Kargil Diary

#Kargildiary : वो पूरे कुनबे का नाम रोशन कर गया

सिपाही अजमेर सिंह (फाइल फोटो)





भजन सिंह मजदूरी करके शाम को लौटता तो दिहाड़ी के रुपये में से दो-चार पांच रुपए रोजाना निकालकर अलग धर लिया करता था। इस तरह इकट्ठे होने वाले बीस-पच्चीस रुपये वह हर बार अपने सबसे छोटे बेटे अजमेर सिंह को दे दिया करता था। इन रुपयों की मदद से अजमेर को अपना लक्ष्य हासिल करना था। अजमेर का लक्ष्य था भारतीय सेना में भर्ती होना। लुधियाना के दूलकोट गांव के निवासी अजमेर सिंह को फौज में भर्ती होने का शौक बचपन से ही था। जवान होते ही उसने इस शौक को पूरा करने की कोशिशें शुरू कर दीं, पर शरीर की कमजोरी और छोटा कद रास्ते का रोड़ा बन गए। भर्ती दफ्तर से उसे हर बार मन मसोसकर लौट आना पड़ता था। लेकिन उसने हिम्मत फिर भी नहीं हारी। पिता उसे हौसला देते और फिर कोशिश करने को कहते। उन्होंने अपने गाढ़े पसीने की कमाई में से पाई-पाई जोड़कर इकट्ठा की गई रकम अजमेर को देनी शुरू की। अजमेर ने अपनी खुराक बढ़ाई और सारा सारा दिन व्यायाम करके बिताने लगा। आखिर एक दिन उसकी लगन और मेहनत रंग लाई। उसे भारतीय फौज के लिए चुन लिया गया।

उस दिन को याद करके पछत्तर साल का बूढ़ा भजन सिंह यकायक मुस्करा उठाता है और अपनी गीली आंखों को कमीज की बाजू से पोंछता हुआ कहता है ‘अजमेर फौज की नौकरी में बहुत खुश था।’ 15 सिख लाइट इनफेंटरी का वह जवान इन दिनों आॅपरेशन रक्षक के तहत 19 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात था।

यह घटना आठ जून की है। भजन सिंह बताते हैं उस दिन सेना को कोई बड़ा अफसर या कोई वीआईपी जम्मू से करगिल जा रहा था। एक प्लाटून फोर्स का काम था ‘सर्च आॅपरेशन’ करके रास्ते को सुरक्षित बनाना। सिपाही अजमेर सिंह इसी काम को अंजाम दे रहा था कि रास्ते में छिपाई गई बारूदी सुरंग अचानक फट गई। उस धमाके में छह जवानों की मृत्यु हो गई। अजमेर भी शहीद हुए उन जवानों में से एक था।

  • वो कहती है ‘बच्चे पढ़ लिख जाएं तो सारे दुख भुला लूंगी।’ अब तो इन्हीं का सहारा है पर मैं चाहूंगी कि मेरे बच्चे फौज में जाएं,’ वह कहती है ‘मरना तो सभी को है फिर क्यों न ऐसी मौत मरें कि दूसरे भी याद रखें।’

भजन अजमेर का ही नहीं दो और फौजियों का भी पिता है। सबसे बड़ा बेटा हवलदार धरमपाल सिंह असम में और उससे छोटा हवलदार सुरजीत सिंह कश्मीर में तैनात है। सबसे छोटे बेटे की शहादत ने इस बूढ़े को झकझोर के रख छोड़ा है, बावजूद इसके देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत वह कहता है, ‘वो पूरे कुनबे का नाम रोशन कर गया है।’ ठीक अपने ससुर की तरह कमाल की हिम्मत वाली है अजमेर की पत्नी परमजीत कौर। वो कहती है ‘बच्चे पढ़ लिख जाएं तो सारे दुख भुला लूंगी।’ अब तो इन्हीं का सहारा है पर मैं चाहूंगी कि मेरे बच्चे फौज में जाएं,’ वह कहती है ‘मरना तो सभी को है फिर क्यों न ऐसी मौत मरें कि दूसरे भी याद रखें।’

सिपाही अजमेर सिंह का परिवार

सिपाही अजमेर सिंह का परिवार (फाइल फोटो)

अजमेर और परमजीत की शादी को नौ साल हो चुके थे। शादी के लिए अजमेर ने मन्नत मांगी थी। उसे अखंड पाठ करवाना था। परमजीत कहती है, ‘इस बार वह पूरी छुट्टी भी काट कर नहीं गए। कहकर गए थे कि इस बार सितंबर में जब छुट्टी लेकर आऊंगा तो अखंड पाठ की मन्नत भी पूरी कर दूंगा।’

अजमेर के चले जाने से शोकाकुल यह फौजी परिवार मानता है कि सरकार द्वारा किए गए कुछ कार्यों की वजह से उन्हें संतुष्टि हुई है। इस संतुष्टि का कारण है शहीदों के परिवारों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता और शहीदों का सम्मान।  अजमेर के चाचा अवकाश प्राप्त सूबेदार परमजीत सिंह का कहना है, ‘पहले फौजियों की इतनी इज्जत नहीं होती थी। हम बॉर्डर पर हैं हमें भरोसा हो कि हमारे बाद बच्चों की देखभाल ठीक होगी तो हम निश्चिंत होकर और दुगुनी हिम्मत के साथ दुश्मन से लोहा लेंगे।’

परंतु सूबेदार परमजीत सिंह को करगिल में बनी परिस्थितियों को लेकर भी कुछ कहना है। वह कहते हैं, ‘हमारा काफी नुकसान हो गया है, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार लोगों का पता लगाकर दुनिया को बताना चाहिए। हमारी इंटेलिजेंस क्या कर रही थी, हम सीमा पर अपनी पहरेदारी क्यों न कर सके।’

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