Kargil Diary

#Kargildiary : बारूदी सुरंग, जोरदार धमाका और शहीद दलबीर

लांस नायक दलबीर सिंह (फाइल फोटो)





लांसनायक दलबीर सिंह मातृभूमि की सेवा करते करते वीरगति को प्राप्त हो गया, पर उसकी पत्नी कुलविंदर कौर के जीवन की गति तो रुक सी गई है। मानसिक रोग से ग्रस्त तीन साल के मासूम बेटे को संभालती कुलविंदर के लिए जीवन एक यक्ष प्रश्न बन आ खड़ा हुआ है। बेटे के इलाज के साथ ही उसे सात महीने की पुत्री का भी भरण पोषण करना है। उस पर अशिक्षा का श्राप उसे और भी हताश किए हुए है।

पंजाब की बटाला तहसील स्थित भुजियांवाला गांव के जाट सिख परिवार की कुलवधू कुलविंदर को ठीक तरह से पता भी नहीं कि उसका पति कहां और कैसे शहीद हुआ। बस उसे सिर्फ इतना मालूम है कि 11 जून की सुबह कुछ फौजी उसके पति का शव घर लाए थे। जिस दिन दलबीर का शव लाया गया उस दिन परिवार में कोई भी पुरूष सदस्य नहीं था। अंतिम संस्कार भी कुलविंदर को ही करना पड़ा। कुलविंदर के जेठ जागीर सिंह पेशे से ड्राइवर हैं और ट्रक चलाते हैं। उस दिन वो ट्रक लेकर दूर गए हुए थे। जागीर सिंह बताते हैं कि दलबीर व छह अन्य जवान आॅपरेशन रक्षक के तहत गश्त कर रहे थे। आठ जून की शाम वे लोग एक ट्रक में बैठकर कंगण क्षेत्र में जा रहे थे कि घुसपैठियों द्वारा सड़क पर बिछाई गई बारूदी सुरंग फट गई। एक जोरदार धमाका हुआ। ट्रक के परखचे उड़ गए। उसमें सवार सातों फौजी शहीद हो गए।

लांस नायक दलबीर सिंह पत्नी

दलबीर सिंह की पत्नी कुलविंदर कौर बीमार पुत्र को गोद में लिए हुए

गांव के लोग बताते हैं कि दलबीर के जीवन में बस दो ही लक्ष्य थे। पहला, फौज की नौकरी पूरी लगन के साथ करना और दूसरा मानसिक रोग से ग्रस्त पुत्र परगट सिंह का इलाज। दलबीर ने ऐसा कोई अस्पताल नहीं छोड़ा जहां वह बच्चे को न ले गया हो। फौज की नौकरी से जो कुछ कमाता सब बच्चे के इलाज पर खर्च कर दिया करता था। इस मामले में वो खर्च की चिंता नहीं करता था। पर अब उसके बाद बचे छोटे से परिवार के सामने चिंता ही चिंता है।

उधर, भुजियांवाला गांव के लोग स्थानीय प्रशासन और अपने चुने हुए विधायक, सरपंच आदि के व्यवहार से दुखी हैं। वे बताते हैं कि दलबीर सिंह के ‘भोग’ की रस्म पर तो सब आए थे। क्षेत्र के विधाायक ने घोषणा की थी कि गांव में जो प्राथमिक स्कूल है उसे मिडिल तक कर दिया जाएगा। गांव के बाहर से दलबीर के घर से गुजरने वाले रास्ते पर पक्की सड़क बना दी जाएगी। स्कूल और सड़क दोनों ही शहीद दलबीर सिंह के नाम पर ही होंगे। पर महीना गुजर जाने के बाद न तो कोई अधिकारी, न ही विधायक वहां झांकने आए।

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