Kargil Diary

#Kargildiary : लेकिन वो शहीद होकर आया

शहीद लांस नायक राकेश कुमार





अमृतसर निवासी माताप्रसाद के कुनबे में कोई भी फौज में नहीं था। उनका बड़ा पुत्र जगदीश बैंक में नौकरी करता है, दूसरा बेटा सतीश अपना कारोबार करता है परन्तु सबसे छोटे बेटे राकेश को शौक था फौजी बनने का। वो था भी खूब दिलेर। परिवार में किसी ने उसकी मर्जी का विरोध नहीं किया। आखिरकार एक दिन राकेश कुमार फौज में भर्ती हो गया। उस दिन वह बहुत खुश था।

देश के कई प्रांतों में उसकी 18 गढ़वाल राइफल्स की यूनिट तैनात रही। ऐसी ही एक तैनाती विदेश में भी हुई। श्रीलंका में उस तैनाती के दौरान राकेश ने जो कारनामे किए उसे बताने वाला तो कोई नहीं मिला। हां, आॅपरेशन विजय के दौरान दिखाई गई उसकी बहादुरी हर एक की जबान पर थी।

  • माताप्रसाद तब फख्र भी महसूस करते हैं जब कोई अजनबी उनसे यह कहता हुआ मिलता है ‘ओह राकेश कुमार आपका पुत्र था।

लांस नायक राकेश कुमार (31 वर्षीय) को रॉकेट लांचर से सटीक निशाना लगाने में महारत हासिल थी। उस दिन भी उसने अपने इस कौशल का कमाल दिखाया। वह दिन था 28 जून 1999। राकेश आधा दर्जन जवानों के साथ टाइगर हिल पर बढ़ रहा था। उसके लांचर से निकले रॉकेट ने दर्जन भर पाकिस्तानी घुसपैठियों को ढेर कर डाला। घात लगाकर दूर बैठे दुश्मन से बेखबर बेखौफ राकेश अपने साथियों के साथ दुश्मन पर कहर बरपाता आगे बढ़ ही रहा था कि दूर से एक गोली आई और उसकी गर्दन को भेद गई। राकेश वहीं गिर गया और मातृभूमि की रक्षा करते उसने प्राण त्याग दिए।

शहीद राकेश कुमार के भाई व पिता

लांसनायक शहीद राकेश कुमार के भाई व पिता

अमृतसर की पावन धरती पर जन्मे इस शहीद को जब 3 जुलाई को लाया गया तो पूरा शहर शोकाकुल था। उस दिन शहर में वो चर्चा का विषय बना हुआ था। राकेश की पत्नी कंचन और नन्हे नन्हे दो बच्चों शिवा व तान्वी को देखकर माताप्रसाद कभी कभी जरूर सोचते हैं कि उन्हें राकेश को भर्ती होने से रोक लेना चाहिए था। पोता पोती के चेहरे देखकर गमजदा होने वाले माताप्रसाद तब फख्र भी महसूस करते हैं जब कोई अजनबी उनसे यह कहता हुआ मिलता है ‘ओह राकेश कुमार आपका पुत्र था।’

  • उम्मीद है मुझे सरकारी नौकरी मिल जाएगी। मैं दोनों बच्चों को खूब पढ़ाऊंगी और पिता की तरह शिवा भी फौजी बनेगा।

कुछ देर तक आंखे मुंदी रखने के बाद माताप्रसाद अचानक चुप्पी तोड़ते हैं, ‘वो जिस दिन आखिरी बार घर से गया था बोलकर गया था कि पापा या तो जीतकर लौटूंगा नहीं तो शहीद होकर आऊंगा।’ पर राकेश तो दोनों काम कर गया। जीता भी और शहीद भी हुआ। देश के एक सच्चे सिपाही की तरह राकेश की भी तमन्ना थी कि उसका बेटा भी फौजी बने, लेकिन एकबारगी तो खुद राकेश ने भी फौजी जीवन छोड़ने का विचार किया था इसकी वजह क्या थी?

शहीद राकेश कुमार की पत्नी

शहीद राकेश कुमार की पत्नी कंचन

राकेश की पत्नी कंचन बताती है कि उनकी यूनिट कभी कहीं तो कभी कहीं जाती थी। बार बार बच्चों का स्कूल भी बदलना पड़ता था। स्कूल दूर होने पर मैं खुद ही बेटे को साइकिल पर छोड़कर आती थी। घर का सामान आदि लाना भी मेरी ही जिम्मेदारी थी। उसके बाद बेटी पैदा हुई। मेरा काम बढ़ गया। इन्हीं हालात को देखकर राकेश ने कंचन से एक दफा कहा था, ‘तुम काफी परेशान रहती हो मैं फौज की नौकरी छोड़कर कुछ और काम कर लूंगा।’ कंचन कहती हैं ‘पर मैंने उन्हें मना कर दिया था।’ राकेश की शहादत कंचन के जीवन कभी न भर सकने वाला खालीपन तो पैदा कर गई लेकिन उसके संकल्प को नहीं डगमगा सकी। स्नाकत तक शिक्षित कंचन कहती हैं, ‘उम्मीद है मुझे सरकारी नौकरी मिल जाएगी। मैं दोनों बच्चों को खूब पढ़ाऊंगी और पिता की तरह शिवा भी फौजी बनेगा।’

Comments

Most Popular

To Top