। विक्षिप्त अवस्था में वह कभी भी घर से लापता हो जाया करती है। मायके वाले उसका इलाज करा रहे थे, लेकिन उन्होंने शादी के वक्त ये बात छिपाए रखी। पर बाद में सब कुछ पता चल गया। एक दिन बलविंदर ऐसी गायब हुई कि चार दिन तक उसका पता न चल सका। इसके बाद भाई के साथ तब आई, जब देसा सिंह का दाह संस्कार किया जा रहा था। छह साल का उसका पुत्र जर्मन सिंह उर्फ़ संदीप भी है। अब समस्या यह है कि फ़ौजी की शहादत के बाद उसकी पत्नी व बच्चों को मिलने वाली आर्थिक मदद का हक़दार कौन है। दरअसल, दूसरी पत्नी से भी देसा सिंह की एक संतान है, ढाई साल की बच्ची कोमलप्रीत।

  • अब समस्या यह है कि फ़ौजी की शहादत के बाद उसकी पत्नी व बच्चों को मिलने वाली आर्थिक मदद का हक़दार कौन है।

पति की मृत्यु का गम झेल रही गुलशन कौर को अपना भविष्य बेहद अंधकारमय दिख रहा है। उसे देसा सिंह का असली वारिस होना साबित करना है अदालत में। साथ में एक मुसीबत यह भी है कि वह अशिक्षित है। इन हालात में हताश 22 वर्षीय गुलशन को पछतावा होता है कि उसने पढाई क्यों नहीं की।

देसा सिंह अपनी नौकरी के खतरों और परिस्थितियों के बारे में उसे बताया करता था। पहले तो गुलशन नहीं घबराती थी परन्तु इस बार देसा सिंह जब सालाना छुट्टियाँ बिता कर जा रहा था, तो गुलशन कौर का दिल उसका जाना स्वीकार नहीं कर पा रहा था। गुलशन कहती है जब मुझे पता चला कि उन्हें श्रीनगर जाना है ‘तो मैंने उनसे कहा था फौज की नौकरी छोड़ दो, परन्तु उनका जवाब था मुझे अपनी ड्यूटी पूरी करनी है।’

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