Kargil Diary

#Kargildiary : हवलदार बलदेव सिंह : अब हमारी मुलाकात होने वाली नहीं है

हवलदार बलदेव सिंह





बात दशक भर पुरानी है। श्रीलंका में आतंकवाद के सफाए और शांति बहाली के लिए वहां भारतीय शांति सेना भेजी गई थी। उसमें हमारी थल सेना की भी कंपनियां थीं। ऐसे ही फौजियों से भरी दो गाड़ियां आगे पीछे चल रही थीं। आगे वाले वाहन में आठ फौजी थे। अचानक आगे वाला वाहन रुका। उसमें से एक फौजी उतरकर पीछे वाले वाहन में जा बैठा। दोनों वाहन फिर चल दिए। अभी वह वाहन चंद मीटर ही चला था कि एक जोरदार धमाका हुआ। वो वाहन आग के बहुत बड़े गोले में बदल गया। उसके परखच्चे उड़कर दूर-दूर तक जा गिरे। साथ ही बिखर गए उन फौजियों के अंग जो वाहन में सवार थे।

तब अपने उन साथियों के अंग बलदेव सिंह नाम के उसी फौजी ने समेटे थे जो क्षण भर पहले उन्हीं के साथ सवार था।  शांति सेना की वापसी के साथ तब बलदेव भी लौट आया था, सकुशल। लेकिन इसके बाद बलदेव के साथ वह चमत्कार नहीं हुआ। शायद इसीलिए कहा जाता है कि ‘जब-जब जो जो होता है, तब-तब सो सो होता है।’

  • बलदेव सिंह उस जवान को चाय पिलाने के इरादे से बंकर से बाहर निकला। इससे पहले कि वह अपने साथी तक पहुंचता…

पंजाब रेजिमेंट का हवलदार 38 वर्षीय  बलदेव सिंह इस बार अपने ही देश की रक्षा की खातिर जान हथेली पर रखे बटालिक सेक्टर की चोटी 5006 पर तैनात था। वह 24 जून का दिन था। इस बर्फीली चोटी पर कड़ाके की ठंड थी।  बलदेव के साथ चार पांच जवान और थे। उनमें से एक जवान बंकर के बाहर संतरी ड्यूटी पर तैनात था। बलदेव सिंह उस जवान को चाय पिलाने के इरादे से बंकर से बाहर निकला। इससे पहले कि वह अपने साथी तक पहुंचता, दुश्मन की तरफ से एक गोला आया और बगल की चट्टान पर जा गिरा। जोरदार धमाका हुआ। गोले में से निकले ‘स्पलिंटर’ बलदेव के सीने में जा धंसे। बलदेव लहूलुहान हो वहीं गिर गया और प्राण त्याग दिए।

  • ‘भाई जाते हुए कहकर गया था कि अब हमारी मुलाकात नहीं होने वाली है।’ यही नहीं बलदेव ने अपने पिता से कहा था कि ‘अब तो बक्से में बंद होकर ही आना है।‘
हवलदार बलदेव सिंह

हवलदार बलदेव सिंह के पारिवारिक सदस्य और संबंधी

पंजाब की तरनतारन तहसील के भुल्लर गांव निवासी करम सिंह अपने पुत्र के जीवन मृत्यु के इस अजीब इत्तेफाक का जिक्र करते समय कहते हैं, ‘शायद भगवान की यही मर्जी थी कि बलदेव अपनी मातृभूमि की गोद में शहीद हो जाए।’ बलदेव सिंह का चचेरा भाई मुख्त्यार सिंह जो बताता है उससे लगता है कि मानव सेवा और भक्ति पर अटूट विश्वास रखने वाले बलदेव को अपनी मौत की आहट काफी पहले सुनाई पड़ गई थी। मुख्त्यार ने बताया, ‘भाई जाते हुए कहकर गया था कि अब हमारी मुलाकात नहीं होने वाली है।’ यही नहीं बलदेव ने अपने पिता को भी कहा था कि ‘अब तो बक्से में बंद होकर ही आना है।‘ करम सिंह बताते हैं कि श्रीलंका वाली घटना के बाद बलदेव का मन थोड़ा खराब हो गया था। असल में वह नरम दिल का इंसान था। 38 वर्षीय उस फौजी का कुछ अलग ही व्यक्तित्व था। भुल्लर गांव के लोग बताते हैं कि साल में एक बार दो माह की छुट्टी पर आने के बावजूद बलदेव आराम नहीं करता था। किसी न किसी काम में खुद को उलझाए रखता था। चाहे वो अपने घर का काम हो या किसी और का। और शौक था तो बस एक ही-राधास्वामी सत्संग व्यास में जाना, ध्यान लगाना और लोगों की सेवा करना।

गांवो वालों से घिरे करम सिंह से बात हो ही रही थी कि बलदेव को नौ वर्षीय पुत्र गुरिंदर उनकी गोद में आकर बैठ गया। दादा पोते के सिर पर स्नेहपूर्वक हाथ फेरते हुए, ‘काका तेरा बाप तो हवलदार था लेकिन तुझे तो फौज का बड़ा अफसर बनना है।’

क्या अब कभी अफसोस होता है कि बलदेव को फौज में क्यों भर्ती कराया? इस सवाल पर बलदेव की मां तपाक से और गर्वीली गर्दन तानकर जवाब देती है, ‘पुत जद फौज विच भरती होए तां केड़ा मां प्यो है जेड़ा खुश नहीं होंदा।‘

लेकिन सास जब यह बोल रही थी तो, बलदेव की पत्नी बलजीत कौर शायद बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली जिसे छिपाने की गरज से वह बच्चे को देखने का बहाना कर भीतर कमरे में चली गई।

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